पुराण विषय अनुक्रमणिका(ए-अः) Purana Subject Index

In common parlence, oshadhi/herb/medicine is taken as something which cures the diseases. Old aayurveda and new medicinala sciences are able to tell that this herb, this medicine will affect this part of the body. But some esoteric aspect is hidden in the oshadhi/herb of vedic literature. This is indicated by a mantra which says in contexts of the dead human body being consigned to flames for last rites that let thy eye reside in sun, thy soul in air, ---- and let thy establish yourself in herbs by bodies. The question is what bodies inside a body are being talked about? One possibility is that different parts of the body are being identified as separate bodies and the poet desires that these body parts identify themselves with particular herbs. It is no secret that a particular part of the body has it’s separate needs which can be fulfilled by separate herbs. For example, it is said that whatever is the shape of the fruit, it will nourish the body part of the same shape. Thus almond, sesame etc. will nourish the eyes. The other possibility about the meaning of mantra is that the composer of the mantra of veda is talking of providing the body parts a broader view, just as eyes are being considered as sun. In this case, the crux is when a body part draws it’s energy for sustenance by itself, it does not depend on supplements from outside world, it is able to attract energy from the universe. The third possibility about the meaning of mantra is that the bodies being talked about are the gross body, subtle bodies like ethereal, astral, causal body, mental body etc. about which Rajneesha has given some details about their qualities. Thus about ethereal  body, Rajneesha says that this has the quality of contracting and expanding itself. For example, it gets contracted on feeling fear due to which our feet start trembling because the ethereal body which was giving support to the gross body has withdrawn it’s support. Why these bodies have been identified with herbs in the mantra, the reason for this may be that herbs develop in upper direction, opposite to gravitational force. In the same way, our subtle bodies develop opposite to gravitational force. Thus the subtle bodies can be identified with subtle hair or herbs. And these subtle bodies also work as healers for the lower body, the gross body. It can be said that the vedic seers have used the simili of herbs for explaining their own subtle facts. One mantra gives the simili of appearance of herbs by tearing of earth with tearing of our own body by fame etc.

  Vedic and puraanic literature universally identify subtle hair on our body with herbs on the earth. The earth is identified with Aditi, the mother of gods. Otherwise, Aditi means the integral unit, undivided( divided Diti is the mother of demons). In the beginning, this Aditi was without subtle hair. She became familier with upward direction due to herbs because herbs grow upwards. These herbs are her subtle hair. This situation becomes possible when this earth becomes a cow and is able to absorb sunrays at noon. Goat or sheep states, which are connected with before sunrise and after sunrise, are not desirable.

  Practically, how is it possible to develop this so called state of subtle hair? Vedic literature states different states of the formation of golden earth which starts with churning of water and ends at gold. After this, development of herbs becomes possible.

  Regarding the word meaning of oshadhi, it is evident that the word is connected with bearing of ushaa, the dawn, the lifeforce which induces the gross matter for development( all sleeping creatures, all life forces get awakened at dawn). Thus oshadhi is that gross matter which has imbibed the lifeforces which forces it to develop upwards. Then there is one statement that the setting sun placed a part of it’s luster in herbs at sunset. The part which sun has put in herbs is responsible for satiating the hunger etc. The lifeforce which arouses hunger is called praana. The lifeforce which satiates it has been called Udaana. This simple statement of introduction of some luster by the setting sun in herbs could have been ignored had J.A.Gowan not stated that the charge available in gross matter fulfills the absence of symmetry in gross matter.

 

Written on 20-12-2006AD(Vikrami Pausha Krishna Amaavaasyaa, 2063)

 

ओषधि

टिप्पणी : ओषधियों का सामान्य परिचय यही है कि पशु जगत ओषधियों के भक्षण द्वारा जीवन यापन पर आधारित है । आधुनिक विज्ञान ने ओषधियों के विभिन्न अङ्गों का विश्लेषण किया है और यह सूचना दी है कि इस ओषधि के अमुक अङ्ग में यह - यह धातुएं, यह -यह प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन आदि उपलब्ध हैं । आयुर्वेद में यह तथ्य प्रतिष्ठित हो चुका है कि किस ओषधि के सेवन से शरीर के किस अङ्ग पर प्रभाव पडता है, कौन से रोग के लिए किस ओषधि का सेवन किया जाना चाहिए । यह कहा जा सकता है कि ओषधि के बारे में इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है । लेकिन वैदिक साहित्य आध्यात्मिक रूप में ओषधि को समझने के लिए कुछ संकेत प्रदान करता है  । ऋग्वेद १०.१६.३, अथर्ववेद १८.२.७, तैत्तिरीय संहिता ३.१.८.२ व तैत्तिरीय आरण्यक ६.१.४ में पितृमेध के संदर्भ में कहा गया है कि हे पार्थिव शरीर, तेरा चक्षु सूर्य में जाए, आत्मा वात में विलीन हो, धर्म द्वारा तू द्युलोक व पृथिवी में जाए, आपः में यदि तेरा अंश विद्यमान है तो वहां भी जा और ओषधियों में शरीरों द्वारा प्रतिष्ठित हो । प्रश्न उठता है कि एक शरीर के अन्दर यह बहुवचन के शरीर कौन से हैं ? एक संभावना तो यह है कि शरीर के अङ्गों को बहुवचन में शरीर कहा गया है । इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि शरीर के विभिन्न अङ्गों का तादात्म्य किसी ओषधि विशेष से है । अङ्ग विशेष को जिन पोषक तत्त्वों की आवश्यकता पडती है, उनकी पूर्ति ओषधि विशेष द्वारा हो सकती है । उदाहरण के लिए, कहा जाता है कि जिस फल का जो आकार होता है, वह उसी आकार के अङ्ग की पुष्टि करता है । बादाम, तिल आदि चक्षु के आकार के होने के कारण चक्षु को पुष्ट करते हैं । अखरोट, आम्र आदि का आकार हृदय जैसा होता है । ऋग्वेद के इस मन्त्र का दूसरा अर्थ इस रूप में किया जा सकता है कि यह प्रसंग मर्त्य शरीर को विराट् रूप प्रदान करने के संदर्भ में है । यहां चक्षु की पराकाष्ठा सूर्य का उल्लेख है । इसी प्रकार शरीर के विभिन्न अङ्गों की पराकाष्ठा ओषधि विशेष के गुणों को प्राप्त होने में है जिससे उन अङ्गों की पुष्टि के लिए बाह्य ओषधियों पर आश्रित न होना पडे, वह अङ्ग स्वयं ही ओषधि का कार्य करने लगें, ब्रह्माण्ड से ऊर्जा ग्रहण करने लगें । मन्त्र के संदर्भ में तीसरी संभावना यह है कि ओषधि का विकास ऊर्ध्वा दिशा में, गुरुत्वाकर्षण की विपरीत दिशा में होता है । इसी प्रकार स्थूल, सूक्ष्म, कारण आदि शरीरों का विकास ओषधियों की भांति ऊर्ध्व दिशा में होना चाहिए, उन्हें स्थूल जगत के कर्षण से मुक्ति मिलनी चाहिए । इस संदर्भ में अन्य पौराणिक व वैदिक उल्लेख भी प्राप्त होते हैं । तैत्तिरीय आरण्यक ६.१०.२ में ओषधि द्वारा पृथिवी का विदारण कर ऊर्ध्व विकास की उपमा कीर्ति, यश, ब्रह्मवर्चस द्वारा विदारण करने से की गई है ।

   पौराणिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से उल्लेख मिलते हैं कि शरीर के लोम ओषधि - वनस्पतियों का रूप हैं ( उदाहरण के लिए, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१०.८.७) । शतपथ ब्राह्मण ३.२.३.१९ का कथन है कि इयं( यह पृथिवी ) अदिति है । इसने ऊर्ध्वा दिशा को ओषधियों के द्वारा जाना क्योंकि ओषधियां ऊर्ध्वा दिशा में उत्पन्न होती हैं । तैत्तिरीय संहिता ७.४.३.१ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.४.५ में इस अदिति को ऋक्षा नाम दिया गया है जो पूर्व में अलोमका होती है और जब इस पर ओषधि - वनस्पतियां उग आती हैं तो यह सलोमका बन जाती है । यहां यह समझने योग्य है कि वैदिक साहित्य में अदिति पर ही लोमों को उत्पन्न किया गया है, दिति पर नहीं । ऐतरेय ब्राह्मण ५.२३ में ऋग्वेद के प्रसिद्ध सार्पराज्ञी सूक्त ( १०.१८९) के संदर्भ में कहा गया है कि आरम्भ में सार्पराज्ञी अलोमका थी । इस सूक्त ( आयं गौ: पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुर: इत्यादि ) के जप से सलोमका हो गई । इस सूक्त में ऐसा क्या है जो लोम उत्पन्न कर सकता है ? इसमें एक पृश्नि गौ का उल्लेख है । गौ सूर्य की प्रखर अवस्था की किरणों को ग्रहण कर सकती है । यह उल्लेखनीय है कि यहां अज या अवि का उल्लेख नहीं है जो क्रमशः सूर्य के उदय से पूर्व की, ताप मात्र की तथा सूर्य उदय की अवस्थाएं हैं । तैत्तिरीय संहिता २.१.२.३ का कथन है कि वशा अवि के आलभन से पृथिवी का प्रथन संभव हुआ तथा उस पर ओषधियां उत्पन्न हुई । डा. फतहसिंह का कथन है कि वशा बांझ को कहते हैं । तैत्तिरीय संहिता २.१.५.३ में ओषधियों के लिए वेहत के आलभन का निर्देश है । इन सभी कथनों का आधार यही प्रतीत होता है कि किसी प्रकार से हमारे शरीर के अङ्गों में ऊर्ध्व गमन का गुण विकसित हो तो वे ओषधि का कार्य करने योग्य बन सकते हैं । रजनीश द्वारा चक्रों के संदर्भ में दी गई अपनी व्याख्या में विभिन्न चक्रों की संभावनाओं को व्यक्त किया गया है । सूक्ष्म शरीर की संभावना यह है कि वह अपने को समेट कर केन्द्रीभूत भी कर सकता है और विस्तार भी कर सकता है । रजनीश का कथन है कि कोई भय उत्पन्न होने पर पूरी देह में व्याप्त सूक्ष्म शरीर संकुचित हो जाता है जिसके कारण हमारे पैर लडखडाने लगते हैं । इसी प्रकार किसी - किसी को ध्यान में अनुभव होता है कि वह सारे कमरे में उड रहा है लेकिन आंख खोलने पर वह पाता है कि ऐसा तो कुछ भी नहीं है । रजनीश का कहना है कि यह सब सूक्ष्म शरीर की विभूतियां हैं । इससे आगे कारण शरीर, मनस् शरीर आदि में ब्रह्माण्ड में व्याप्ति की, एक चेतना से दूसरी चेतना में व्याप्ति की संभावनाएं बढती जाती हैं । अतः एक संभावना यह है कि इन सूक्ष्म, कारण आदि शरीरों का विकसित होना ही हमारी स्थूल देह के लिए ओषधि का कार्य करता है । यह विकास कैसे हो, इस संदर्भ में वैदिक साहित्य में तो विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख आता है । तैत्तिरीय संहिता ५.५.४.१ का कथन है कि असौ( आदित्य ) द्वारा पृथिवी पर रेतः के सिञ्चन से वह रेतः ओषधियों - वीरुधों के रूप में उत्पन्न होता है । तैत्तिरीय संहिता २.५.३.२ में अमावास्या के संदर्भ में कहा गया है कि वृत्र के हनन के लिए उद्यमशील इन्द्र के वीर्य के बिखरने से ओषधियों का जन्म हुआ । शतपथ ब्राह्मण ६.१.१.१३ में प्रजापति द्वारा श्रान्त होने पर क्रमशः मृदा, शुष्क आपः, ऊष, सिकता, अयः, हिरण्य और ओषधि - वनस्पतियों को उत्पन्न करने का उल्लेख है । शतपथ ब्राह्मण में ही अन्यत्र उल्लेख आता है कि पहले आपः का मन्थन करने पर उसमें फेन उत्पन्न हुआ, फिर फेन से मृदा, मृदा से सिकता, सिकता से अयः, अयः से हिरण्य आदि । यह एक पहेली है कि हिरण्य से ओषधियां कैसे उत्पन्न होंगी ।

  ओषधि शब्द की निरुक्ति के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि ओषं धीयते इति ओषधि । लेकिन प्रश्न यह उठता है कि यह ओष क्या होता है । ओष का सम्बन्ध उषा से, सुप्त जगत में प्राणों का सर्वप्रथम संचार करने वाली उषा से भी हो सकता है । अथर्ववेद १९.२९.७ का कथन है कि ओष दर्भ सपत्नान् मे, अर्थात् हे दर्भ नामक ओषधि, तू मेरे शत्रुओं का ओषन कर । यहां ओष का अर्थ उषा का समावेश करने से लिया जा सकता है । अतः ओषधि में यह गुण है कि ओषधि अवस्था में द्रव्य ओषन करने में समर्थ होता है । इसी कारण वह ऊपर की ओर वर्धन कर सकता है, अन्यथा जड पदार्थ में तो कोई विकास संभव नहीं है । और जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, ओषधि का विकास हिरण्य अवस्था या अदिति अवस्था से आगे ही संभव है । ओष को धारण करने वाली ओषधि की यह स्थिति अग्नि को गर्भ में धारण करने वाली ओषधि की हो सकती है । फिर जैमिनीय ब्राह्मण १.७ में उल्लेख किया गया है कि अस्त होते हुए सूर्य ने अपनी ऊर्क् ओषधि में रख दी । ऊर्क् को समझने के लिए ऊर्ज शब्द पर टिप्पणी पठनीय है । आश्विन् व कार्तिक मासों को इष व ऊर्ज मास कहा जाता है । शतपथ ब्राह्मण १.२.२.६, ४.२.२.१५, १४.२.२.२७, जैमिनीय ब्राह्मण १.८० व १.८८ के अनुसार इष वर्षा है और ऊर्ज वह है जिसका वर्षा के फलस्वरूप वर्धन होता है । शतपथ ब्राह्मण ४.२.२.१५ के अनुसार इष भक्ति की आरम्भिक अवस्था हिंकार है । इसका निहितार्थ यह होगा कि हिंकार से आगे की अवस्थाएं प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन ऊर्ज के अन्तर्गत आती हैं । इष का सम्बन्ध प्राण से है और ऊर्ज का उदान से । प्राणों द्वारा वर्षा की, दिव्य वर्षा की अभीप्सा की जाती है । प्राणों के लिए वर्षा रूपी अन्न पर्याप्त है लेकिन उदान के लिए ऊर्ज की आवश्यकता पडती है । तैत्तिरीय ब्राह्मण १.२.१.३ में क्षुधा की तृप्ति के लिए ऊर्ज की कामना की गई है । फिर ऊर्क् को वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से उदुम्बर से सम्बद्ध किया गया है । उदुम्बर की निरुक्ति में कहा गया है कि जो सब पापों से मुक्ति दिला दे, वह उदुम्बर है ।

   एक विचित्र तथ्य यह है कि वैदिक साहित्य में आपः और ओषधियों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध दिखाया गया है । तैत्तिरीय संहिता ३.३.६.२ व में दर्भ के संदर्भ में प्रश्न उठाया गया है कि ओषधियां आपः से क्यों उत्पन्न होती हैं । तैत्तिरीय संहिता २.१.९.२ का कथन है कि अन्न प्राप्ति के लिए आपः व ओषधियों की सन्धि आवश्यक है । ओषधियां मैत्र हैं जबकि आपः वारुण है । अन्यत्र कहा गया है कि न तो केवल ओषधियों के भक्षण से तृप्ति हो सकती है और न ही केवल आपः के पान से । आपः द्वारा ओषधियों में रस का सृजन होता है । तैत्तिरीय संहिता ७.२.३.१ का कथन है कि दर्भ की विशेषता यह है कि यह आपः और ओषधि दोनों है । शतपथ ब्राह्मण १२.८.१.४ में सुरा को आपः व ओषधियों का रस कहा गया है । शतपथ ब्राह्मण १.२.२.२ का कथन है कि आपः रेवत्य हैं जबकि ओषधियां जगत्य हैं । यह कथन मन्त्र ''सं रेवतीर्जगतीभिर्मधुमतीर्मधुमती- - - - इत्यादि( तैत्तिरीय संहिता १.१.८.२) की व्याख्या के अन्तर्गत किया गया है । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.२.८.२ का कथन है कि आपः रेवत्य हैं, पशु जगती हैं और ओषधियां मधुमती हैं । यह अन्वेषणीय है कि आपः क्या हैं । क्या वे प्राण हैं ? मन्त्र आपः अस्मान् मातर: शुन्धयन्तु के आधार पर यह कहा जा सकता है आपः का मुख्य कार्य पापों का शोधन करना है ।  इसीलिए वह वारुण्य हैं ।

   ऋग्वेद १०.९७.६ की ऋचा है - यत्रौषधी: समग्मत राजानः समिताविव । विप्र: स उच्यते भिषक् । इसी मन्त्र की पुनरुक्ति तैत्तिरीय संहिता ४.२.६.१ में की गई है । डा. फतहसिंह के अनुसार समिति वह होती है जहां सब सदस्य एक मति रखते हैं । मन्त्र संकेत करता है कि ओषधियों के उत्पन्न हो जाने के पश्चात् भी यह आवश्यक है कि इन ओषधियों में सामञ्जस्य हो, समिति का निर्माण हो । तभी विप्र भेषज कर्म कर सकता है ।

  अथर्ववेद ३.२३.६ में ओषधि के पिता के रूप में द्युलोक, माता के रूप में पृथिवी तथा मूल के रूप में समुद्र का उल्लेख है । अथर्ववेद १९.३२.३ में ओषधि के दिवि में तूल तथा पृथिवी में निष्ठित होने का उल्लेख है । अथर्ववेद ८.७.४ में आपः के अग्र होने तथा ओषधियों के दिव्य होने का उल्लेख है । यह संकेत करता है कि आपः अग्र उन्हीं ओषधियों में बन सकता है जो दिव्य हों । गवामयन याग के संदर्भ में जैमिनीय ब्राह्मण २.२ तथा तैत्तिरीय संहिता ७.५.१.६ का कथन है कि ओषधियों का अग्र/फल ऐसे है जैसे गवामयन सत्र में एक मास में पहले २४ दिन ४ अभिप्लव षडहों का सम्पादन किया जाता है और फिर शेष ६ दिन में पृष्ठ्य षडह का । ऐसा कहा जाता है कि अभिप्लव षडह देवों द्वारा त्वरित गति से प्रगति करने का मार्ग है जबकि पृष्ठ्य षडह मर्त्य प्राणों द्वारा मन्द गति से प्रगति करने का । इसको ऐसा भी समझा जा सकता है कि यह मर्त्य स्तर पर प्राप्त अमृत स्तर की विभूति है । तैत्तिरीय संहिता ७.५.१८.१ में ओषधियों को फलिनी कहा गया है और यहां योगक्षेम का भी उल्लेख है । यह संकेत करता है कि ओषधियों के फल के रूप में ही योगक्षेम का उल्लेख है । तैत्तिरीय संहिता ६.३.९.५ का कथन है कि पशुओं में वपा अग्र होती है, वैसे ही जैसे ओषधियों में बर्हि अग्र होती है । अग्र के संदर्भ में आग्रयण ग्रह का विवरण भी विचारणीय है । तैत्तिरीय ब्राह्मण १.६.१.९ तथा २.१.१.१ का कथन है कि आग्रयण द्वारा नवीन अन्न को देवों व पितरों को अर्पित किया जाता है । यदि अहुत का भक्षण किया जाता है तो प्रजा प्रजापति से दूर चली जाती है । यदि हुत अन्न का भक्षण किया जाता है तो वह पास आ जाती है । तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.१.१ का कथन है कि अङ्गिरसों ने कठिनाई से वृष्टि द्वारा ओषधियों को उत्पन्न किया। पितरों ने विष से उसका लिम्पन कर दिया । तब पितरों को भाग देने से ओषधियां स्वादिष्ट बनी । ओषधियों व वनस्पतियों के फलों के रूप में पिप्पल का मन्त्रों में सार्वत्रिक रूप से उल्लेख आता है ।

  वैदिक मन्त्रों में ओषधियों द्वारा अग्नि व सोम दोनों को गर्भ में धारण करने के उल्लेख आते हैं । ऋग्वेद १०.९१.६, शतपथ ब्राह्मण १२.४.४.४ में ओषधियों द्वारा अग्नि को गर्भ में रखने और आपः द्वारा उसका जनन करने का उल्लेख है । तैत्तिरीय संहिता ५.१.५.४ में ओषधियों को अग्नि की माताएं कहा गया है । ऋग्वेद ३.१.१३ का कथन है कि आपः में अग्नि गर्भ रूप में है जबकि ओषधियों में दृश्य रूप में । तैत्तिरीय संहिता ३.४.७.१ तथा शतपथ ब्राह्मण ९.४.१.७ का कथन है कि अग्नि गन्धर्व है जबकि ओषधियां ऊर्ज नामक अप्सराएं । तैत्तिरीय संहिता ३.५.५.२ का कथन है कि पशु आदित्य रूप हैं, अग्नि रुद्र रूप है । यदि पशुओं को अग्नि में प्रतिष्ठित किया जाएगा तो अग्नि उनको हानि पहुंचाएगी । अतः उन्हें ओषधियों में प्रतिष्ठापित किया जाता है ।

  ओषधियों में सोम का आविर्भाव गर्भ रूप में तब होता है जब पर्जन्य आदि द्वारा रस का वर्षण होता है ( तैत्तिरीय ब्राह्मण २.४.५.५, तैत्तिरीय आरण्यक ६.६.४ ) । अथर्ववेद ७.४०.१ में ओषधियों में रस का सिंचन करने वाले को दिव्य सुपर्ण और वृषभ कहा गया है । शतपथ ब्राह्मण १२.१.१.२ में उद्गाता ऋत्विज को पर्जन्य का रूप कहा गया है । ओषधियों से इस सोम की प्राप्ति ओषधियों के पेषण से होती है ( ऋग्वेद १०.८५.३, अथर्ववेद १४.१.३) । यह उल्लेखनीय है कि सोमयाग में वीरुध आदि का ग्रावा/अद्रि आदि से पेषण किया जाता है और उस पिष्ट ओषधि को जल में मिलाकर उस जल की सोम रूप में कल्पना की जाती है । ओषधि के ऋजीष/तृण भाग को अन्त में फेंक दिया जाता है या जल में प्रवाहित कर दिया जाता है । अथर्ववेद ९.४.५ का कथन है कि शरीर बृहद् अद्रि है और शक्र सोम का भक्षण करने वाला है ।

 

  अथर्ववेद १९.२४.७ में पूर्वा व नवा ओषधियों का उल्लेख आया है । यह पूर्वा और नवा कौन सी हैं, यह स्पष्ट नहीं है । शतपथ ब्राह्मण ७.२.४.२६ का कथन है कि जो ओषधियां वसन्त, प्रावृट् व शरद ऋतुओं में उत्पन्न होती हैं, वह पूर्वा हैं । ऋग्वेद १०.९७.१ में भी पूर्व में उत्पन्न ओषधियों का उल्लेख है ।

  जैमिनीय ब्राह्मण १.७ में अग्निहोत्र के संदर्भ में अस्त होते हुए सूर्य द्वारा सायंकाल ओषधियों में ऊर्क् स्थापित करने का उल्लेख है । कहा गया है कि अग्निहोत्र में जो तृण को जलाकर अवज्योतन किया जाता है, यह वही ऊर्क् का रूप है । शतपथ ब्राह्मण ११.६.६.१० में भी यही प्रसंग कुछ अन्तर  के साथ आया है । सामान्य स्थिति में तो ऐसे कथन की उपेक्षा कर दी जाती है । लेकिन श्री गोवान के इस कथन से कि जड पदार्थ के सूक्ष्म कणों पर जो आवेश विद्यमान है, वह जड पदार्थ में सममिति के अभाव को पूरा कर रहा है ( क्योंकि वैद्युत आवेश सममित होता है ), इस कथन का महत्त्व उजागर होता है । सूर्य की स्थिति को सममिति की स्थिति तथा जड पृथिवी को असममिति की स्थिति कहा जा सकता है । अतः यदि सूर्य अपने अंश का पृथिवी में समावेश करता है, तो उसको उपरोक्त संदर्भ में सोचा जाना चाहिए । ऐतरेय ब्राह्मण ५.२८ व तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.५.१ का कथन है कि अग्निहोत्र में जो कार्य ओषधि द्वारा सम्पन्न किया जाता है, सोमयाग में वही कार्य बर्हि द्वारा किया जाता है । सोमयाग में आहवनीय अग्नि के समीप प्रस्तर तथा अन्य स्थानों पर बर्हि को बिछाया जाता है । तैत्तिरीय आरण्यक ३.८.१ का कथन है कि वेदी अदिति का रूप है और बर्हि ओषधि का रूप है । इस प्रकार अदिति रूपी पृथिवी का ओषधि रूपी बर्हि से आच्छादन करके उसे सलोम बनाया जाता है । शतपथ ब्राह्मण १.५.३.१२ का कथन है कि जो ओषधियां वर्षवृद्ध हो जाती हैं, हेमन्त को सहन कर जाती हैं, वह वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा के पश्चात् शरद ऋतु में पूरा विस्तार प्राप्त कर लेती हैं । उन्हें ही बर्हि ( बृह धातु से ) कहा जाता है । शतपथ ब्राह्मण ११.१.७.२ से संकेत मिलता है कि बर्हि का सम्बन्ध आरण्यक ओषधियों से हो सकता है जो अकृष्टपच्या होती हैं । तैत्तिरीय संहिता ६.३.९.५ का कथन है कि पशुओं में वपा अग्र होती है, वैसे ही जैसे ओषधियों में बर्हि अग्र होती है ।

 

Oshadhi or herb is a frequently talked-about subject of Rigveda and especially of Atharva veda. In common parlance, herb is considered as one which can cure from any ailment. But in vedic literature, oshadhi has got much deeper meanings. Common herbs of the world grow on the worldly earth, but the herbs of vedic literature grow on the earth of self or atman. As will be the quality of self due to our deeds, the same type of herb will grow on that. One can call buddhi or intellect to represent oshadhi. From the adjectives given to herbs in vedic mantras, it appears that the herbs may be divided into five categories according to our five senses. Some herb will improve our power of seeing, some of hearing etc. Puraanic literature abounds with references of herbs which have luminescent properties.

 Vedic and puranic literature has categorized herbs mainly into 2 parts – those which grow wild and those which are sown. This indicates that there may be two parts of atman – one which can not be ploughed and one which can be ploughed by our efforts. The number of herbs in these two categories in different in vedic and puranic literature.

  The word meaning of oshadhi can be derived on the basis of  root ush – burning. But the herbs in puranic literature are considered as the wives of moon who, instead of burning, gives coolness. In terms of terminology of modern sciences, coolness may be called the decrease in entropy, or  increase in order. The term entropy has further been clarified in detail in the text. This indicates that oshadhi has got connection with sun and moon both. When one is in trance, then oshadhi will work, because this is the state of least entropy. When one comes out of trance, then Usha will work, just like the usha or dawn in outer world.

  There is much confusion about the difference between the words vanaspati and oshadhi or tree and herb in vedic and puranic literature. It has been clarified that vanaspati may be connected with love or emotion part, while oshadhi may be connected with intellectual or knowledge part

 

First written in 1999 AD( Vikrami 2056)

टिप्पणी : अथर्ववेद के कईं सूक्तों की देवता ओषधि है । ओष अर्थात् जलाना । यह उषा से बना है । ओष को , प्रकाश को धारण करने वाली ओषधि कहलाती है - वह बुद्धि या चेतना शक्ति जो ज्ञान से निकलती है, जिससे हम सब कुछ देखते हैं ।

  'ओषधि शब्द का निर्वचन सायण ने 'ओष+ धी ' करके एक महत्त्वपूर्ण दिशा दी है । वेद - विज्ञान में बहुवचनान्त 'ओषधयः शब्द उन आध्यात्मिक शक्ति धाराओं का द्योतक है जिन्हें क्षिप्रगामी ज्ञानाग्नि धाराएं कहा जा सकता है । दाहबोधक 'उष' धातु से निष्पन्न वैदिक उषा शब्द इन्हीं ज्ञानाग्निधाराओं या ज्ञानरश्मियों आदि का एकीभूत रूप है । निघण्टु में ओषधयः को पदनामों में संकलित करके यह संकेत दे दिया गया है कि उक्त उषा रूप ही वाक् शक्ति के उन नौ पदों / स्तरों में व्यक्त होता है जिनका संकेत वाक् के 'नवपदी ' स्वरूप ( ऋ.१.१६४.१ ) में प्राप्त होता है । इन्हीं नव पदों को लक्ष्य करके निघण्टु ने पदानि नाम देकर लगभग २०० शब्दों को नौ खण्डों में विभक्त किया है ।। इस संदर्भ में यह भी स्मरणीय है कि इन नौ खण्डों में से एक में अग्निः, जातवेद: और वैश्वानर: ही हैं, जो निस्सन्देह पूर्वोक्त उस ज्ञानाग्निधारा के ही द्योतक हैं  जो उषा कही जाती है और जिसे अनेक उषाओं अथवा ओषधियों के रूप में भी देखा गया है ।

  उक्त मूल उषा या ओषधि को जिस प्रकार अनेक रूप ग्रहण करने वाली एक रश्मि कहा जाता है , उसी प्रकार वनस्पति शब्द में रश्मि बोधक 'वन' का रूप कल्पित होकर पुन ' वनस्पतयः ' रूप में अनेक रश्मियों का सूचक है । इसी दृष्टि से, ओषधयः और वनस्पतयः कभी कभी साथ- साथ भी प्रयुक्त होते हैं । इससे स्पष्ट है कि दोनों रश्मि रूप होते हुए भी, एक दूसरे से भिन्न हैं । इस भिन्नता की दृष्टि से, वनस्पति के मूल में इच्छा अथवा भावना शक्ति बोधक ' वन ' धातु है , जबकि ओषधि के मूल में दाहार्थक 'उष ' धातु है  । अतः वनस्पति जहां भावना प्रधान गति वाली रश्मियां कही जा सकती हैं , वहीं ओषधियों को ज्ञान प्रधान गति वाली रश्मियां ' कहा जा सकता है । अपने एकीभूत रूप में वनस्पति वह भावरश्मि है जो निर्विकल्प समाधि का कारण बनती है, जबकि ओषधि ज्ञानप्रधान सविकल्प समाधि का कारण बनती है । अतःअथर्ववेद में ओषधि को आसुरी शक्ति को जीतकर वनस्पति रूप रस वाला बताया गया है । उक्त आध्यात्मविज्ञान की दृष्टि से ओषधियों और वनस्पतियों में जो भेद है, उसी के प्रतीक स्वरूप कर्मकाण्ड में भौतिक ओषधियों और वनस्पतियों का प्रयोग हुआ है ।

  अथर्ववेद १.२४.४ में, पृथिवी से उद्भूत सरूपा नामक ओषधि को सरूपकरणी कहा गया है और फिर उसे 'ॐ सु ' ब्रह्म ( पदपाठ रूप ) की साधना करके जिन विभिन्न रूपों को ग्रहण करने वाली बताया गया है , उन्हीं रूपों में उसे पूर्वमन्त्र ( १.२४.१ ) में रामा, कृष्णा और असिक्नी ( क्रमशः सत्त्व, रज और तम की दृष्टि से ) कहा गया है । दूसरे शब्दों में, स्थूल स्तर पृथिवी से ' ॐ सु ' ब्रह्म की साधना के साथ जो चेतना धारा या रश्मियां चलती हैं, वे त्रिविध रूप धारण करती हुई अन्त में वनस्पति ( भावसमाधि ) रूप में परिणत होती हैं । इसी दृष्टि से केनोपनिषद में ब्रह्म के ' तद् वनम् ' इति उपासीत का उपदेश है ।'

- फतहसिंह २२-५-१९९९

 

  डा. फतहसिंह ने ओषधि को प्रकाश या ज्ञान से प्राप्त बुद्धि, चेतना कहा है । यह कथन महाभारत वनपर्व के कथनों से मेल खाता है जहां सब दु:खों में भार्या के अप्रतिम ओषध होने का उल्लेख है । महाभारत शान्ति पर्व में बीज से उत्पन्न ओषधि की तुलना कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न बुद्धि से की गई है । इसका अर्थ यह हुआ कि बुद्धि को सामान्य रूप से ओषधि कहा जा सकता है, चाहे वह अच्छे कर्मों के फलस्वरूप अमृतमय बुद्धि हो या बुरे कर्मों के फलस्वरूप विषतुल्या बुद्धि । भौतिक रूप में ओषधि पृथिवी पर उत्पन्न होती है । आध्यात्मिक रूप में ओषधि आत्मा रूपी पृथिवी से उत्पन्न होती है । लेकिन वैदिक साहित्य में ओषधि के २ रूप हैं - अकृष्टपचच्या व कृष्टपच्या - बिना जोते व जोतने से उत्पन्न । सामान्य शब्दों में अरण्य में उत्पन्न होने वाली ओषधि को अकृष्टपच्या तथा ग्राम में उत्पन्न होने वाली को कृष्टपच्या कहा जा सकता है । लेकिन शतपथ ब्राह्मण ७.२.४.२३ तथा जैमिनीय ब्राह्मण २.५४ से संकेत मिलता है कि आत्मा से उत्पन्न ओषधि अकृष्टपच्या है । आत्मा आकाश की भांति है जिसका कर्षण नहीं किया जा सकता, जिस पर हल नहीं चलाया जा सकता । वैदिक तथा पौराणिक साहित्य में हल चलाने का कार्य, पृथिवी के विदारण का कार्य प्राण करते हैं । अतः आत्मा के स्थूल रूप और प्राणों के संयोग से उत्पन्न ओषधि को कृष्टपच्या कहा जा सकता है । शतपथ ब्राह्मण ५..३.३.८ में कृष्टपच्या ओषधियों को वारुणी कहा गया है । वरुण सत्यानृत के विवेक से कार्य करता है । अतः यहां कर्म प्रधान है । इस आधार पर अकृष्टपच्या ओषधियों को मैत्र प्रकार का कहा जा सकता है ।। मित्र देवता का कार्य माता की तरह सदैव मैत्रीभाव रखना है । तैत्तिरीय आरण्यक ४.११.८, ४.४२.४, ५.९.११ तथा तैत्तिरीय संहिता १.४.४५.२ में भी ओषधियों के हमारे लिए सुमित्र बनने और शत्रुओं के लिए दुर्मित्र बनने की प्रार्थना की गई है । ऋग्वेद ६.१९.५, ७.५०.३, अथर्ववेद १०.४.२१ व १०.४.२२ में ओषधियों के अविषा होने का उल्लेख है । तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.१..२ में पितरों द्वारा रुष्ट होने पर तथा ताण्ड्य ब्राह्मण ६.९.९ में महादेव के रुष्ट होने पर ओषधियों का विष से लेपन करने का उल्लेख है । विष निवारण के लिए उन्हें संतुष्ट करना पडता है । स्पष्ट है कि वैदिक साहित्य का मानना है कि भौतिक शरीर तक में भी जो रोग उत्पन्न हुआ है, वह बुद्धि रूपी ओषधि के, हमारी भार्या के विषाक्त हो जाने से उत्पन्न हुआ है । लेकिन वैदिक साहित्य की ओषधि केवल भौतिक शरीर तक ही सीमित नहीं है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, यह पांच तन्मात्राएं कहलाती हैं । हमारे व्यक्तित्व में इन तन्मात्राओं के दिव्य बनने में जो भी न्यूनता है, वह ओषधि रूपी बुद्धि के विषाक्त होने से है । यास्क के वैदिक निघण्टु में ओषधि को पद नामों के अन्तर्गत रखा गया है । यह पद कौन से हैं , इसकी सम्यक् व्याख्या अपेक्षित है । ओषधि इन पांच तन्मात्राओं से सम्बद्ध हो सकती है, इसके कुछ संकेत पुराणों व वैदिक साहित्य से मिलते हैं । महाभारत कर्ण पर्व में ओषधियां शिव के रथ में घण्टा बनती हैं । अथर्ववेद ११.६.३-६ में प्राण स्तनयित्नु है तो ओषधियां क्रन्दन करती हैं । स्पर्श तन्मात्रा का प्रत्यक्ष उल्लेख दृष्टिगोचर नहीं होता । रूप तन्मात्रा के संदर्भ में वैदिक साहित्य में विस्तृत वर्णन उपलब्ध होते हैं । ओषधियों को वैदिक मन्त्रों में विश्वरूपा कहा गया है ( ऋग्वेद ५.८३.५, अथर्ववेद ६.५९.३ ) । अथर्ववेद १.२४.३ व ४ में ओषधि को सरूपा कहा गया है । यह रूप किस प्रकार का है । जैसा कि डा. फतहसिंह ने अपनी टिप्पणी में उद्घाटित किया है, ओषधि शब्द ओष, प्रकाश से बना है । ओषधियां स्वयं प्रकाशमान हैं । उन्हें देखने के लिए बाहर से प्रकाश की आवश्यकता नहीं पडती, अपितु वह अपने प्रकाश से दूसरों को रूप प्रदान करती हैं । अथर्ववेद ४.२० सूक्त सम्यक् पश्यन्ती योग के लिए है जो आजकल प्रचलित विपश्यना ध्यान साधना का वैदिक मूल है । वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से ( अथर्ववेद९.१२.१५, तैत्तिरीय संहिता ७.५.१७.१, ऐतरेय ब्राह्मण ५.२३, ऐतरेय आरण्यक ५.१.१ ) ओषधियों को पृथिवी का रूप कहा गया है । सामान्य रूप से द्युलोक में दिखाई पडने वाले नक्षत्र रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं । लेकिन यह भी उल्लेख आता है कि पृथिवी पर जो कुछ भी दिखाई देता है , नगर, ग्राम आदि, वह सब नक्षत्रों का रूप है । अगली तन्मात्रा रस का तो वैदिक साहित्य में बहुत ही अधिक वर्णन है । अथर्ववेद ३.३१.१०, ४.१५.२, ४.२७.२, १९.३१.५ आदि में ओषधियों के रस का उल्लेख है । वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से ( अथर्ववेद ४.१५.२, शतपथ ब्राह्मण ३.६.१.७, ३.७.४.४, ४.४.५.२०, ७.२.३.४, १२.८.१.४, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.२.३.६, तैत्तिरीय आरण्यक २.११.१,  तैत्तिरीय संहिता २.४.९.३, ऐतरेय ब्राह्मण ८.८ आदि में ) आपः और ओषधियों के रसों के एक दूसरे से सहयोग करने का उल्लेख आता है । इस सहयोग से अन्नाद्य , अर्थात् दधि, मधु, आज्य की प्राप्ति होती है । तैत्तिरीय संहिता २.१.९.२ का कथन है कि ओषधि मैत्र है जबकि आपः वारुण हैं । ऐतरेय आरण्यक ५.१.१ में कहा गया है कि आपः की भांति रस और ओषधि की भांति रूप प्राप्ति हो । इस आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि ओषधि यदि आपः से संयोग करेगी तो रस और अन्न उत्पन्न होंगे और यदि वायु से, प्राण से संयोग करेगी तो रूप उत्पन्न होगा क्योंकि रूप वायु में होता है । अगली तन्मात्रा गन्ध के संदर्भ में कुछ उल्लेख ( अथर्ववेद ८.६.१०, गोपथ ब्राह्मण १.२.२ आदि ) मिलते हैं । अथर्ववेद २.२७.२ व ५.१४.१ में सूकर द्वारा नाक की सहायता से ओषधि के खनन का उल्लेख है । हो सकता है कि यह भी गन्ध तन्मात्रा से ही संबंधित हों ।

  लिङ्ग पुराण आदि में ब्रह्मा के रोमों से ओषधियों की उत्पत्ति का उल्लेख है । वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से पृथिवी, गौ, सार्पराज्ञी, ऋक्षा, अश्व आदि के लोमों को ओषधि - वनस्पति कहा गया है ( अथर्ववेद ९.१२.१५ ( गौ के लोम ), तैत्तिरीय संहिता ७.४.३.१ ( ऋक्षा द्वारा लोम रूपी ओषधियों की प्राप्ति ), तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.४.५ ( अलोमका ऋक्षा द्वारा अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र की सहायता से लोम रूपी ओषधि प्राप्ति ), ऐतरेय ब्राह्मण ५.२३ ( सार्पराज्ञी द्वारा पृश्नि रूप धारण करने पर लोम ओषधि प्राप्ति ), तैत्तिरीय संहिता ७.५.२५.१ ( अश्व के लोम ) ) । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१०.८.७,ऐतरेय आरण्यक २.४.१ व २.४.२, गोपथ ब्राह्मण १.५.३ तथा जैमिनीय ब्राह्मण २.५४ में मनुष्य के लोमों को ओषधि कहा गया है । रोम या लोम क्या हैं , इसका संकेत हमें रोमहर्षण सूत से मिल सकता है । किसी भय के अथवा हर्ष के उपस्थित होने पर रोम हर्षित हो जाते हैं । लेकिन यह रोम ऐसी बुद्धि में कब रूपान्तरित हो सकते हैं जो ओषधि हो, यह अन्वेषणीय है । स्थूल रूप में, टेपरिकार्डर तथा कम्प्यूटर की फ्लांपी डिस्क आदि में स्मृति के भण्डारण के लिए चुम्बकीय गुण वाले लोम रूपी तन्तुओं को जमाया जाता है । लोमों में प्रायः यह विशेष गुण होता है कि एक लोम का चुम्बक दूसरे लोम के चुम्बक के साथ टकराव नहीं करता, सभी लोमों में अपना स्वतंत्र चुम्बकीय क्षेत्र होता है । अतः

प्रत्येक लोम पर किसी विशेष सूचना का भंडारण किया जा सकता है । यदि लोमों का चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर टकराने लगे तो सारी सूचनाएं परस्पर टकराकर नष्ट हो जाएंगी । लोमों पर स्थित चुम्बकीय क्षेत्र के पठन के लिए एक चुम्बक इनके ऊपर रखा जाता है जिसे हैड कहते हैं । चेतना के क्षेत्र में लोम रूपी बुद्धि या ओषधि का पठन करने वाला मन हो सकता है ।

  हरिवंश पुराण व स्कन्द पुराण में सोम द्वारा पृथिवी के चक्कर लगाने से पृथिवी पर पतित तेज से ओषधियों के उत्पन्न होने की कथा आती है । प्रसिद्ध पुरुष सूक्त ( ऋग्वेद १०.९०.१३ ) के अनुसार पुरुष के मन से चन्द्रमा का उदय हुआ । यदि सोम, चन्द्रमा और मन को एक ही मानें तो यह कहा जा सकता है कि यदि मन ब्रह्माण्ड में न दौडे, इस शरीर रूपी पृथिवी तक ही सीमित हो जाए, अन्तर्मुखी हो जाए, तो इसके तेज से ओषधि उत्पन्न हो सकती है । विद्युत के विज्ञान में यह सर्वविदित है कि जब कोई विद्युत आवेश चक्र के रूप में घूमता है तो उसके केन्द्र पर एक बल उत्पन्न हो जाता है जिसका आजकल मोटर, पंखों आदि में बहुत उपयोग किया जाता है ।

  ब्रह्म पुराण आदि में सोम व ओषधियों के वार्तालाप का वर्णन मिलता है । लौकिक रूप में कहा जाता है कि लुकमान हकीम से ओषधियां वार्तालाप करती थी । अथर्ववेद में सोम और ओषधियों के वार्तालाप का उल्लेख आता है । ऋग्वेद १०.९७.६ व तैत्तिरीय संहिता ४.२.६.२ में ओषधियों व सोम की तुलना राजा और उसकी समिति से की गई है । डा. फतहसिंह के अनुसार सभा में सदस्यों के विचार भिन्न - भिन्न हो सकते हैं, लेकिन समिति में सबके एक से विचार होते हैं ।

  पुराणों में १७ ग्राम्य व १४ आरण्यक ओषधियों के नामों के सार्वत्रिक उल्लेख के संदर्भ में, वैदिक साहित्य में तैत्तिरीय संहिता ४.२.६, ७.३.४.१ आदि में केवल ७ ग्राम्य और ७ आरण्यक ओषधियों का उल्लेख मात्र आता है, उनके नामों का उल्लेख केवल सायण ने अपनी टीका में किया है । ब्रह्माण्ड पुराण में इस पहेली का हल ऐसे किया गया है कि ७ ग्राम्य व ७ आरण्यक ओषधियां अकृष्टपच्या हैं ,जबकि १७ ग्राम्य व १४ आरण्यक ओषधियां कृष्टपच्या हैं । इन ओषधियों के नामों का क्या निहितार्थ हो सकता है, यह अन्वेषणीय है । पृथिवी रूपी गौ के दोहन से ओषधियों की उत्पत्ति के पुराणों के सार्वत्रिक उल्लेख के संदर्भ में, अथर्ववेद ८.११.७ में विराज गौ के चार स्तनों में से रथन्तर स्तन से देवों द्वारा इन्द्र को वत्स बनाकर ओषधि दोहन का उल्लेख है । यह कल्पना की जा सकती है कि गौ के दोहन द्वारा जो ओषधियां प्राप्त होंगी, वह कृष्टपच्या ओषधियों की श्रेणी में आएंगी जहां प्राण द्वारा कर्षण किया गया है । ब्राह्मण ग्रन्थों में गौ को वाक्, प्राण, इन्द्रिय, यज्ञ आदि कहा गया है ( मैत्रायणी संहिता ४.२.३, शतपथ ब्राह्मण ४.३.४.२५, मैत्रायणी संहिता ३.११.४, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.९.८.३ ) । प्रश्न यह है है कि ओषधि दोहन के लिए पुराणों ने गौ को ही क्यों चुना, अजा व अवि को क्यों नहीं ? साम या भक्ति में अजा, अवि, गौ व अश्व क्रमशः हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ व प्रतिहार भक्तियों के प्रतीक हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि अजा व अवि स्तरों में पाप विद्यमान है । यह तो ओषधि या बुद्धि की वर्तमान अवस्था को उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं । जो भैषज्य कर्म वाली ओषधि होगी, उसका गौ से दोहन करना पडेगा । गौ के शरीर में सारे देवों का वास होता है  । जहां गौ है, वहां असुर टिक ही नहीं सकते ।

  वाल्मीकि रामायण में द्रोण, चन्द्र व महोदय पर्वतों पर दिव्य ओषधियों की उत्पत्ति का उल्लेख आता है । इनमें से द्रोण पर्वत के संदर्भ में , कर्मकाण्ड में हविर्धान मण्डप में सोमरथ के अग्रभाग में दशापवित्र नामक छलनी बांधकर उसमें से सोमरस को छाना जाता है । छने हुए सोम को द्रोणकलश में एकत्र किया जाता है । यह पात्र उदुम्बर काष्ठ का बना होता है तथा इसका मुख ॐ के आकार का होता है । इस पात्र में से फिर अन्य पात्रों में सोम भरा जाता है । जैमिनीय ब्राह्मण १.३५५ में सुपर्ण का आख्यान आता है । सुपर्ण जब स्वर्ग से सोम का आहरण कर रहा था, उसकी कुछ बूंदें पृथिवी पर गिर पडी । वहां ओषधियां उत्पन्न हुई । सोमकलश जिसका सुपर्ण आहरण कर रहा था, द्रोण कलश हो सकता है । द्रोणकलश में ही सोम रस सबसे शुद्ध अवस्था में रहता है । पुराणों व ब्राह्मणों में ओषधियों का उत्पत्ति स्थान पर्वतों पर होना एक और पहेली है । शतपथ ब्राह्मण ३.४.३.१३ व ४.२.५.१६ के अनुसार इन्द्र ने वृत्र का हनन किया । उसका जो सोम रूपी शरीर था, वही पर्वत बना । उस पर ओषधियां उत्पन्न हुई । ऋग्वेद १.५९.३ व १.१०८.११ में पर्वत व ओषधि शब्द साथ - साथ प्रकट हुए हैं । डा. फतहसिंह का कहना है कि अमर्त्य स्तर पर भक्ति का प्रतीक नारद है तो मर्त्य स्तर पर पर्वत ।

  ओषधि के संदर्भ में वैदिक साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे अधिक अस्पष्ट पहलू ओष शब्द है  । ओषधि शब्द की निरुक्ति इस प्रकार की जाती है कि ओषम् दधाति इति , जो ओष को धारण करे । ऋग्वेद १.१३०.८ (ओष ), १.१७५.३ (ओष ), १०.११९.१० (ओष ), अथर्ववेद २.३६.१ (ओष ), ७.७७.६ (ओष ), १२.३.३१ (ओष ), १२.१०.८ ( ओष ), १२.११.११ ( ओष ), १२.११.१२, १९.२९.७ ( ओष, ४ बार ), शतपथ ब्राह्मण १.९.३.२ आदि में ओष शब्द प्रकट हुआ है और सायण द्वारा इसका अर्थ दाह किया गया है, जो शत्रुओं का दाह करे । लेकिन अथर्ववेद १०.२९.७ में शत्रुओं के लिए ओष और दह का साथ- साथ प्रयोग किया गया है । हिन्दी भाषा में रात में बरसने वाले जल को ओस कहते हैं जो शीतल माना जाता है । आटा जल डालकर ओसना जाता है । यास्क के निघण्टु में ओषम् क्षिप्र नामानि के अन्तर्गत है । यह उल्लेखनीय है कि वैदिक मन्त्रों में ओष शब्द २ प्रकार से प्रकट हो रहा है - ओ अनुदात्त  व ओ उदात्त । शतपथ ब्राह्मण १.९.३.२ से संकेत मिलता है कि ओष के यह २ रूप देवयान व पितृयान पथों से सम्बन्धित हो सकते हैं । ओषधि शब्द वेद में जिस रूप में प्रकट हो रहा है , उसमें ओ उदात्त है । आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से ओष को उषा शब्द से , अव्यवस्था के माप से , एन}ट्रांपी से सम्बद्ध किया जा सकता है जिसके लिए उषा शब्द पर टिप्पणी पठनीय है । बौधायन श्रौत सूत्र २१.१२ में उषसा नामक ओषधि का उल्लेख है । शतपथ ब्राह्मण ६.५.४.४ में ओषधि, जिसे देवों की पत्नी कहा गया है, उखा को पृथिवी पर रखती है । उखा भी उषा का रूप है । यह उल्लेखनीय है कि उषा मुख्य रूप से सूर्य से सम्बन्धित है , जबकि ओषधि चन्द्र या सोम से । उषा सूर्य की पत्नी है जबकि ओषधियां चन्द्रमा की पत्नियां हैं । सूर्य उष्ण है जबकि चन्द्रमा शीतल । आधुनिक भौतिक विज्ञान के तापगतिकी के दूसरे नियम को यदि हृदयङ्गम कर लिया जाए तो सूर्य और चन्द्रमा के अस्तित्व को समझने में सहायता मिल सकती है । भौतिक विज्ञान का यह सिद्धान्त किसी वस्तु में कितनी अव्यवस्था है, इसके मापन से सम्बन्धित है । यह अव्यवस्था आयतन के सापेक्ष हो सकती है , सूचना या ज्ञान या चेतना के सापेक्ष हो सकती है, आदि आदि । आयतन के सापेक्ष अव्यवस्था को इस प्रकार समझा जा सकता है कि मान लिया जाए कि एक पशु को केवल उसके पिंजरे में ही घूमने की स्वतन्त्रता है जबकि दूसरे पशु को पूरे जंगल में घूमने की स्वतन्त्रता है तो दूसरे पशु में अधिक अव्यवस्था है । इस अव्यवस्था के सम्यक् मापन को भौतिक विज्ञान में एण्ट्रांपी नाम दिया गया है । सूचना के क्षेत्र में, इस प्रकार कहा जाता है कि किसी वस्तु के बारे में जितनी सूचना हमें ज्ञात है और जितनी अज्ञात है, उसमें अज्ञात सूचना की मात्रा अव्यवस्था का, एण्ट्रांपी का मापक है । अज्ञात सूचना जितनी अधिक होगी, एण्ट्रांपी उतनी ही अधिक होगी । इसके विपरीत, जितनी अधिक सूचना ज्ञात होगी, एण्ट्रांपी उतनी ही कम होती जाएगी । जब ऊर्जा या ऊष्मा के सापेक्ष एण्ट्रांपी पर विचार करना होता है तो किसी पदार्थ में ऊर्जा और तापमान का अनुपात क्या है, इस पर एण्ट्रांपी निर्भर करती है । भौतिक संसार में वर्तमान ओषधियों के बारे में विचार करे तो ओषधियां सूर्य से प्राप्त तेज से अपने भोजन का निर्माण करती हैं जिसे प्रकाश संश्लेषण, फोटोसिन्थेसिस कहा जाता है । कोसानजो व रुबिनो (न्युओवो सिमेण्टो  ग्रंथ५३,संख्या१,पृष्ठ४५ सितम्बर१९७९ )के अनुसार ओषधि प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपने लिए उन्हीं रासायनिक पदार्थों का निर्माण करती है जिनकी एण्ट्रांपी न्यूनतम होती है । ऊर्जा संतुलन रखने के लिए उच्चतर एन्ट्रांपी वाले जिन पदार्थों का निर्माण होता होगा, उनका अन्य किसी प्रकार से क्षय हो जाता होगा । इसका निहितार्थ यह भी ले सकते हैं कि ओषधि जो फल उत्पन्न करती है , वह न्यूनतम एन्ट्रांपी की वस्तु है, सबसे अधिक व्यवस्थित वस्तु है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि ओषधि जो व्यवस्था उत्पन्न करती है , वह चन्द्रमा से संबंधित है और ओषधि जो अव्यवस्था उत्पन्न करती है , वह सूर्य से । तापगतिकी के नियम के अनुसार यदि तापमान में वृद्धि की जाती है तो एन्ट्रांपी में , अव्यवस्था में भी वृद्धि ही हो सकती है, ह्रास नहीं । अतः चन्द्रमा की स्थिति को, शीतल स्थिति को प्राप्त करने के लिए एन}टपी में ह्रास होना चाहिए ।  रामायण में उल्लेख आता है कि राम और लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करने के लिए ओषधि का ग्रहण उषा काल होने से पूर्व ही होना चाहिए । उषा के लिए उषा शब्द की टिप्पणी में कहा गया है कि उषा समाधि अवस्था से जागने पर उत्पन्न हुई अव्यवस्था का प्रतीक है, अथवा समाधि से जागने के लिए उषा रूपी अव्यवस्था को उत्पन्न करना आवश्यक है । इसके विपरीत सोचें तो समाधि में जाने के लिए अव्यवस्था को कम करना आवश्यक है । क्या कोई ओषधि इस अव्यवस्था को कम कर सकती है ? स्थूल शरीर के सम्बन्ध में विचार करे तो आजकल की ओषधियों को २ वर्गों में बांटा जा सकता है । एक वर्ग तो वह जो शरीर की कोशिकाओं की सृजन क्रिया को रोकता है । इस वर्ग में एण्टीबायोटिक ओषधियां आती हैं । कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करने के लिए भी एक विष ओषधि द्वारा समस्त शरीर की कोशिकाओं का सृजन कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है , यहां तक कि केश भी झड जाते हैं । यह अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर जाने की , समाधि की ओर जाने की प्रक्रिया का प्रतीक है । दूसरी ओर, ऐसी ओषधियों का सेवन जिससे शरीर में वृद्धि हो, अव्यवस्था की ओर जाने का प्रतीक है । अथर्ववेद १.२३.१ में ओषधि को रात्रि में उत्पन्न कहा गया है ।

  अथर्ववेद १.२४.४ में ओषधि के साथ ऊ सु शब्दों का प्रयोग हुआ है । ऋग्वेद १.१३९.७, ३.३३.९, ७.५९.७, ८.२.१९, ८.७.३३ में प्रकट ओषु व मोषु के साथ ओष शब्द की तुलना विचारणीय है । डा. फतहसिंह के अनुसार ओषु व मोषु चेतना की अन्तर्मुखी व बहिर्मुखी धाराएं हैं । उनका यह भी कहना है कि श्री रजनीश ने अपने लिए जो ओशो सम्बोधन चुना है और जिसका अर्थ प्यारा होता है, वह भी ओषु से बना है । क्या ओष शब्द में ऐसी कोई संभावना है जिसमें प्रेम उत्पन्न हो सके ? इसका उत्तर आधुनिक भौतिक विज्ञान में चुम्बकत्व तथा अतिचालकता की घटना द्वारा दिया जा सकता है । बहुत से पदार्थों में चुम्बकत्व या आकर्षण शक्ति निर्बल होती है । सामान्य तापमान पर पदार्थ के कण इतने क्षुभित होते हैं कि वहां चुम्बकीय शक्ति संघटित नहीं हो पाती । यदि तापमान को एक सीमा से कम कर दिया जाए तो वह चुम्बकीय आकर्षण प्रबल रूप में प्रकट हो जाता है । इस घटना को समाधि के सूक्ष्म स्तर पर भी घटाने का प्रयास किया जा सकता है । समाधि को तापमान कम करने के तुल्य माना जा सकता है । बहुत सी शक्तियां जो क्षोभ के कारण व्यक्त नहीं हो पा रही थी, व्यक्त होने लगेंगी । प्रेम इनमें से एक है । यह ओषधियां कैसे उत्पन्न हों, पुराणों व वैदिक साहित्य में इसका उत्तर यज्ञ आदि का सम्पादन दिया गया है ।   अन्य बहुत से पौराणिक व वैदिक संदर्भ अभी अनुत्तरित हैं । उनमें से एक है पुराणों द्वारा ओषधियों को फलपाकान्त कहना । वैदिक साहित्य में ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं है । ऋग्वेद ७.१०.१, अथर्ववेद ३.१७.५, शतपथ ब्राह्मण ६.४.४.१७, तैत्तिरीय आरण्यक १.२९.१, तैत्तिरीय संहिता १.२.२.३, १.३.६.१, ४.१.२.४, ४.१.४.४, ६.१.३.७, ६.३.४.२, ७.५.२०.१, जैमिनीय ब्राह्मण १.७२ में ओषधियों के सुपिप्पला होने की कामना की गई है । तैत्तिरीय संहिता ६.१.३.७ का कथन है कि मन्त्रों में ओषधयः सुपिप्पला कहा जाता है, इसलिए ओषधियां फल ग्रहण करती हैं । तैत्तिरीय संहिता ६.३.४.२ का कथन है कि ओषधयः सुपिप्पला कह कर उनको यूप के ऊपरी भाग पर स्थित चक्राकार चषाल नामक भाग पर छोडा जाता है, इस कारण से ओषधियां शीर्ष में फल ग्रहण करती हैं । अश्वत्थ के फल को पिप्पल कहा जाता है । अश्वत्थ के लिए माना जाता है कि उसका मूल हिरण्यय कोश में है और शाखाएं नीचे के कोशों में । यही तथ्य ओषधियों के लिए मानने पर इसका अर्थ होगा कि ओषधियां समाधि अवस्था से प्राप्त फल को निचले कोशों में वितरित कर रहीं हैं ।

   ऋग्वेद ७.४.५, ८.४३.९, १०.१.२, १०.९१.६, अथर्ववेद ५.२५.७, शतपथ ब्राह्मण १२.४.४.४, तैत्तिरीय संहिता ४.१.४.२ व ४.२.३.३ में अग्नि को ओषधि का गर्भ कहा गया है । ऋग्वेद ५.८३.१, ७.१०१.१, ७.१०२.२, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.४.५.५, तैत्तिरीय आरण्यक १.२९.१ आदि में पर्जन्य का ओषधि के गर्भ के रूप में उल्लेख है । निहितार्थ अपेक्षित है ।

  लिङ्ग पुराण में सूर्य द्वारा ओषधियों में बल रखने का उल्लेख है । जैमिनीय ब्राह्मण १.७ के अनुसार आदित्य अस्त होकर ओषधि में ऊर्ज रूप में प्रवेश करता है । तैत्तिरीय संहिता ३.४.७.१ में ऊर्ज नामक ओषधि अप्सरा व अग्नि नामक गन्धर्व का उल्लेख है । पुराणों में साम्ब आदि कुष्ठ से पीडित होने पर सूर्य की उपासना से रोगमुक्त होते हैं । यह विचारणीय है कि रोगमुक्त होने के लिए ओषधि- पति चन्द्रमा की आराधना करनी चाहिए या सूर्य की ? ऐतरेय ब्राह्मण ३.४० के अनुसार अग्निष्टोम यज्ञ में सोम क्रय के रूप में ओषधि का क्रय करने से समस्त ओषधियों का क्रय हो जाता है और फिर पूरे अग्निष्टोम यज्ञ द्वारा भेषज कर्म किया जाता है । तैत्तिरीय संहिता में ओषधि को ऊर्ज अप्सरा कहने से तात्पर्य यह हो सकता है कि सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने पर ओषधि बहिर्मुखी अप्सरा का रूप धारण कर लेती हो ।

  ब्राह्मण ग्रन्थों में ओषधि के संदर्भ में दिशाओं का भी उल्लेख मिलता है । शतपथ ब्राह्मण ३.२.३.१९ के अनुसार ओषधि ऊर्ध्वा दिशा, जो अदिति की दिशा है, में रोहण करती है । ऐतरेय ब्राह्मण १.७ के अनुसार दक्षिण दिशा में ओषधियों का पचन पहले होता है जिसमें अग्नि कारण है । इसकी व्याख्या भौगौलिक द्रष्टान्त द्वारा की गई है । तैत्तिरीय संहिता ४.४.१२.४ में ओषधि के लिए ऊर्ध्वा दिशा को रन्ति नाम दिया गया है । तैत्तिरीय संहिता १.६.५.२ में ओषधि के लिए उदीची दिशा में मार्जन का निर्देश है । अथर्ववेद ३.२६.५, १२.३.५९ व १५.६.१ में ध्रुवा दिशा में ओषधि को इषुमती कहा गया है ।

  अथर्ववेद १२.३.३१ व तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.२.२.१ में ओषधि का पर्शु द्वारा छेदन करने का उल्लेख आता है । ओषधि छेदन के लिए जिस पर्शु का उपयोग किया जाता है , उसे तैत्तिरीय ब्राह्मण में अश्वपर्शु कहा  गया है । यह भी कहा गया है कि जो ओषधि को पर्वशः जानता है, वह ओषधि छेदन में इसकी हिंसा नहीं करता । प्रजापति ओषधि को पर्वशः जानते हैं ।

  शतपथ ब्राह्मण ७.२.४.२६, ११.६.१.१० व तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.५६ में ओषधि को पुरुष या मनुष्य का रूप दिया गया है । शतपथ ब्राह्मण ११.६.१.१० में तो प्रश्न किया गया है कि वह पुरुष कौन सा है जिसका पुरुष द्वारा भक्षण किया जाता है ? वह पुरुष ओषधि ही है ।

  अथर्ववेद १९.३२ व ३३ सूक्त दर्भ ओषधि के लिए हैं । शतपथ ब्राह्मण ७.२.३.१, ऐतरेय आरण्यक १.२.३, तथा तैत्तिरीय आरण्यक २.११.१ में दूर्वा को मेध्य, शुद्ध आपः कहा गया है जिससे यज्ञीय आसन, वास, रज्जु आदि बनाते हैं । ऐतरेय ब्राह्मण ८.८ के अनुसार दूर्वा ओषधियों में क्षत्र है ।

  तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.५.१, तैत्तिरीय आरण्यक ३.८.१, तैत्तिरीय संहिता ६.२.४.५, ६.३.९.५, ऐतरेय ब्राह्मण २.६, ५.२८ आदि में ओषधि के रूप में बर्हि का उपयोग किया गया है । शतपथ ब्राह्मण ११.१.७.२ के अनुसार आरण्यक ओषधि बर्हि के मेध के समान है ।

  पुराणों में ओषधियों के स्वयंप्रभा वाली होने के कथन का वैदिक साहित्य में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता । तैत्तिरीय आरयक ४.१२.१ में महावीर पात्र या घर्म के संदर्भ में आपः व ओषधियों के रस को ज्योति:भा कहा गया है ।

  शतपथ ब्राह्मण ६.४.४.२ में ओषधि माताओं से अश्व की उत्पत्ति का उल्लेख है ।

  यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद व अथर्ववेद के लगभग सभी ओषधि सूक्त अनुष्टुप् छन्द में हैं ।

 

संदर्भ

ओषधि

*या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु या मानुषेष्वसि तस्य राजा ॥ अग्निर्वैश्वानरः -ऋ. १.५९.३

*मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥ -ऋ. १.९०.६

*या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु। तेभिर्नो विश्वैः सुमना अहेळन् राजनत्सोम प्रति हव्या गृभाय ॥ -ऋ. १.९१.४

*त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः। -ऋ. १.९१.२२

*पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश। वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम् ॥ -ऋ. १.९८.२

*स गा अविन्दत् सो अविन्ददश्वान् त्स ओषधीः सो अपः स वनानि ॥ -ऋ. १.१०३.५

*यदिन्द्राग्नी दिवि ष्ठो यत् पृथिव्यां यत् पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु। -ऋ. १.१०८.११

*मनवे शासदव्रतान् त्वचं कृष्णामरन्धयत्। दक्षन्न विश्वं तृतषाणमोषति न्यर्शसानमोषति ॥ -ऋ. १.१३०.८

*अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष आ पदे गोः। यदा ते मर्तो अनु भोगमानळादिद् ग्रसिष्ठ ओषधीरजीगः ॥ -ऋ. १.१६३.७

*दिव्यं सुपर्णं वायसं बृहन्तमपां गर्भं दर्शतमोषधीनाम्। अभीपतो वृष्टिभिस्तर्पयन्तं सरस्वन्तमवसे जोहवीमि ॥ -ऋ. १.१६४.५२

*विश्वो वो अज्मन् भयते वनस्पती रथीयन्तीव प्र जिहीत ओषधिः ॥ (मरुतः) -ऋ. १.१६६.५

*त्वं हि शूर सनिता चोदयो मनुषो रथम्। सहावान् दस्युमव्रतमोषः पात्रं न शोचिषा ॥ -ऋ. १.१७५.३

*र्यपामोषधीनां परिंशमारिशामहे। वातापे पीव इद् भव ॥ -ऋ. १.१८७.७

*करम्भ ओषधे भव पीवो वृक्कù उदारथि:। वातापे पीव इद् भव ॥ -ऋ. १.१८७.१०

*त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः ॥ (अग्निः) -ऋ. २.१.१

*वि यो भरिभ्रदोषधीषु जिह्वामत्यो न रथ्यो दोधवीति वारान् ॥( अग्निः) -ऋ. २.४.४

*अपां गर्भं दर्शतमोषधीनां वना जजान सुभगा विरूपम्। (अग्निः) -ऋ. ३.१.१३

*सद्यो जात ओषधीभिर्ववक्षे यदी वर्धन्ति प्रस्वो घृतेन। (अग्निः) -ऋ. ३.५.८

*अग्ने यत् ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र। -ऋ. ३.२२.२

*इन्द्र ओषधीरसनोदहानि वनस्पतीरसनोदन्तरिक्षम्। -ऋ. ३.३४.१०

*इन्द्राय द्याव ओषधीरुतापो रयिं रक्षन्ति जीरयो वनानि ॥ -ऋ.३.५१.५

*सदा सुगः पितुमाँ अस्तु पन्था मध्वा देवा ओषधीः सं पिपृक्त। -ऋ. ३.५४.२१

*निष्षिध्वरीस्त ओषधीरुतापो रयिं त इन्द्र पृथिवी बिभर्ति। -ऋ. ३.५५.२२

*सुक्षेत्राकृण्वन्ननयन्त सिन्धून् धन्वातिष्ठन्नोषधीर्निम्नमापः ॥ (ऋभवः) -ऋ. ४.३३.७

*मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम्। -ऋ. ४.५७.३

*स वावृधान ओषधीभिरुक्षितो३ ऽभि ज्रयांसि पार्थिवा वि तिष्ठसे ॥ (अग्निः) -ऋ. ५.८.७

*धन्या सजोषा धिषणा नमोभिर्वनस्पतीfरोषधी राय एषे ॥ -ऋ. ५.४१.८

*आप ओषधीरुत नोऽवन्तु द्यौर्वना गिरयो वृक्षकेशाः ॥ -ऋ. ५.४१.११

*प्रैषः स्तोमः पृथिवीमन्तरिक्षं वनस्पतीfरोषधी राये अश्याः। -ऋ. ५.४२.१६

*ग्ना वसान ओषधीरमृध्रस्त्रिधातुशृङ्गो वृषभो वयोधाः ॥ -ऋ. ५.४३.१३

*अधारयतं पृथिवामुत द्यां मित्रराजाना वरुणा महोभिः। वर्धयतमोषधीः पिन्वतं गा अव वृष्टिं सृजतं जीरदानू ॥। -ऋ. ५.६२.३

*कनिक्रदद् वृषभो जीरदानू रेतो दधात्योषधीषु गर्भम् ॥ (पर्जन्यः) -ऋ. ५.८३.१

*प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युत उदोषधीर्जिहते पिन्वते स्वः। इरा विश्वस्मै भुवनाय जायते यत् पर्जन्यः पृथिवीं रेतसावति ॥ -ऋ. ५.८३.४

*यस्य व्रत ओषधीर्विश्वरूपाः स नः पर्जन्य महि शर्म यच्छ ॥ -ऋ. ५.८३.५

*अजीजन ओषधीर्भोजनाय कमुत प्रजाभ्योऽविदो मनीषां ॥ -ऋ. ५.८३.१०

*दिवो न यस्य विधतो नवीनोद् वृषा रुक्ष ओषधीषु नूनोत्। -ऋ. ६.३.७

*अद्रोघो न द्रविता चेतति त्मन्नमर्त्योऽवर्त्र ओषधीषु ॥ (अग्निः) -ऋ. ६.१२.३

*प्र पूषणं विष्णुमग्निं पुरंधिं सवितारमोषधीः पर्वतांश्च ॥ -ऋ. ६.२१.९

*अप ओषधीरविषा वनानि गा अर्वतोv नॄनृचसे रिरीहि ॥।( इन्द्रः) -ऋ. ६.३९.५

*तदोषधीभिरभि रातिषाचो भगः पुरंधिर्जिन्वतु प्र राये ॥ -ऋ. ६.४९.१४

*पर्जन्यो न ओषधीभिर्मयोभुरग्निः सुशंसः सुहवः पितेव ॥ -ऋ. ६.५२.६

*तमोषधीश्च वनिनश्च गर्भं भूमिश्च विश्वधायसं बिभर्ति ॥ (अग्निः) -ऋ. ७.४.५

*वि भा अकः ससृजानः पृथिव्यां कृष्णपविरोषधीभिर्ववक्षे ॥( अग्निः) -ऋ. ७.८.२

*तन्नो रायः पर्वतास्तन्न आपस्तद् रातिषाच ओषधीरुत द्यौः। वनस्पतिभिः पृथिवी सजोषा उभे रोदसी परि पासतो नः ॥ -ऋ. ७.३४.२३

*तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप ओषधीर्वनिनो जुषन्त। -ऋ. ७.३४.२५

*शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥ -ऋ. ७.३५.५

*यच्छल्मलौ भवति यन्नदीषु यदोषधीभ्यः परि जायते विषम्। विश्वे देवा निरितस्तत् सुवन्तु मा मां पद्येन रपसा विदत् त्सरुः ॥ -ऋ. ७.५०.३

*सं यद्धनन्त मन्युभिर्जनासः शूरा यह्वीष्वोषधीषु विक्षु। अध स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रातारो भूत पृतनास्वर्यः ॥ -ऋ. ७.५६.२२

*तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप ओषधीर्वनिनो जुषन्त। -ऋ. ७.५६.२५

*प्रोरोर्मित्रावरुणा पृथिव्याः प्र दिव ऋष्वाद्~ बृहतः सुदानू। स्पशो दधाथे ओषधीषु विक्ष्वृधग्यतो अनिमिषं रक्षमाणा ॥ -ऋ. ७.६१.३

*यानि स्थानान्यश्विना दधाथे दिवो यह्वीष्वोषधीषु विक्षु। नि पर्वतस्य मूर्धनि सदन्तेषं जनाय दाशुषे वहन्ता ॥ -ऋ.७.७०.३

*चनिष्टं देवा ओषधीष्वप्सु यद्योग्या अश्नवैथे ऋषीणाम्। -ऋ. ७.७०.४

*तिस्रो वाचः प्र वद ज्योतिरग्रा या एतद् दुह्रे मधुदोघमूधः। स वत्सं कृण्वन् गर्भमोषधीनां सद्यो जातो वृषभो रोरवीति ॥ (पर्जन्यः) ॥ -ऋ. ७.१०१.१

*यो वर्धन ओषधीनां यो अपां यो विश्वस्य जगतो देव ईशे। स त्रिधातु शरणं शर्म यंसत् त्रिवर्तु ज्योतिः स्वभिष्ट्यस्मे ॥ -ऋ. ७.१०१.२

*मयोभुवो वृष्टयः सन्त्वस्मे सुपिप्पला ओषधीर्देवगोपाः ॥ -ऋ. ७.१०१.५

*यो गर्भमोषधीनां गवां कृणोत्यर्वताम्। पर्जन्यः पुरुषीणाम् ॥ -ऋ. ७.१०२.२

*यदप्सु यद्वनस्पतौ यदोषधीषु पुरुदंससा कृतम्। तेन माविष्टमश्विना ॥ -ऋ. ८.९.५

*आ पशुं गासि पृथिवीं वनस्पतीनुषासा नक्तमोषधीः। -ऋ. ८.२७.२

*धासिं कृण्वान ओषधीर्बप्सदग्निर्न वायति। पुनर्यन् तरुणीरपि ॥ -ऋ. ८.४३.७

*अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे। गर्भे सञ्जायसे पुनः ॥। -ऋ. ८.४३.९

*निष्षिध्वरीरोषधीराप आस्तामिन्द्रावरुणा महिमानमाशत। -ऋ. ८.५९.२

*स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते ॥ शं राजन्नोषधीभ्यः ॥ -ऋ. ९.११.३

*पवस्वाद्भ्यो अदाभ्यः पवस्वौषधीभ्यः। पवस्व धिषणाभ्यः ॥ -ऋ. ९.५९.२

*आ यो गोभिः सृज्यत ओषधीष्वा देवानां सुम्न इषयन्नुपावसुः  । आ विद्युता पवते धारया सुत इन्द्रं सोमो मादयन् दैव्यं जनम् ॥ -ऋ. ९.८४.३

*जरतीभिरोषधीभिः पर्णेभि शकुनानाम् ॥ कार्मारो अश्मभिर्द्युभिर्हिरण्यवन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ -ऋ. ९.११२.२

*स जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ओषधीषु। चित्रः शिशुः परि तमांस्यक्तून् प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गा: ॥ -ऋ. १०.१.२

*सूर्यं चक्षुर्गच्छतु वातमात्मा द्यां च गच्छ पृथिवीं च धर्मणा। अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः ॥ -ऋ. १०.१६.३

*पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं वचः। अपां पयस्वदित् पयस्तेन मा सह शुन्धत ॥ -ऋ. १०.१७.१४

*याभिः सोमो मोदते हर्षते च कल्याणीभिर्युवतिभिर्न मर्यः। ता अध्वर्यो अपो अच्छा परेहि यदासिञ्चा ओषधीभिः पुनीतात् ॥ -ऋ. १०.३०.५

*ऐच्छाम त्वा बहुधा जातवेद प्रविष्टमग्ने अप्स्वोषधीषु। -ऋ. १०.५१.३

*प्रयाजान् मे अनुयाजाfश्च केवलानूर्जस्वन्तं हविषो दत्त भागम्। घृतं चापां पुरुषं चौषधीनामग्नेश्च दीर्घमायुरस्तु देवाः ॥ -ऋ. १०.५१.८

*यत् ते अपो यदोषधीर्मनो जगाम दूरकम्। तत् त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥ -ऋ. १०.५८.७

*ब्रह्म गामश्वं जनयन्त ओषधीर्वनस्पतीन् पृथिवीं पर्वताँ अपः। -ऋ. १०.६५.११

*द्यावापृथिवी जनयन्नभि व्रता ऽऽप ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया। -ऋ. १०.६६.९

*आप ओषधीः प्रतिरन्तु नो गिरो भगो रातिर्वाजिनो यन्तु मे हवम् ॥ -ऋ. १०.६६.१०

*पृथिव्यामतिषितं यदूधः पयो गोष्वदधा ओषधीषु ॥ -ऋ. १०.७३.९

*सोमं मन्यते पपिवान् यत् संपिंषन्त्योषधिम्। सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन ॥ -ऋ. १०.८५.३

*विषं गवां यातुधानाः पिबन्त्वा वृश्च्यन्तामदितये दुरेवाः। परैनान् देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम् ॥ -ऋ. १०.८७.१८

*तस्य देवाः पृथिवी द्यौरुतापो ऽरणयन्नोषधीः सख्ये अस्य ॥ -ऋ. १०.८८.२

*तमू अकृण्वन् त्रेधा भुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः ॥ -ऋ. १०.८८.१०

*अन्वह मासा अन्विद्वनान्यन्वोषधीरनु पर्वतासः। अन्विन्द्रं रोदसी वावशाने अन्वापो अजिहत जायमानम् ॥ -ऋ. १०.८९.१३

*यदोषधीरभिसृष्टो वनानि च परि स्वयं चिनुषे अन्नमास्ये। -ऋ. १०.९१.५

*तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः। तमित् समानं वनिनश्च वीरुधो ऽन्तर्वतीश्च सुवते च विश्वहा॥ -ऋ. १०.९१.६

*या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यत्रियुगं पुरा। मनै नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥ -ऋ. १०.९७.१

*ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः। अश्वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्ण्व: ॥ -ऋ. १०.९७.३

*ओषधीरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ब्रुवे। सनेयमश्वं गां वास आत्मानं तव पूरुष ॥ -ऋ. १०.९७.४

*अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गोभाज इत् किलासथ यत् सनवथ पूरुषम् ॥ -ऋ. १०.९७.५

*यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव। विप्रः स उच्यते भिषग् रक्षोहामीवचातनः ॥ -ऋ.१०.९७.६

*अश्वावती सोमावतीमूर्जयन्तीमुदोजसम्। आवित्सि सर्वा ओषधीरस्मा अरिष्टतातये ॥ -ऋ. १०.९७.७

*उच्छुष्मा ओषधीनां गावो गोष्ठादिवेरते। धनं सनिष्यन्तीनामात्मानं तव पूरुष। -ऋ. १०.९७.८

*अति विश्वाः परिष्ठाः स्तेन इव व्रजमक्रमु:। ओषधीः प्राचुच्यवुर्यत् किं च तन्वो३ रपः ॥ -ऋ. १०.९७.१०

*यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त आदधे। आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा ॥। -ऋ. १०.९७.११

*यस्योषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः। ततो यक्ष्मं वि बाधध्व उग्रो मध्यमशीरिव ॥ -ऋ. १०.९७.१२

*अवपतन्तीरर्वन् दिव ओषधयस्परि। यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः ॥ -ऋ. १०.९७.१७

*या ओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिता पृथिवीमनु। बृहस्पतिप्रसूता अस्यै सं दत्त वीर्यम् ॥ -ऋ. १०.९७.१९

*ओषधयः सं वदन्ते सोमेन सह राज्ञा। यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि ॥ -ऋ. १०.९७.२२

*त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा उपस्तयः। उपस्तिरस्तु सो३स्माकं यो अस्माf अभिदासति ॥ -ऋ. १०.९७.२३

*ओषमित् पृथिवीमहं जङ्घनानीह वेह वा। कुवित्सोमस्यापामिति ॥ -ऋ. १०.११९.१०

*इमां सनाम्योषधिं वीरुधं बलवत्तमाम्। यया सपत्नीं बाधते यया संविन्दते पतिम्। - - - -ऋ.१०.१४५.१

*मयोभूर्वातोv अभि वातूस्रा ऊर्जस्वतीरोषधीरा रिशन्ताम्। पीवस्वतीर्जीवधन्याः पिबन्त्ववसाय पद्वते रुद्र  मृळ ॥ -ऋ. १०.१६९.१

*अहं गर्भमदधामोषधीष्वहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः। -ऋ. १०.१८३.३

*नक्तंजातास्योषधे रामे कृष्णे असिक्नि च। इदं रजनि रजय किलासं पलितं च यत् ॥ - अथर्ववेद १.२३.१

*असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव। असिक्न्यस्योषधे निरितो नाशया पृषत् ॥- अ.१.२३.३

*ये देवा दिवि ष्ठ ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष ओषधीषु पशुष्वप्स्वन्तः। ते कृणुत जरसमायुरस्मै शतमन्यान् परि वृणक्तु मृत्यून् ॥ - अ.१.३०.३

*शं नो भवन्त्वप ओषधयः शिवाः। इन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद् विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम्। -  अ.२.३.६

*शं ते अग्निः सहाद्भिरस्तु शं सोमः सहौषधीभिः। - अ.२.१०.२

*नेच्छत्रुः प्राशं जयाति सहमानाभिभूरसि। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे ॥ सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे। इन्द्रो ह चक्रे त्वा बाहावसुरेभ्य स्तरीतवे। प्राशं ०। पाटामिन्द्रो व्याश्नादसुरेभ्य स्तरीतवे। प्राशं ० ॥ तयाहं शत्रून्त्साक्ष इन्द्रः सालावृकाf इव। प्राशं ० ॥ रुद्र जलाषभेषज नीलशिखण्ड कर्मकृत्। प्राशं प्रतिप्राशो ० ॥ अ.२.२७.१-६

*यदन्तरं तद् बाह्यं यद्बाह्यं तदन्तरम्। कन्यानां विश्वरूपाणां मनो गृभायौषधे ॥ - अ.२.३०.४

*ये क्रिमयः पर्वतेषु वनेष्वोषधीषु पशुष्वप्स्वन्तः। ये अस्माकं तन्वमाविविशुः सर्वं तद्धन्मि जनिम क्रिमीणाम् ॥ - अ.२.३१.५

*आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सह नो भगेन। जुष्टा वरेषु समनेषु वल्गुरोषं पत्या सौभगमस्त्वस्यै ॥ - अ.२.३६.१

*आ ते नयतु सविता नयतु पतिर्यः प्रतिकाम्यः। त्वमस्यै धेह्योषधे ॥ - अ.२.३६.८

*आयमगन् पर्णमणिर्बली बलेन प्रमृणन्त्सपत्नान्। ओजो देवानां पय ओषधीनां वर्चसा मा जिन्वत्वप्रयावन् ॥ - अ.३.५.१

*शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै ॥ - अ.३.१७.५

*इमां खनाम्योषधिं वीरुधां बलवत्तमाम्। यया सपत्नीं बाधते यया संविन्दते पतिम् ॥ - अ.३.१८.१

*ये अग्नयो अप्स्वन्तर्ये वृत्रे ये पुरुषे ये अश्मसु। य आविवेशोषधीर्यो वनस्पतींस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत् ॥ - अ.३.२१.१

*यासां द्यौः पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव। तास्त्वा पुत्रविद्याय दैवीः प्रावन्त्वोषधयः ॥ -अ.३.२३.६

*पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं वचः। अथो पयस्वतीनामा भरेऽहं सहस्रशः ॥ - अ.३.२४.१

*ये३स्यांù स्थ ध्रुवायां दिशि निलिम्पा नाम देवास्तेषां व ओषधीरिषवः। ते नो मृडत ते नोऽधि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा ॥ - अ.३.२६.५

*उदायुषा समायुषोदोषधीनां रसेन। व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा। - अ.३.३१.१०

*यां त्वा गन्धर्वो अखनद् वरुणाय मृतभ्रजे। तां त्वा वयं खनामस्योषधिं शेपहर्षणीम् ॥ - अ.४.४.१

*यथा स्म ते विरोहतोऽभितप्तमिवानति। ततस्ते शुष्मवत्तरमियं कृणोत्वोषधिः॥ उच्छुष्मौषधीनां सार ऋषभाणाम्। सं पुंसामिन्द्र वृष्ण्यमस्मिन् धेहि तनूवशिन्॥ - अ.४.४.३-४

*वध्रयस्ते खनितारो वध्रिस्त्वमस्योषधे। वध्रि: स पर्वतो गिरिर्यतो जातमिदं विषम् ॥ - अ.४.६.८

*पवस्तैस्त्वा पर्यक्रीणन् दूर्शेभिरजिनैरुत। प्रक्रीरसि त्वमोषधेऽभ्रिखाते न रूरुपः ॥ - अ.४.७.६

*लोम लोम्ना सं कल्पया त्वचा सं कल्पया त्वचम्। असृक् ते अस्थि रोहतु च्छिन्नं सं धेह्योषधे ॥ - अ.४.१२.५

*समीक्षयन्तु तविषाः सुदानवोऽपां रसा ओषधीभिः सचन्ताम्। वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग् जायन्तामोषधयो विश्वरूपाः ॥ - अ४.१५.२

*अपामग्निस्तनूभिः संविदानो य ओषधीनामधिपा बभूव। स नो वर्षं वनुतां जातवेदाः प्राणं प्रजाभ्यो अमृतं दिवस्परि ॥ -अ.४.१५.१०

*तन्वतां यज्ञं बहुधा विसृष्टा आनन्दिनीरोषधयो भवन्तु ॥ - अ.४.१५.१६

*अपामार्ग ओषधीनां सर्वासामेक इद् वशी। तेन ते मृज्म आस्थितमथ त्वमगदश्चर ॥ - अ.४.१७.८

*अनयाहमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम्। यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु॥ - अ.४.१८.५

*ब्राह्मणेन पर्युक्तासि कण्वेन नार्षदेन। सेनेवैषि त्विषीमती न तत्र भयमस्ति यत्र प्राप्नोष्योषधे ॥ अग्रमेष्योषधीनां ज्योतिषेवाभिदीपयन्। उत त्रातासि पाकस्याथो हन्तासि रक्षसः ॥ यददो देवा असुरांस्त्वयाग्रे निरकुर्वत। ततस्त्वमध्योषधेऽपामार्गो अजानथाः ॥ - अ.४.१९.२-४

*आ पश्यति प्रति पश्यति परा पश्यति पश्यति। दिवमन्तरिक्षमाद् भूमिं सर्वं तद् देवि पश्यति ॥ तिस्रो दिवस्तिस्रः पृथिवीः षट् चेमाः प्रदिशः पृथक्। त्वयाहं सर्वा भूतानि पश्यानि देव्योषधे ॥ दिव्यस्य सुपर्णस्य तस्य हासि कनीनिका। सा भूमिमा रुरोहिथ वह्यं श्रान्ता वधूरिव ॥ - अ.४.२०.१-३

*तां मे सहस्राक्षो देवो दक्षिणे हस्त आ दधत्। तयाहं सर्वं पश्यामि यश्च शूद्र उतार्यः ॥ आविष्कृणुष्व रूपाणि मात्मानमप गूहथाः। अथो सहस्रचक्षो त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः ॥ दर्शय मा यातुधानान् दर्शय यातुधान्यः। पिशाचान्त्सर्वान् दर्शयेति त्वा रभ ओषधे ॥ कश्यपस्य चक्षुरसि शुन्याश्च चतुरक्ष्या:। वीध्रे सूर्यमिव सर्पन्तं मा पिशाचं तिरस्करः ॥ - - - -अ.४.२०.४-६

*अयं राजा प्रिय इन्द्रस्य भूयात् प्रियो गवामोषधीनां पशूनाम् ॥ - अ.४.२२.४

*येन देवा अमृतमन्वविन्दन् येनौषधीर्मधुमतीरकृण्वन्। येन देवा स्वराभरन्त्स नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥ - अ.४.२३.६

*उत्समक्षितं व्यचन्ति ये सदा य आसिञ्चन्ति रसमोषधीषु। पुरो दधे मरुतः पृश्निमातॄंस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥ पयो धेनूनां रसमोषधीनां जवमर्वतां कवयो य इन्वथ। शग्मा भवन्तु मरुतो नः स्योनास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥ - अ.४.२७.२-३

*त्वया पूर्वमथर्वाणो जघ्नू रक्षांस्योषधे। त्वया जघान कश्यपस्त्वया कण्वो अगस्त्यः ॥ त्वया वयमप्सरसो गन्धर्वांश्चातयामहे। अजशृङ्ग्यज रक्षः सर्वान् गन्धेन नाशय ॥ - - - - -एयमगन्नोषधीनां वीरुधां वीर्यावती। अजशृङ्ग्यराटकी तीक्ष्णशृङ्गी व्यृषतु ॥ - अ.४.३७.१-६

*अवकादानभिशोचानप्सु ज्योतय मामकान्। पिशाचान्त्सर्वानोषधे प्र मृणीहि सहस्व च। - अ.४.३७.१०

*सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखन्नसा। दिप्सौषधे त्वं दिप्सन्तमव कृत्याकृतं जहि ॥ अव जहि यातुधानानव कृत्याकृतं जहि। अथो यो अस्मान् दिप्सति तमु त्वं जह्योषधे ॥ - अ.५.१४.१-२

* एका च मे दश च मेऽपवक्तार ओषधे। ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर ॥ द्वे च मे विंशतिश्च मेऽपवक्तार ओषधे। ऋतजात ० ॥ तिस्रश्चच मे त्रिंशच्च मे ऽपवक्तार ओषधे। ऋतजात० ॥ - - - - - -अ.५.१५.१

*गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्। गर्भो विश्वस्य भूतस्य सो अग्ने गर्भमेह धाः ॥ - अ.५.२५.७

*उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा उपस्तयः। उपस्तिरस्तु सो३स्माकं यो अस्माँ अभिदासति। सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति। तेषां सा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः ॥ यथा सोम ओषधीनामुत्तमो हविषां कृतः। तलाशा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः ॥ -अ.६.१५.१-३

*नमो रुद्राय नमो अस्तु तक्मने नमो राज्ञे वरुणाय त्विषीमते। नमो दिवे नमः पृथिव्यै नम ओषधीभ्यः ॥ - अ.६.२०.२

*पयस्वतीः कृणुथाप ओषधीः शिवा यदेजथा मरुतो रुक्मवक्षसः। ऊर्जं च तत्र सुमतिं च पिन्वत यत्रा नरो मरुतः सिञ्चथा मधु ॥ - अ.६.२२.२

*देवस्य सवितुः सवे कर्म कृण्वन्तु मानुषाः। शं नो भवन्त्वप ओषधीः शिवाः ॥ - अ.६.२३.३

*यथेन्द्रो द्यावापृथिव्योर्यशस्वान् यथाप ओषधीषु यशस्वतीः। एवा विश्वेषु देवेषु वयं सर्वेषु यशसः स्याम ॥ - अ.६.५८.२

*शर्म यच्छत्वोषधिः सह देवीररुन्धती। करत् पयस्वन्तं गोष्ठमयक्ष्माf उत पूरुषान् ॥ -अ.६.५९.२

*गर्भो अस्योषधीनां गर्भो हिमवतामुत। गर्भो विश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि ॥ -अ.६.९५.३

*या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वी: शतविचक्षणाः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥ -अ.६.९६.१

*विद्रधस्य बलासस्य लोहितस्य वनस्पते। विसल्पकस्योषधे मोच्छिषः पिशितं चन ॥ - अ.६.१२७.१

*देवी देव्यामधि जाता पृथिव्यामस्योषधे। तां त्वा नितत्नि केशेभ्यो दृंहणाय खनामसि ॥ - अ.६.१३६.१

*दृंह मूलमाग्रं यच्छ वि मध्यं यामयौषधे। केशा नडा इव वर्धन्तां शीर्ष्णस्ते असिताः परि ॥ - अ.६.१३७.३

*त्वं वीरुधां श्रेष्ठतमाभिश्रुतास्योषधे। इमं मे अद्य पूरुषं क्लीबमोपशिनं कृधि ॥ -अ.६.१३८.१

*यदि वासि तिरोजनं यदि वा नद्यस्तिरः। इयं ह मह्यं त्वामोषधिर्बद्ध्वेव न्यानयत् ॥ - अ.७.३९.५

*दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तमपां गर्भं वृषभमोषधीनाम्। अभीपतो वृष्ट्या तर्पयन्तमा नो गोष्ठे रयिष्ठां स्थापयाति। - अ.७.४०.१

*उप द्रव पयसा गोधुगोषमा घर्मे सिञ्च पय उस्रियाया। वि नाकमख्यत् सविता वरेण्योऽनुप्रयाणमुषसो वि राजति ॥ - अ.७.७७.६

*यो अग्नौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध आविवेश। य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वस्यै ॥ -अ.७.९२.१

*उत् त्वा द्यौरुत् पृथिव्युत् प्रजापतिरग्रभीत्। उत् त्वा मृत्योरोषधयः सोमराज्ञीरपीपरन् ॥ - अ.८.१.१७

*जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्। त्रायमाणां सहमानां सहस्वतीमिह हुवेऽस्मा अरिष्टतातये ॥ -अ.८.२.६

*शिवास्ते सन्त्वोषधय उत् त्वाहार्षमधरस्या उत्तरां पृथिवीमभि। तत्र त्वादित्यौ रक्षतां सूर्याचन्द्रमसावुभा ॥ -अ.८.२.१५

*शरदे त्वा हेमन्ताय वसन्ताय ग्रीष्माय परि दद्मसि। वर्षाणि तुभ्यं स्योनानि येषु वर्धन्त ओषधीः॥ - अ.८.२.२२

*विषं गवां यातुधाना भरन्तामावृश्चन्तामदितये दुरेवाः। परैणान् देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम् ॥ -अ.८.३.१६

*उत्तमो अस्योषधीनामनड्वान् जगतामिव व्याघ्र|: श्वपदामिव। यमैच्छामाविदाम तं प्रतिस्पाशनमन्तितम् ॥ -अ.८.५.११

*यः कृणोति मृतवत्सामवतोकामिमां स्त्रियम्। तमोषधे त्वं नाशयास्याः कमलमञ्जिवम् ॥ - अ.८.६.९

*कुसूला ये च कुक्षिलाः ककुभाः करुमाः स्रिमाः। तानोषधे त्वं गन्धेन विषूचीनान् वि नाशय ॥ - अ.८.६.१०

*या बभ्रवो याश्च शुक्रा रोहिणीरुत पृश्नयः।असिक्नी: कृष्णा ओषधीः सर्वा अच्छावदामसि ॥ - अ.८.७.१

*आपो अग्रं दिव्या ओषधयः। तास्ते यक्ष्ममेनस्यमङ्गादङ्गादनीनशन्। प्रस्तृणती स्तम्बिनीरेकशुङ्गा प्रतन्वतीरोषधीरा वदामि। अंशुमती: काण्डिनीर्या विशाखा ह्वयामि ते वीरुधो वैश्वदेवीरुग्राः पुरुषजीवनीः ॥ - अ.८.७.४

*जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्। अरुन्धतीमुद्रायन्तीं पुष्पां मधुमतीमिह हुवेऽस्मा अरिष्टतातये ॥ -अ.८.७.६

*अवकोल्बा उदकात्मान ओषधयः। व्यृषन्तु दुरितं तीक्ष्णशृङ्ग्य: ॥ -अ.८.७.९

*उन्मुञ्चन्तीर्विवरुणा उग्रा या विषदूषणीः। अथो बलासनाशनी कृत्यादूषणीश्च यास्ता इहा यन्त्वोषधीः॥ - अ.८.७.१०

*यावतीः कियतीश्चेमाः पृथिव्यामध्योषधीः। ता मा सहस्रपर्ण्यो मृत्योर्मुञ्चन्त्वंहसः ॥ - अ.८.७.१३

*मुमुचाना ओषधयोऽग्नेर्वैश्वानरादधि। भूमिं संतन्वतीरित यासां राजा वनस्पतिः ॥ - अ.८.७.१६

*या रोहन्त्याङ्गिरसीः पर्वतेषु समेषु च। ता नः पयस्वती शिवा ओषधीः सन्तु शं हृदे ॥ - अ.८.७.१७

*सर्वाः समग्रा ओषधीर्बोधन्तु वचसो मम। यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरितादधि॥ - अ.८.७.१९

*उज्जिहीध्वे स्तनयत्यभि क्रन्दत्योषधीः। यदा वः पृश्निमातरः पर्जन्यो रेतसावति॥ -अ.८.७.२१

*याः सुपर्णा आङ्गिरसीर्दिव्या या रघटो विदुः। वयांसि हंसा या विदुर्याश्च सर्वे पतत्रिणः। मृगा या विदुरोषधीस्ता अस्मा अवसे हुवे॥ - अ.८.७.२४

*यावतीनामोषधीनां गावः प्राश्नन्त्यघ्न्या यावतीनामजावयः। तावतीस्तुभ्यमोषधीः शर्म यच्छन्त्वाभृताः ॥ -अ.८.७.२५

*वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः।  द्विपाच्चतुष्पादिष्णामि यथा सेनाममूं हनन् ॥ - अ.८.८.१४

*अष्टेन्द्रस्य षड् यमस्य ऋषीणां सप्त सप्तधा। अपो मनुष्यानोषधीस्ताँ उ पञ्चानु सेचिरे ॥ - अ.८.९.२३

*ओषधीरेव रथन्तरेण देवा अदुह्रन् व्यचो बृहता। अपो वामदेव्येन यज्ञं यज्ञायज्ञियेन ॥ ओषधीरेवास्मै रथन्तरं दुहे व्यचो बृहत्। अपो वामदेव्यं यज्ञं यज्ञायज्ञियं य एवं वेद ॥ -अ.८.११.७

*देवानां भाग उपनाह एषो३पां रस ओषधीनां घृतस्य। सोमस्य भक्षमवृणीत शक्रो बृहन्नद्रिरभवद् यच्छरीरम् ॥ -अ.९.४.५

*भसदासीदादित्यानां श्रोणी आस्तां बृहस्पतेः। पुच्छं वातस्य देवस्य तेन धूनोत्योषधीः ॥ - अ.९.४.१३

*विश्वव्यचाश्चर्मौषधयो लोमानि नक्षत्राणि रूपम्। - अ.९.१२.१५

*अनयाहमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम्। यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु ॥ - अ.१०.१.४

*यत् ते पितृभ्यो ददतोv यज्ञे वा नाम जगृहुः। संदेश्या३त् सर्वस्मात् पापादिमा मुञ्चन्तु त्वौषधीः ॥ - अ.१०.१.११

*ओषधीनामहं वृण उर्वरीरिव साधुया। नयाम्यर्वतीरिवाहे निरैतु ते विषम् ॥ यदग्नौ सूर्ये विषं पृथिव्यामोषधीषु यत्। कान्दाविषं कनक्नकं निरैत्वैतु ते विषम् ॥ ये अग्निजा ओषधिजा अहीनां ये अप्सुजा विद्युत आबभूवुः। येषां जातानि बहुधा महान्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमसा विधेम ॥ - अ.१०.४.२१-२३

*विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहौषधीसंशितः सोमतेजाः। ओषधीरनु वि क्रमेऽहमोषधीभ्यस्तं निर्भजामो यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः। स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु ॥ - अ.१०.५.३२

*यत् प्राण स्तनयित्नुनाभिक्रन्दत्योषधीः। प्र वीयन्ते गर्भान् दधतेऽथो बह्वीर्वि जायन्ते। यत् प्राण ऋतावागतेऽभिक्रन्दत्योषधीः। सर्वं तदा प्र मोदते यत् किं च भूम्यामधि। - - - - अभिवृष्टा ओषधयः प्राणेन समवादिरन्। आयुर्वै नः प्रातीतरः सर्वा नः सुरभीरकः ॥ - अ.११.६.३-६

*आथर्वणीराङ्गिरसीर्दैवीर्मनुष्यजा उत। ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि ॥ यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्। ओषधयः प्र जायन्तेऽथो याः काश्च वीरुधः। - अ.११.६.१६-१७

*आचार्यो मृत्युर्वरुणः सोम ओषधयः पयः। जीमूता आसन्त्सत्वानस्तैरिदं स्वराभृतम् ॥ - अ.११.७.१४

*ओषधयो भूतभव्यमहोरात्रे वनस्पतिः। संवत्सरः सहर्तुभिस्ते जाता ब्रह्मचारिणः ॥ -अ.११.७.२०

*अग्निं ब्रूमो वनस्पतीनोषधीरुत वीरुधः। इन्द्रं बृहस्पतिं सूर्यं ते नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥ -अ.११.८.१

*शर्करा सिकता अश्मान ओषधयो वीरुधस्तृणा। अभ्राणि विद्युतो वर्षमुच्छिष्टे संश्रिता श्रिता ॥ - अ.११.९.२१

*वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः। गन्धर्वाप्सरसः सर्पान् देवान् पुण्यजनान् पितॄन्। सर्वांस्ताँ अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय ॥ - अ.११.११.२४

*नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः ॥। - अ.१२.१.२

*विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्। शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा ॥ - अ.१२.१.१७

*अग्निर्भूम्यामोषधीष्वग्निमापो बिभ्रत्यग्निरश्मसु। अग्निरन्तः पुरुषेषु गोष्वश्वेष्वग्नयः ॥ - अ.१२.१.१९

*यस्ते गन्धः पृथिवि संबभूव यं बिभ्रत्योषधयो यमापः। यं गन्धर्वा अप्सरसश्च भेजिरे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन ॥ - अ.१२.१.२३

*मन्द्राग्रेत्वरी भुवनस्य गोपा वनस्पतीनां गृभिरोषधीनाम् ॥ - अ.१२.१.५७

*संख्याता स्तोका पृथिवीं सचन्ते प्राणापानै: संमिता ओषधीभिः। असंख्याता ओप्यमानाः सुवर्णाः सर्वं व्यापुः शुचयः शुचित्वम् ॥ - अ.१२.३.२८

*प्र यच्छ पर्शु त्वरया हरौषमहिंसन्त ओषधीर्दान्तु पर्वन्। यासां सोमः परि राज्यं बभूवामन्युता नो वीरुधो भवन्तु ॥ - अ.१२.३.३१

*समग्नयो विदुरन्यो अन्यं य ओषधीः सचते यश्च सिन्धून्। यावन्तो देवा दिव्या३तपन्ति हिरण्यं ज्योतिः पचतो बभूव ॥ - अ.१२.३.५०

*ध्रुवायै त्वा दिशे विष्णवेऽधिपतये कल्माषग्रीवाय रक्षित्र ओषधीभ्य इषुमतीभ्यः। एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतोः। - - - अ.१२.३.५९

*वैश्वदेवी ह्यु१च्यसे कृत्या कूल्बजमावृता। ओषन्ती समोषन्ती ब्रह्मणो वज्रः ॥ - अ.१२.१०.८

*अग्निरेनं क्रव्यात् पृथिव्या नुदतोमुदोषतु वायुरन्तरिक्षान्महतो वरिम्णः। सूर्य एनं दिवः प्र णुदतां न्योषतु ॥ -अ.१२.५.७२

*उद् वाज आ गन् यो अप्स्व१न्तर्विश आरोह त्वद्योनयो याः। सोमं दधानोऽप ओषधीर्गाश्चतुष्पदो द्विपद आ वेशयेह ॥ - अ.१३.१.२

*यद्वा कृणोष्योषधीर्यद्वा वर्षसि भद्रया यद्वा जन्यमवीवृधः ॥ - अ.१३.७.१५

*सोमं मन्यते पपिवान् यत् संपिंषन्त्योषधिम्। सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति पार्थिवः ॥ -अ.१४.१.३

*या ओषधयो या नद्यो३ यानि क्षेत्राणि या वना। तास्त्वा वधु प्रजावती पत्ये रक्षन्तु रक्षसः ॥ - अ.१४.२.७

*सं त्वा नह्यामि पयसा पृथिव्याः सं त्वा नह्यामि पयसौषधीनाम्। सं त्वा नह्यामि प्रजया धनेन सा संनद्धा सनुहि वाजमेमम् ॥ - अ.१४.२.७०

*स ध्रुवां दिशमनु व्यचलत्। तं भूमिश्चाग्निश्चौषधयश्च वनस्पतयश्च वानस्पत्याश्च वीरुधश्चानुव्यचलन्। - -- - - - -अ.१५.६.१

*स यत् पशूननु व्यचलद् रुद्रो भूत्वानुव्यचलदोषधीरन्नादी कृत्वा। ओषधीभिरन्नादीभिरन्नमत्ति य एवं वेद ॥ -अ.१५.१४.११

*आपो वाता ओषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन आर्पितानि। - अ.१८.१.१७

*सूर्यं चक्षुषा गच्छ वातमात्मना दिवं च गच्छ पृथिवीं च धर्मभिः। अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रतितिष्ठा शरीरैः ॥ - अ.१८.२.७

*पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं पयः। अपां पयसो यत् पयस्तेन मा सह शुम्भतु ॥ - अ.१८.३.५६

*दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षाद् वनस्पतिभ्यो अध्योषधीभ्यः। यत्रयत्र विभृतो जातवेदास्तत स्तुतो जुषमाणो न एहि। यस्ते अप्सु महिमा यो वनेषु य ओषधीषु पशुष्वप्स्वन्तः। अग्ने सर्वास्तन्व१: सं रभस्व ताभिर्न एहि द्रविणोदा अजस्रः ॥ - अ.१९.३.१-२

*शान्ता उदन्वतीरापः शान्ता नः सन्त्वोषधीः। अ.१९.९.१

*पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिर्द्यौः शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे मे देवाः शान्तिः सर्वे मे देवाः शान्तिः शान्तिः शान्तिः शान्तिभिः। - अ.१९.९.१४

*शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः ॥ -अ.१९.१०.५

*आपो मौषधीमतीरेतस्या दिशः पान्तु तासु क्रमे तासु श्रये तां पुरं प्रैमि। - अ.१९.१७.६

*सोम ओषधीभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः। तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु ॥ - अ.१९.१९.५

*सोमस्त्वा पात्वोषधीभिर्नक्षत्रैः पातु सूर्यः। माद्भ्यस्त्वा चन्द्रो वृत्रहा वातः प्राणेन रक्षतु ॥ - अ.१९.२७.२

*ओष दर्भ सपत्नान् मे ओष मे पृतनायतः। ओष मे सर्वान् दुर्हार्द ओष मे द्विषतो मणे ॥ - अ.१९.२९.७

*पयः पशूनां रसमोषधीनां बृहस्पतिः सविता मे नि यच्छात् ॥ - अ.१९.३१.५

*न त्वा पूर्वा ओषधयो न त्वा तरन्ति या नवाः। विबाध उग्रो जङ्गिडः परिपाणः सुमङ्गलः। अ.१९.३४.७

* शतकाण्डो दुश्च्यवनः सहस्रपर्ण उत्तिरः। दर्भो य उग्र ओषधिस्तं ते बध्नाम्यायुषे ॥ - अ.१९.३२.१

*दिवि ते तूलमोषधे पृथिव्यामसि निष्ठितः। त्वया सहस्रकाण्डेनायुः प्र वर्धयामहे। - अ.१९.३२.३

*सपत्नहा शतकाण्ड: सहस्वानोषधीनां प्रथमः सं बभूव। स नोऽयं दर्भः परि पातु विश्वतस्तेन साक्षीय पृतनाः पृतन्यतः ॥ - अ.१९.३२.१०

*ओष॑धयो ब॒र्हिषा॑(सहागच्छन्तु) – तै.आ. ३.८.१

*उग्र इत् ते वनस्पत इन्द्र ओज्मानमादधौ। अमीवा सर्वाश्चातयं जहि रक्षांस्योषधे ॥ - अ.१९.३४.९

*उत्तमो अस्योषधीनामनड्वान् जगतामिव व्याघ्र|: श्वपदामिव। नद्यायं पुरुषो रिषत्। यस्मै परिब्रवीमि त्वा सायंप्रातरथो दिवा ॥ - अ.१९.३९.४

*देवाञ्जन त्रैककुदं परि मा पाहि विश्वतः। न त्वा तरन्त्योषधयो बाह्याः पर्वतीयो उत ॥ -अ.१९.४४.६

*इन्द्र ओषधीरसनोदहानि वनस्पतीfरसनोदन्तरिक्षम्। बिभेद वलं नुनुदे विवाचोऽथाभवद् दमिताभिक्रतूनाम् ॥ -अ.२०.११.१०

*यदप्सु यद्वनस्पतौw यदोषधीषु पुरुदंससा कृतम्। तेन माविष्टमश्विना ॥ - अ.२०.१३९.५

*मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम्। क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम ॥ -अ.२०.१४.३८

*दर्शपूर्णमास व्रतोपायनम् :- स वा आरण्यमेवाश्नीयात्। या वा आरण्या ओषधयः, यद्वा वृक्ष्यम्। - - -शतपथ ब्राह्मण १.१.१.१०

*अथान्तर्वेद्युपविशति। - - - ता आनयति ताः पवित्राभ्यां प्रतिगृह्णाति - समाप ओषधीभिः इति। सं ह्येतदाप ओषधिभिरेताभिः पिष्टाभिः सङ्गच्छन्ते। समोषधयो रसेन इति। सं ह्येतदोषधयो रसेनैता पिष्टा अद्भिः सङ्गच्छन्ते। आपो ह्येतासां रसः। सं रेवतीर्जगतीभिः पृच्यन्ताम्। इति। रेवत्य आपः, जगत्य ओषधयः, ता उ ह्येतदुभय्य सम्पृच्यन्ते ॥ - मा.श.१.२.२.२

*वेदिकाकरणम् :- स प्रहरति पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते मूलं मा हिंसिषम् इति। उत्तरमूलामिव वा एनामेतत्करोत्याददानः। तामेतदाह - ओषधीनां ते मूलानि मा हिंसिषमिति। - मा.श.१.२.४.१६

*द्रव्यसंस्काराः।  पत्न्या योक्त्रेण सन्नहन :- स वा अभिवासः सन्नह्यति। ओषधयो वै वासः, वरुण्या रज्जु:। तदोषधीरेवैतदन्तर्दधाति। तथो हैनामेषा वरुण्या रज्जुर्न हिनस्ति। - मा.श.१.३.१.१४

*दर्शोपचारः :- स (चन्द्रमा) यत्रैष एतां रात्रिं न पुरस्तान्न पश्चाद्ददृशे, तदिमं लोकमागच्छति। स इहैवापश्चौषधीश्च प्रविशति। - मा.श.१.६.४.५

*दर्शोपचारः :-  तं (सोमं) गोभिरनु विष्ठाप्य समभरन्। यदोषधीराश्नन् - तदोषधिभ्यः। यदपोऽपिबन् - तदद्भ्यः। - मा.श.१.६.४.६

*याजमानो विष्णुक्रमः :- स एष देवयानो वा पितृयाणो वा पन्थाः। तदुभयतोऽग्निशिखे समोषन्त्यौ तिष्ठतः। प्रति तमोषतो  यः प्रत्युष्यः, अत्यु त सृजेते योऽतिसृज्यः। - मा.श.१.९.३.२

*पुनराधानम् :-तत एतत् त्वष्टा पुनराधेयं ददर्श।- - -सोऽस्मा उभयानि रूपाणि प्रतिनिःससर्ज - यानि च ग्राम्याणि, यानि चारण्यानि। - मा.श.२.२.३.४

*अग्निहोत्रम् :- पशवो मूलाः, ओषधयो मूलिन्यः, ते पशवो मूला ओषधीर्मूलिनीर्जग्ध्वाऽपः पीत्वा तत एष रसः सम्भवति। - मा.श.२.३.१.१०

*दीक्षासंस्काराः ;  केशवपनम् :- अथ दर्भतरुणकमन्तर्दधाति - ओषधे त्रायस्व इति। वज्रो वै क्षुरः। तथो हैनमेष वज्रः क्षुरो न हिनस्ति। - मा.श.३.१.२.७

*प्रायणीयेष्टिः। प्रायणीय देवताविधिः :- ऊर्ध्वामेव दिशमदित्या प्राजानन्। इयं वा अदितिः। तस्मादस्यामूर्ध्वा ओषधयो जायन्ते। ऊर्ध्वा वनस्पतयः। - मा.श.३.२.३.१९

*प्रवर्ग्य कर्मण्यवान्तरदीक्षा :- दिवि हि सोमः, वृत्रो वै सोम आसीत्। तस्यैतच्छरीरम् - यद्गिरयो, यदश्मानः। तदेषोऽशाना नामौषधिर्जायते - इति ह स्माह श्वेतकेतुरौद्दालकिः। तामेतदाहृत्याभिषुण्वन्ति। - मा.श.३.४.३.१३

*औदुम्बरी :- अथ यवमत्यः प्रोक्षण्यो भवन्ति। आपो ह वा ओषधीनां रसः। तस्मादोषधयः केवल्यः खादिता  न धिन्वन्ति। औषधय उ हा अपां रसः। तस्मादापः पीताः केवल्यो न धिन्वन्ति। -मा.श.३.६.१.७

* औदुम्बरी :- पितृदेवत्यं वाऽअस्या एतद्भवति। यन्निखातम्। सा यथा निखातौषधिषु मिता स्यात्  एवमेतास्वोषधिषु मिता भवति। तामुच्छ्रयति - - - मा.श.३.६.१.१४

*पशु नियोजन प्रकारः :- स प्रोक्षति। अद्भ्यस्त्वौषधीभ्यः इति। तद् यत एव सम्भवति - तत एवैतन्मेध्यं करोति। इदं हि यदा वर्षति - अथौषधयो जायन्ते। औषधीर्जग्ध्वा, अपः पीत्वा, तत एष रसः सम्भवति। रसाद्रेतः - मा.श.३.७.४.४

*सुत्यादिवसे प्रातकालीनं पश्वर्थं प्रयोगः :-  समापोऽअद्भिरग्मत। समोषधीभिरोषधीः इति। यश्चासौ पूर्वेद्युराहृतो यज्ञस्य रसो, यश्चाद्याहृतः - तमेवैतदुभयं संसृजति। - मा.श.३.९.३.२९

*आग्रयण ग्रहः :- अद्भ्य ओषधीभ्यः पवते इति। तदद्भ्यश्चौषधिभ्यश्चाह। -श.४.२.२.१५

* विप्रुड् होमः :- दिवि हि सोमः। वृत्रो वै सोम आसीत्। तस्यैतच्छरीरं यद्गिरयो, यदश्मानः। तदेषोशानानामौषधिर्जायते इत ह स्माह श्वेतकेतुरौद्दालकिः। तामेतदाहृत्याभिषुण्वन्तीति। - श.४.२.५.१५

*अवभृथ स्नानम् :- सन्त्वा विशन्त्वोषधीरुतापः इति। तदस्मिन्नुभयं रसं दधाति - यश्चौषधिषु, यश्चाप्सु। - मा.श.४.४.५.२०

*यूपारोहणम् :- गौधूमं चषालं भवति। पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम्। सोऽयमत्वक्। एते वै पुरुषस्योषधीनां नेदिष्ठतमां  यद्गोधूमाः। तेषां न त्वगस्ति। मनुष्यलोकमेवैतेनोज्जयति। - मा.श.५.२.१.६

*वाजप्रसवीय होमं :- स जुहोति - वाजस्येमं प्रसवः सुषुवेऽग्रे सोमं राजानमोषधीष्वप्सु। ता अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु। - मा.श.५.२.२.५

*राजसूय यज्ञः :- तस्मादाग्रयणेष्ट्या यजते। ओषधीर्वाऽएष सूयमानोऽभिसूयते। तदोषधीरेवैतदनमीवा अकिल्बिषाः कुरुते। अनमीवा अकिल्बिषा ओषधीरभिसूयाऽइति। तस्य गौर्दक्षिणा। - मा.श.५.२.३.९

*दीक्षणीय यागाः :- अथ सोमाय वनस्पतये श्यामाकं चरुं निर्वपति। तदेनं सोम एव वनस्पतिरोषधिभ्यः सुवति। अथ यच्छ्यामाको भवति। एते वै सोमस्योषधीनां प्रत्यक्षतमाम् - यच्छ्यामाकाः। - मा.श.५.३.३.४

*अथ यद्धायनानां भवति। अतिष्ठा वाऽएता ओषधयो  यद्धायनाः। अतिष्ठो वाऽइन्द्रः। - मा.श.५.३.३.६

*वरुण्या वाऽएता ओषधयो याः कृष्टे जायन्ते अथैते मैत्राः - यन्नाम्बा:। - मा.श.५.३.३.८

*अग्निचित्या ब्राह्मणम् :- स (प्रजापतिः) श्रान्तस्तेपानो मृदम्, शुष्कापमूषसिकतम्, शर्कराम्, अश्मानम्, अयः, हिरण्यम्, ओषधिवनस्पति असृजत। तेनेमां पृथिवीं प्राच्छादयत्। - मा.श.६.१.१.१३

*प्रजापतेश्चित्याग्निरूपता :- अथोऽआहुः - प्रजापतिरेवेमाँल्लोकान्त्सृष्ट्वा पृथिव्यां प्रत्यतिष्ठत्। तस्माऽइमा ओषधयोऽन्नमपच्यन्त। तदाश्नात्। स गर्भ्यभवत्~। - - मा.श.६.१.२.११

*अष्टौ रूपाणि चयनोपयुक्तानि ; कुमारोत्पत्तिः :-  तमब्रवीत् - पशुपतिरसीति। तद्यदस्य तन्नामाकरोत् -  ओषधयस्तद्रूपमभवन्। ओषधयो वै पशुपतिः। तस्माद्यदा पशव ओषधीर्लभन्ते - अथ पतीयन्ति। - मा.श.६.१.३.१२

*पश्वभिमन्त्रणम् :- सोऽश्वमभिमन्त्रयते - - - -तयोरेष जातो गर्भः। अग्ने चारुर्विभृत ओषधीषु इति। सर्वासु ह्येष चारुर्विभृत ओषधिषु। - - - प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गा: इति। ओषधयो वाऽएतस्य मातरः। ताभ्य एष कनिक्रदत्प्रैति। तदश्वे वीर्यं दधाति। - मा.श.६.४.४.२

*उखासम्भरणे पश्वभिमन्त्रणविधानं :- अथैनमुपावहरति। ओषधयः प्रतिमोदध्वमग्निमेतं शिवमायन्तमभ्यत्र युष्माः इति। एतद्धैतस्मादायत ओषधयो बिभ्यति यद्वै नोऽयं न हिंस्यादिति। - मा.श.६.४.४.१६

*ओषधयः प्रतिगृभ्णीत पुष्पवतीः सुपिप्पलाः इति। एतद्धैतासां समृद्धं रूपम् - यत् पुष्पवत्यः सुपिप्पलाः। समृद्धा एनं प्रतिगृभ्णीतेत्येतत्। अयं वो गर्भ ऋत्वियः प्रत्नं सधस्थमासदत् इति। - मा.श.६.४.४.१७

* उखासम्भरणे अवटखननं :-अथोखामवदधाति। देवानां त्वा पत्नीर्देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थेऽअङ्गिरस्वद्दधतूखे इति। देवानां हैतामग्रे पत्नीर्देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थेऽङ्गिरस्वद्दधुः - ताभिरेवैनामेतद्दधाति। ता ह ता ओषधय एव। ओषधयो वै देवानां पत्न्यः। ओषधिभिर्हीदं सर्वं हितम्। ओषधिभिरेवैनामेतद्दधाति। - मा.श.६.५.४.४

*अषाढाख्येष्टका :- अजायै पयसाऽऽच्छृणत्ति। - - - - - अजा ह सर्वा ओषधीरत्ति। सर्वासामेवैनामेतदोषधीनां रसेनाऽऽच्छृणत्ति। - मा.श.६.५.४.१६

*गार्हपत्याग्निचयनम् :- अग्ने यत्ते दिवि वर्चः इति। आदित्यो वाऽअस्य दिवि वर्चः। पृथिव्याम् इति। अयमग्निः पृथिव्याम्। यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र इति। य एवौषधिषु चाप्सु चाग्निस्तमेतदाह। - मा.श.७.१.१.२३

*प्रायणीयेष्टिः :- अथ पूर्वार्धेन दक्षिणाम् सीतां कृषति कामं कामदुघे धुक्ष्व मित्राय वरुणाय च। इन्द्रायाश्विभ्यां पूष्णे प्रजाभ्य ओषधीभ्यः इति। सर्वदेवत्या वै कृषिः। - मा.श.७.२.२.१२

*दर्भस्तम्बोपधानम्। एतद्वै देवा ओषधीरुपादधत। तथैवैतद्यजमान ओषधीरुपधत्ते।- - - - -उभयम्वेतदन्नम्। यद्दर्भाः - आपश्च ह्येता ओषधयश्च। या वै वृत्राद्बीभत्समाना आपो धन्व दृभन्त्य उदायन् - ते दर्भा अभवन्। - - -ता ह्येता शुद्धा मेध्या आपोऽवृत्राभिप्रक्षरिताः - यद्दर्भाः। यदु दर्भाः - तेनौषधयः। उभयेनैवैनमेतदन्नेन प्रीणाति। - मा.श.७.२.३.१

*अथैनमभिजुहोति (दर्भस्तम्बम् अभिजुहोति)। - - -सर्वस्योऽअस्यैष रसो यदाज्यम्। अपां च ह्येष ओषधीनां च रसः। अस्यैवैनमेतत्सर्वस्य रसेन प्रीणाति। यावानु वै रसस्तावानात्मा। - मा.श.७.२.३.४

*अथ सर्वौषधं वपति - एतद्वै देवा अब्रुवन् - चेतयध्वमिति। - - - - सर्वौषधं भवति। सर्वमेतदन्नम् - यत्सर्वौषधम्। सर्वमेवास्मिन्नेतदन्नं दधाति। - मा.श.७.२.४.१३

*यद्वेव सर्वौषधं वपति। एतद्वाऽएनं देवा संस्करिष्यन्त पुरस्तात्सर्वेण भेषजेनाभिषज्यन्। - - - सर्वौषधं भवति। सर्वमेतद्भेषजम् - यत्सर्वौषधम्। सर्वेणैवैनमेतद्भेषजेन भिषज्यति। - मा.श.७.२.४.१९

*अपां निनयनं सर्वौषधवपनं च :- या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा इति। ऋतवो वै देवाः। तेभ्य एतास्त्रिः पुरा जायन्ते - वसन्ता प्रावृषि शरदि। - - - - -मनै नु बभ्रूणामहम् इति। सोमो वै बभ्रुः, सौम्या ओषधयः, औषधः पुरुषः - मा.श.७.२.४.२६

*पञ्चप्राणभृदिष्टकोपधानम् :- यद्वेवापस्या उपदधाति। एष्वेवैतत्प्राणेष्वपो दधाति। - - -अपः पिन्व, ओषधीर्जिन्व, द्विपादव, चतुष्पात्पाहि, दिवो वृष्टिमेरय इति। - मा.श.८.२.३.६

*राष्ट्रभृद्धोमः :- ऋताषाडतृधामा इति।-- अग्निर्गन्धर्वस्तस्योषधयोऽप्सरसः इति। अग्निर्ह गन्धर्वः - ओषधिभिरप्सरोभिर्मिथुनेन सहोच्चक्राम। मुदो नाम इति। ओषधयो वै मुदः। ओषधिभिर्हीदं सर्वं मोदते।। मा.श.९.४.१.७

*तदेतद् वसु चित्रं राधः। तदेष सविता विभक्ताभ्यः प्रजाभ्यो विभजति - अप्योषधिभ्यः, अपि वनस्पतिभ्यः। - मा.श.१०.२.६.५

*चंद्रमा वै सोमो देवानामन्नम्। तं पौर्णमास्यामभिषुण्वंति। सोऽपरपक्षेऽपऽओषधीः प्रविशति। पशवो वा अप ओषधीरदंति। तदेनमेतां रात्रिं पशुभ्यः सन्नयति। - मा.श.११.१.५.३

*व्रतोपायनम् :- स यदि ग्राम्या ओषधीरश्नाति, पुरोडाशस्य मेधमश्नाति। यद्यारण्या ओषधीरश्नाति, बर्हिषो मेधमश्नाति। यदि वानस्पत्यमश्नाति, इध्मस्य मेधमश्नाति। - - - - मा.श.११.१.७.२

*अग्निहोत्रम् :- यत्स्रुचं परिमृज्य कूर्चे न्यमार्जिषम्, ओषधिवनस्पतींस्तेनाप्रैषम्। - मा.श.११.५.३.७

*उपनयनधर्माभिधायकं ब्राह्मणम् :- तदाहुः - न ब्रह्मचारी सन्मध्वश्नीयात्। ओषधीनां वा एष परमो रसो यन्मधु। नेदन्नाद्यस्यान्तं गच्छानीति। - मा.श.११.५.४.१८

*अथ यानेतत् प्रतीच्यां दिश्यद्राक्षी:, पुरुषै: पुरुषान् तूष्णींमासीनान् तूष्णींमासीनैरद्यमानान्, ओषधयो वै ता अभूवन्। स यत् तृणेनावज्योतयति। तेनौषधीरवरुन्धे। तेनौषधीनां लोकं जयति। - मा.श.११.६.६.१०

*ते (आहुतीः) इमामाविशतः। ते इमामेवाहवनीयं कुर्वाते। अग्निं समिधम्। ओषधीरेव शुक्रामाहुतिम्। ते इमां तर्पयतः। ते तत उत्क्रामत:। - मा.श.११.६.२.८

*गवामयनब्राह्मणम् :- अथ ब्रह्माणं दीक्षयति। चन्द्रमा वै ब्रह्मा। सोमो वै चन्द्रमा। सौम्या ओषधयः। ओषधीस्तदनेन लोकेन संदधाति। - - - -स यद्धैतावन्तरेणान्यो दीक्षेत। ओषधीस्तदनेन लोकेन नाना कुर्यात्। -मा.श.१२.१.१.२

*अथोद्गातारं दीक्षयति। पर्जन्यो वा उद्गाता। - - - - वृष्टिं तदोषधिभिः संदधाति। - - - - -स यद्धैतावंतरेणान्यो दीक्षेत। वृष्टिं तदोषधिभिर्नाना कुर्यात्। अवर्षुको ह स्यात्। - मा.श.१२.१.१.३

*अध्यात्मविद्ब्राह्मणम् :- नखान्येवौषधिवनस्पतीनां रूपम्। ऊरू चतुर्विंशमहः। - मा.श.१२.१.४.१

*अथ याज्या गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्। गर्भो विश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि। - मा.श.१२.४.४.४

*सौत्रामणी। पयोग्रहाश्च सुराग्रहाश्च :- स जुहोति - यस्ते रसः संभृत ओषधीषु इति। अपां च वा एष ओषधीनां च रसः। यत्सुरा। अपां चैवैनमेतदोषधीनां च रसेन समर्धयति। - मा.श.१२.८.१.४

*सर्वमेधः :- संव्रश्चमोषधिवनस्पतीनां प्रकिरंति - शुष्काणां चार्द्राणां च। - मा.श.१३.७.१.९

*स आदित्य वा एषो ऽस्तं यन् ब्राह्मणम् एव श्रद्धया प्रविशति पयसा पशूंस् तेजसाग्निम् ऊर्जौषधी रसेनापस् स्वधया वनस्पतीन्। - जैमिनीय ब्राह्मण १.७

*अथ यत् तृणेनावद्योतयति ययोर्जौषधीः प्रविष्टो भवति ताम् एवास्मिंस् तत् संभरति ॥ - जै.ब्रा.१.७

*यद् अन्यद् धान्यं न स्यात् केन जुहुया इति। आरण्याभिर् ओषधीभिर् इति। यद् आरण्या ओषधयो न स्युः केन जुहुया इति। अद्भिर् इति। - जै.ब्रा.१.१९

*तस्यानुहाय रेत आदत्त। तद् गर्दभे न्यमार्ट् तद् बडवायां तत् पशुषु तद् ओषधीषु। - - - -तस्माद् ओषधयो ऽनभ्यक्ता रेभन्ति। - जै.ब्रा.१.६७

*घृतेन द्यावापृथिवी आ प्रीणीथाम्। सुपिप्पला ओषधीः कृधि स्वाहा इत्य् औदुम्बरीम् अभिजुहोति। इमान् एवैतल् लोकान् रसेनानक्ति। - जै.ब्रा.१.७२

*राजानम् आनयति। तम् अभिमन्त्रयते - - - स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शम् अर्वते। शं राजन्न् ओषधीभ्यः। इति। - जै.ब्रा.१.८१

*यदि तं (पर्णम्) न विन्देयुर् या एव काश् चौषधीर् अभिषुणुयुः। सोमं वै राजानं यत् सुपर्ण आहरन् समभिनत् तस्य वा विप्रुषो अपतस् ता एवेमा ओषधयो ऽभवन्। सर्वा उ ह वै सौम्या ओषधयः। स एवास्य संन्यङ्गः। - जै.ब्रा.१.३५५

*तम् उ तं सोमम् एव प्रत्यक्षं भक्षयन्ति यत् पयः। ओषधीनां हि स रसः। - जै.ब्रा.१.३५५

*स यथा सामि गर्भा पतेयुर् यथा वामा ओषधीर् लिलियुस् ताः किंदिता स्युश् शुष्येयुर् एवैवं तद् यन् मासि - मासि पृष्ठान्य् उपयन्ति। - जै.ब्रा.२.२

*स (चन्द्रमाः) इमा अप ओषधीः प्रविशति। स इमा अप ओषधी प्रविश्यास्व~ अप्स्व् ओषधीष्व~ आत्मानं न्युद्यापूर्यमाणो ऽमुं लोकं गच्छति। - जै.ब्रा.२.३

*स (आदित्यः) वशम् एव दिव आदत्त, क्षत्रं नक्षत्राणाम्, आत्मानम् अन्तरिक्षस्य, रूपं वायोर्, आज्ञां मनुष्याणां, चक्षः पशूनाम्, ऊर्जम् अपां, रसम् ओषधीनां, चरथं वनस्पतीनां, शिश्नं वयसाम् - - -जै.ब्रा.२.२६

*यजमान द्वारा ऋत्विजों से स्वयं का निष्क्रीणन :- स यल् लोमानि ददात्य् - ओषधिवनस्पतयो वै लोमान्य् - ओषधिवनस्पतीन् एवैभ्यस् तद् ददाति। तद् यावद् ओषधि वनस्पतयो न क्षीयन्ते, तावद् अस्य तद् दत्तं न क्षीयते। - जै.ब्रा.२.५४

*यद् उ व्रतप्रदो ऽनुच्छिष्टाशी वा स्यात् परि वा शिंष्यात्, तद् अद्भिर् अभ्युक्ष्य छायायां निषेक्तवै ब्रूयात्। तद् ओषधीभिर् अभिसंछादयितवै ब्रूयात्। तद् ओषधीनां मूलान्य् उपसिञ्चति। - जै.ब्रा.२.६४

*स्वाशिरो वै नामाप्सरस इमा एवौषधयः। ता अकामयन्त बह्वी स्याम्, प्रजायेमहि, वीमं लोकम् आप्नुयामेति। ता एतत् सामापश्यन्। - - - - - सो ऽयं सर्वो लोक ओषधीभिस् संछन्नो ऽपि गिरयः। तद् एतत् प्रजननं साम। - जै.ब्रा.३.२२६

*ओषधीर् घृतस्तोको, वनस्पतीन् मधुस्तोकः – जै.ब्रा. ३.३५०

*गवामयनशेषविधिः :- त्वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतेन। सुम्नायवः सुषमिधा समीधिरे। स वावृधान ओषधीभिरुक्षितः। उरु ज्रयांसि पार्थिवा वितिष्ठसे। - तैत्तिरीय ब्राह्मण १.२.१. १२

*गवामयनशेषविधिः(क्लृप्तिसामनसीभ्यामग्नीन्यजमान उपतिष्ठते) :- - कल्पेतां द्यावापृथिवी। कल्पन्ताममाप ओषधीः। कल्पन्तामग्नयः पृथक्। मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः ॥ - तै.ब्रा.१.२.१.१८

*गवामयनशेषविधिः :- दिवः पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात्। वातात्पशुभ्यो अध्योषधीभ्यः। यत्र यत्र जातवेदः संबभूथ। ततो नो अग्ने जुषमाण एहि। - तै.ब्रा.१.२.१.२२

*वाजपेयविधिः :- सर्वा वा एतस्य वाचोऽवरुद्धाः। यो वाजपेययाजी। या पृथिव्यां याऽग्नौ या रथंतरे। याऽन्तरिक्षे या वायौ या वामदेव्ये। या दिवि याऽऽदित्ये या बृहति। याऽप्सु यौषधीषु या वनस्पतिषु। - तै.ब्रा.१.३.२.७

*वाजं वा एषोऽवरुरुत्सते। यो वाजपेयेन यजते। ओषधयः खलु वै वाजः। यद्दर्भमयं परिधापयति। वाजस्यावरुद्ध्यै। - तै.ब्रा.१.३.७.१

*राजसूये अनुमत्यादीष्टयः :- यावतीर्वै प्रजा ओषधीनामहुतानामाश्नन्। ताः पराभवन्। आग्रयणं भवति हुताद्याय। यजमानस्यापराभावाय। देवा वा ओषधीष्वाजिमयुः। ता इन्द्राग्नी उदजयताम्। तावेतमैन्द्राग्नं द्वादशकपालं निरवृणाताम्। - तै.ब्रा.१.६.१.९

*अग्निहोत्रविधिः :- अङ्गिरसो वै सत्रमासत। तेषां पृश्निर्घर्मधुगासीत्। सर्जीषेणाजीवत्। तेऽब्रुवन्। कस्मै नु सत्रमास्महे। येस्या ओषधीर्न जनयाम इति।ते दिवोवृष्टिमसृजन्त। यावन्तः स्तोका अवापद्यन्त। तावतीरोषधयोऽजायन्त। ता जाताः पितरो विषेणालिम्पन्। - - - - - - - - -तै.ब्रा.२.१.१.१

*तेभ्य (पितृभ्यः) एतद्भागधेयं प्रायच्छन्। यद्धुत्वा निमार्ष्टि। ततो वै त ओषधीरस्वदयन्। य एवं वेद। स्वदन्तेऽस्मा ओषधयः। तै.ब्रा.२.१.१.२

*किं देवत्यमग्निहोत्रमिति। - - - - - - यन्निमार्ष्टि। तदोषधीनाम्। यद्द्वितीयम्। तत्पितृणाम्। - तै.ब्रा.२.१.४.७

*अग्निहोत्रे सोमयागबुद्धिः :- - - - - -दिव्या आपः प्रोक्षणयः। ओषधयो बर्हिः। वनस्पतय इध्म: -- - - - तै.ब्रा.२.१.५.१

*यवाग्वा ग्रामकाम्यस्योषधा वै मनुष्याः। भागधेयेनैवास्मै सजातानवरुन्धे। ग्राम्येव भवति। - तै.ब्रा.२.१.५.६

*षड्ढोता वै भूत्वा प्रजापतिरिदँ सर्वमसृजत। - - - - यजुर्भ्योऽधि विष्णुम्। तद्विष्णुं यश आर्च्छत्। तमालभत। विष्णोरध्योषधीरसृजत। ओषधीभ्योऽधि सोमम्। - तै.ब्रा.२.३.२.४

*अग्निर्न्यवर्तयत। स साहस्रमपुष्यत्। पृथिवी न्यवर्तयत। सौषधीभिर्वनस्पतिभिरपुष्यत्। - - तै.ब्रा.२.३.३.२

*नक्तं जाताऽस्योषधे। रामे कृष्णे असिक्नि च ईं रजनि रजय। किलासं पलितं च यत्। - तै.ब्रा.२.४.४.१

*असितं ते निलयनम्। आस्थानमसितं तव। असिक्नियस्योषधे। निरितो नाशया पृषत्। - - - - - सरूपा नाम ते माता। सरूपो नाम ते पिता। सरूपाऽस्योषधे  सा। सरूपमिदं कृधि। - तै.ब्रा.२.४.४.२

*अच्छा वद तवसं गीर्भिराभिः। स्तुहि पर्जन्यं नमसा विवास। कनिक्रदद्वृषभो जीरदानुः। रेतो दधात्वोषधीषु गर्भम्।।यो गर्भमोषधीनाम्। गवां कृणोत्यर्वताम्। पर्जन्यः पुरुषीणाम्। तस्मा इदास्ये हविः। जुहोता मधुत्तमम्। इडां नः संयतं करत्। - तै.ब्रा.२.४.५.५

*विश्वा आशा मधुना संसृजामि। अनमीवा आप ओषधयो भवन्तु। अयं यजमानो मृधो व्यस्यताम्। अगृभीताः पशवः सन्तु सर्वे। - तै.ब्रा.२.५.३.३

*सोमो वा अकामयत। ओषधीनां राज्यमभिजयेयमिति। स एतं सोमाय मृगशीर्षाय श्यामाकं चरुं पयसि निरवपत्। ततो वै स ओषधीनां राज्यमभ्यजयत्। - तै.ब्रा.३.१.४.३

*ऋक्षा वा इयमलोमकाऽऽसीत्। साऽकामयत। ओषधीभिर्वनस्पतिभिः प्रजायेयेति। सैतमदित्यै पुनर्वसुभ्यां चरुं निरवपत्। ततो वा इयमोषधीभिर्वनस्पतिभिः प्राजायत। - तै.ब्रा.३.१.४.५

*यो वा ओषधीः पर्वशो वेद। नैना स हिनस्ति। प्रजापतिर्वा ओषधीः पर्वशो वेद। स एना न हिनस्ति।। अश्वपर्श्वा बर्हिरच्छैति। - तै.ब्रा.३.२.२.१

*दर्शपूर्णमासः :- वर्षवृद्धमसीत्याह। वर्षवृद्धा वा ओषधयः। देव बर्हिरित्याह। देवेभ्य एवैनत्करोति। - - - - तै.ब्रा.३.२.२.५

*पवित्रवत्यानयति। अपां चैवौषधीनां च रसं संसृजति। अथो ओषधीष्वेव पशून्प्रतिष्ठापयति। - तै.ब्रा.३.२.३.६

*समापो अद्भिरग्मत समोषधयो रसेनेत्याह। आपो वा ओषधीर्जिन्वन्ति। ओषधयोऽपो जिन्वन्ति। - तै.ब्रा.३.२.८.१

*सं रेवतीर्जगतीभिर्मधुमतीर्मधुमतीभिः सृज्यध्वमित्याह। आपो वै रेवतीः। पशवो जगतीः। ओषधयो मधुमती:। आप ओषधीः पशून्। तानेवास्मा एकधा संसृज्य। मधुमत: करोति। - तै.ब्रा.३.२.८.२

*ओषध्यास्ते मूलं मा हिंसिषमित्याह। ओषधीनामहिंसायै। - तै.ब्रा.३.२.९.३

*ओषधीभ्यः स्वाहा मूलेभ्यः स्वाहेत्योषधिहोमाञ्जुहोति। द्वय्यो वा ओषधयः। पुष्पेभ्योऽन्या फलं गृह्णन्ति। मूलेभ्योऽन्याः। ता एवोभयीरवरुन्धे। - तै.ब्रा.३.८.१७.४

*भक्षयित्वा प्राणनिवहानात्मन्प्रतिष्ठापयते ओषधिवनस्पतयो मे लोमसु श्रिताः। लोमानि हृदये। हृदयं मयि। अहममृते। अमृतं ब्रह्मणि। - तै.ब्रा.३.१०.८.७

*शिवा नः शंतमा भवन्तु। दिव्या आप ओषधयः (इति सौषध्योऽपोऽध्वर्यवे ददाति। स ताः प्रतिगृह्य शिवा न इत्युपदधाति)। - तैत्तिरीय आरण्यक १.१.३

*मयोभूर्वातोv विश्वकृष्टयः सन्त्वस्मे। सुपिप्पला ओषधीर्देवगोपाः। यो गर्भमोषधीनाम्। गवां कृणोत्यर्वताम्। पर्जन्यः पुरुषीणाम् ॥ - तै.आ.१.२९.१  

*ब्रह्मयज्ञः।हृदयस्पर्शनोत्तरभाविकर्तव्यं :- दर्भाणां महदुपस्तीर्योपस्थं कृत्वा प्राङासीनः स्वाध्यायमधीयीतापां वा एष ओषधीनां रसो यद्दर्भाः सरसमेव ब्रह्म कुरुते। - तै.आ.२.११.१

*संभारयजूंषि - - -आपः प्रोक्षणीभिः। ओषधयो बर्हिषा। अदितिर्वेद्या। - - - तै.आ.३.८.१

*सुमित्रा न आप ओषधयः सन्तु। दुर्मित्रास्तस्मै भूयासुः। योऽस्मान्द्वेष्टि। यं च वयं द्विष्मः। (इति मार्जालीयदेश उच्छिष्टसरे मार्जयित्वा) - तै.आ.४.११.८

*ज्योतिर्भा असि वनस्पतीनामोषधीनां रस (इति महावीर आनयति) - तै.आ.४.१२.१

*सुमित्रा न आप ओषधयः सन्तु दुर्मित्रास्तस्मै भूयासुर्योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः। - तै.आ.४.४२.४

*- - -शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः - - - -तै.आ.४.४२.५

*सोऽस्मयत। एकं मा सन्तं बहवो नाभ्यधर्षिषुरिति। तस्य सिष्मियाणस्य तेजोऽपाक्रामत्। तद्देवा ओषधीषु निमृजुः। ते श्यामाका अभवन्। स्मयाका वै नामैते। - तै.आ.५.१.३

*यत्पृथिव्यामुद्वासयेत्। पृथिवीं शुचाऽर्पयेत्। यदप्सु। अपः शुचाऽर्पयेत्। यदोषधीषु। ओषधीः शुचाऽर्पयेत्। - - - हिरण्यं निधायोद्वासयति। अमृतं वै हिरण्यम्। - तै.आ.५.९.५

*सुमित्रा न आप ओषधयः सन्त्वित्याह। आशिषमेवैतामाशास्ते। तै.आ.५.९.११

*सूर्यं ते चक्षुर्गच्छतु वातमात्मा द्यां च गच्छ पृथिवीं च धर्मणा। अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु  प्रतितिष्ठा शरीरैः। (इति षड्ढोतारं व्याचष्टे) - तै.आ.६.१.४

*प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युत उदोषधीर्जिहते पिन्वते सुवः। इरा विश्वस्मै भुवनाय जायते यत्पर्जन्यः पृथिवीं रेतसाऽवति।(इति उदपात्रेणोदुम्बरशाखया वोक्षति) - तैआ.६.६.४

*यथा त्वमुद्भिनत्स्योषधे पृथिव्या अधि। एवमिम उद्भिन्दन्तु कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन (इति कुशतरुणकानि समुच्छ्रित्य दर्भस्तम्बे निदधाति)- तै.आ.६.१०.२

*यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान्व्यचसर्ज भूम्याम्। यदोषधीभिः पुरुषान्पशूंश्च विवेश भूतानि चराचराणि। - तै.आ.१०.१.२

*याभिरादित्यस्तपति रश्मिभिस्ताभिः पर्जन्यो वर्षति पर्जन्येनौषधिवनस्पतयः प्रजायन्त ओषधिवनस्पतिभिरन्नं भवत्यन्नेन प्राणा प्राणैर्बलं- - - -तै.आ.१०.६३

*पुरोडाशश्रपणम् :- सं वपामि समापो अद्भिरग्मत समोषधयो रसेन सं रेवतीर्जगतीभिर्मधुमतीर्मधुमतीभिः सृज्यध्वम् - तैत्तिरीय संहिता १.१.८.१

*आज्यादिहविर्ग्रहणार्था मन्त्राः :- महीनां पयोऽस्योषधीनां रसस्तस्य तेऽक्षीयमाणस्य नि वपामि महीनां पयोऽस्योषधीनां रसोऽदब्धेन त्वा चक्षुषाऽवेक्षे (इति तस्यां पवित्रान्तर्हितायामाज्यं निरुप्य) - तै.सं.१.१.१०.२

*आध्वर्यवा स्रुग्व्यूहनादिमन्त्राः :- आप्यायन्तामाप ओषधयो मरुतां पृषतय स्थ दिवम् गच्छ ततो नो वृष्टिमेरय (इति तमुपरीव प्रहरति नात्यग्रं प्रहरति न पुरस्तात्प्रत्यस्यति न प्रतिशृणाति न विष्वञ्चं वियौत्यूर्ध्वमुद्यौति) - तै.सं.१.१.१३.१

*यजमानकर्तृकप्राग्वंशप्रवेशोपयुक्ता मन्त्राः :- आप उन्दन्तु जीवसे दीर्घायुत्वाय वर्चस ओषधे त्रायस्वैनं स्वधिते मैनं हिंसीः (इति ऊर्ध्वाग्रं बर्हिरनूच्छ्रयति) - तै.सं.१.२.१.१

*इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी आप ओषधीस्त्वं दीक्षाणामधिपतिरसीह मा सन्तं पाहि (इति पूर्वया द्वारा शालां प्रपादयति) - तै.सं.१.२.१.२

*प्राचीनवंशप्रविष्टयजमानस्य दीक्षाङ्गभूता मन्त्राः :- कृष्यै त्वा सुसस्यायै सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः सूपस्था देवो वनस्पतिरूर्ध्वो मा पाहि (इत्यर्थे प्राप्ते शिरसि कण्डूयते) - तै.सं.१.२.२.३

*सोमस्य शकटारोपणम् :- उदायुषा स्वयुषोदोषधीनां रसेनोत्पर्जन्यस्य शुष्मेणोदस्थाममृताँ अनु।(इति सोमम् आदायोपोत्तिष्ठति) - तै.सं.१.२.८.१

*अग्नीषोमपश्वभिधानाय पश्वङ्गयूपच्छेदनाभिधानम् :- - - - देवस्त्वा सविता मध्वाऽनक्त्वोषधे त्रायस्वैनं स्वधिते मैनं हिंसी (इति स्रुवेण सर्वतोv मूलं पर्यणक्ति) - तै.सं.१.३.४.१

*छिन्नस्य यूपस्य स्थापनम् :- देवस्त्वा सविता मध्वाऽनक्तु सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्य उद्दिवं स्तभानाऽन्तरिक्षं पृण - -- - - -(इति प्रवृह्य चषालं यूपस्याग्रमनक्ति) - तै.सं.१.३.६.१

*उपाकृताग्नीषोमीयपशुविशसनाभिधानम् :- आ दद ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेनाऽऽरभे धर्षा मानुषानद्भ्यस्त्वोषधीभ्यः प्रोक्षामि (इति सावित्रेण रशनामादाय - - - - प्रोक्षति) - तै.सं.१.३.८.१

*संज्ञपितस्य पशोर्वपोत्खेदनम् :- शुद्धाश्चरित्राः शमद्भ्यः शमोषधीभ्यः शं पृथिव्यै शमहोभ्यामोषधे त्रायस्वैनं स्वधिते मैनं हिंसी (इति उपाकरणयोरवशिष्टं दक्षिणेन नाभिमन्तर्धाय) - - - -तै.सं.१.३.९.२

*वसाहोमः :- वातस्य त्वा ध्रज्यै पूण्णो रंह्या अपामोषधीनां रोहिष्यै (इति दक्षिणेन पार्श्वेन वसाहोमं प्रयौति) -तै.सं.१.३.१०.२

*गुदकाण्डकरणकोपयट्संज्ञका होमाः :- अद्भ्यस्त्वौषधीभ्यो मनो मे हार्दि यच्छ (इति बर्हिषि लेपं निमृज्य मनो मे हार्दि यच्छेति जपति) - तै.सं.१.३.११.१

*अवभृथाभिधानम् :- सं त्वा विशन्त्वोषधीरुताऽऽपो यज्ञस्य त्वा यज्ञपते हविर्भि (इति सम्यञ्चं दधाति) - तै.सं.१.४.४.५२

*अवभृथाभिधानम् :- सुमित्रा न आप ओषधयः सन्तु दुर्मित्रास्तस्मै भूयासुर्योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो (इति अञ्जलिनाऽप उपसंगृह्य तां दिशं निरुक्षिति यस्यां दिश्यस्य द्वेष्यो भवति) - तै.सं.१.४.४५.२

*पुनराधानम् :- दर्भैः (अग्निम्) आ दधात्यद्भ्य एवैनमोषधीभ्योऽवरुध्या धत्ते - तै.सं.१.५.१.४

*पूर्वोक्तोपस्थानस्याग्निहोत्राङ्गताप्रदर्शनम् :- प्रजननं हि वा अग्निरथौषधीरन्तगता दहति तास्ततोभूयसी  प्र जायन्ते यत्सायं जुहोति रेत एव तत्सिञ्चति प्रैव प्रातस्तनेन जनयति - तै.सं.१.५.९.१

*प्रवत्स्यतो यजमानस्योपस्थानमन्त्राः :- या इष्टा उषसो निम्रुचश्च ता सं दधामि हविषा घृतेन। पयस्वतीरोषधयः पयस्वद्वीरुधां पयः (इति अप आचामत्युपस्पृशति वा) - तै.सं.१.५.१०.२

*काम्ययाज्यापुरोनुवाक्याभिधानम्। याज्या :- पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश। वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्। - तै.सं.१.५.११.१

*आप्यायनादि अनुमन्त्राभिधानम् :- उदीच्यां दिश्याप ओषधयो वनस्पतयो मार्जयन्ताम् ऊर्ध्वायां दिशि - -  - तै.सं.१.६.५.२

*इडाप्रशंसा :-ओषधयो वा अस्या इडाया अन्नमोषधयो वै प्रजा प्रभवन्ती प्रत्या भवन्ति य एवं वेदान्नादो भवति - तै.सं.१.७.२.३

*वाजपेयोपयुक्तान्नहोमाभिधानम् :- वाजस्येमं प्रसव सुषुवे अग्रे सोमं राजानमोषधीष्वप्सु। ता अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु वयं राष्ट्रे जागि|याम पुरोहिताः (इति पुरस्तादौदुम्बरे द्रोणे सर्वौषधमाज्येन समुदायुतं भवति तस्योदुम्बरेण स्रुवेणोपघातं सप्तान्नहोमाञ्जुहोति - तै.सं.१.७.१०.१

*काम्ययाज्यापुरोनुवाक्याभिधानम् :- अन्वह मासा अन्विद्वनान्यन्वोषधीरनु पर्वतासः। अन्विन्द्रं रोदसी वावशाने अन्वापो अजिहत जायमानम्। - तै.सं.१.७.१३.१

*राजसूयविषयाणामभिषेकार्थजलविषयमन्त्राणामभिधानम् :-" विश्वभृतः स्थ जनभृतः स्थाग्नेस्तेजस्याः स्थापामोषधीनां रस स्थापो देवीर्मधुमतीरगृह्णन्नूर्जस्वती राजसूयाय चितानाः। - तै.सं.१.८.११.१

*राजसूयविषयदिग्व्यास्थापनमन्त्राणामभिधानम् :-- - - नक्षत्रेभ्यः स्वाहाऽद्भ्यः स्वाहौषधीभ्यः स्वाहा वनस्पतिभ्यः स्वाहा- - -तै.सं.१.८.१३.३

*वरुणगृहीतादिपशुविधानम् :- अथ वै तर्ह्यल्पा पृथिव्यासीदजाता ओषधयस्तामविं वशामादित्येभ्यः कामायाऽलभन्त ततो वा अप्रथत पृथिव्यजायन्तौषधयो - तै.सं.२.१.२.३

*पशुकामादीनां पशुविधिः :- पशव वा अहोरात्राणि पशूनेव प्रजातान्प्रतिष्ठां गमयत्योषधीभ्यो वेहतमा लभेत प्रजाकाम ओषधयो वा एतं प्रजायै परि बाधन्ते योऽलं प्रजायै सन्प्रजां न विन्दत ओषधयः खलु वा एतस्यै सूतुमपि घ्नन्ति या वेहद्भवत्योषधीरेव स्वेन भागधेयेनोप धावति। ता एवास्मै स्वाद्योनेः प्रजां प्र जनयन्ति विन्दते प्रजामापो वा ओषधयोऽसत्पुरुष आप एवास्मा असतः सद्ददति - तै.सं.२.१.५.३

*अन्नाद्यकामादीनां पशुविधिः :- मैत्रं श्वेतमालभेत वारुणं कृष्णमपां चौषधीनां च संधावन्नकामो मैत्रीर्वा ओषधयो वारुणीरापोऽपां च खलु वा ओषधीनां च रसमुप जीवामो मित्रावरुणावेव स्वेन भागधेयेनोप धावति तावेवास्मा अन्नं प्र यच्छतोऽन्नाद एव भवति अपां चौषधीनां च संधावा लभत उभयस्यावरुद्ध्यै -  तै.सं.२.१.९.२

*पाप्मना गृहीतस्येष्टिविधिः :- यो वामिन्द्रावरुणा द्विपात्सु पशुषु चतुष्पात्सु गोष्ठे गृहेष्वप्स्वोषधीषु वनस्पतिषु स्रामस्तं वामेतेनाव यज - तै.सं.२.३.१३.१

*पाप्मना गृहीतस्येष्टिविधिः :- यो वामिन्द्रावरुणा द्विपात्सु पशुषु स्रामस्तं वामेतेनाव यज इत्याहैतावतीर्वा आप ओषधयो वनस्पतयः प्रजाः पशव उपजीवनीयास्ता एवास्मै वरुणपाशान्मुञ्चति। - तै.सं.२.३.१३.३

*काम्ययाज्यापुरोनुवाक्याभिधानम् :- या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु। तेभिर्नो विश्वैः सुमना अहेडन्राजन्त्सोम प्रति हव्या गृभाय। - तै.सं.२.३.१४.१

*कारीरीष्टिमन्त्रव्याख्यानम् :- अपां वा एष ओषधीनां रसो यन्मध्वद्भ्य एवौषधीभ्यो वर्षत्यथो अद्भ्य एवौषधीभ्यो वृष्टिं नि नयति - तै.सं.२.४.९.३

*अमावास्यायां सांनाय्ययागविधिः :- इन्द्रस्य वृत्रं जघ्नुष इन्द्रियं वीर्यं पृथिवीमनु व्यार्छत्तदोषधयो वीरुधोऽभवन्त्स प्रजापतिमुपाधावद् वृत्रं मे जघ्नुष इन्द्रियं वीर्यम् पृथिवीमनु व्यारत्तदोषधयो वीरुधोऽभूवन्निति स प्रजापतिः पशूनब्रवीदेतदस्मै सं नयतेति तत्पशव ओषधीभ्योऽध्यात्मन्त्समनयन्तत्प्रत्यदुहन्यत्समनयन्तत्सांनाय्यस्य सानाय्यत्वं - तै.सं.२.५.३.३

*वेदिविधिः :- उद्धन्ति यदेवास्या अमेध्यं तदप हन्त्युद्धन्ति तस्मादोषधय परा भवन्ति मूलं छिनत्ति भ्रातृव्यस्यैव मूलं छिनत्ति - तै.सं.२.६.४.२

*पशूपाकरणमन्त्राम्नानम् :- सुवर्गं याहि पथिभिर्देवयानैरोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः।- तै.सं.३.१.४.१

*उपांशुग्रहार्थाभिषवमन्त्राणामभिधानम्  :- इन्द्रेण देवीर्वीरुधः  संविदाना अनु मन्यन्तां सवनाय सोममित्याहौषधीभ्य एवैनं स्वायै विशः स्वायै देवतायै निर्याच्याभि षुणोति - तै.सं.३.१.८.२

*सवनाहुत्यादिमन्त्राणामभिधानम् :- ऐन्द्रवायमादायाऽऽघारमा घारयेद् अध्वरो यज्ञोरयमस्तु देवा ओषधीभ्यः पशवे नो जनाय - तै.सं.३.१.९.३

*कासांचित्पुरोनुवाक्यानामभिधानम् :- घृतेन द्यावापृथिवी मधुना समुक्षत पयस्वतीः कृणुताऽऽप ओषधीः। ऊर्जं च तत्र सुमतिं च पिन्वथ यत्रा नरो मरुतः सिञ्चथा मधु। - तैसं.३.१.११.८

*सोमावेक्षणाभिधानम् :- स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते शं राजन्नोषधीभ्यो ऽच्छिन्नस्य ते रयिपते सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम। - तै.सं.३.२.३.१

*विकृतिरूपद्वादशाहशेषपृश्निग्रहाभिधानम् :- भूतमसि भव्यं नाम पितृणामाधिपत्येऽपामोषधीनां गर्भं धा ऋतस्य त्वा व्योमन ऋतस्य त्वा विभूमन- - - तै.सं.३.३.५.१

*पशवो वा अपामोषधीनां गर्भः पशूनेव अवरुन्ध - तैसं.३.३.५.३

*गवामयनगतपरसंज्ञकातिग्राह्यविशेषाभिधानम् :-  ब्रह्मवादिनो वदन्ति कस्मात्सत्र्याद्भ्य ओषधयः सं भवन्तयोषधयो मनुष्याणामन्नं प्रजापतिं प्रजा अनु प्र जायन्त इति परानन्विति ब्रूयाद्यद्गृह्णात्यद्भ्यस्त्वौषधीभ्यो गृह्णामीति तस्मादद्भ्य ओषधयः सं भवन्ति यद्गृह्णात्योषधीभ्यस्त्वा प्रजाभ्यो गृह्णामीति तस्मादोषधयो मनुष्याणामन्नं - तै.सं.३.३.६.२

*वृषालम्भाख्यकर्माभिधानम् ;वपाहोममन्त्रः :- देवानामेष उपनाह आसीदपां गर्भ ओषधीषु न्यक्तः। - तै.सं.३.३.९.१

*काम्यपश्वालम्भनविधिः :- द्यावापृथिव्यामा लभेत् कृषमाणः प्रतिष्ठाकामो दिव एवास्मै पर्जन्यो वर्षति व्यस्यामोषधयो रोहन्ति समर्धुकमस्य सख्यं भवति - तै.सं.३.४.३.३

*राष्ट्रभृन्मन्त्राभिधानम् :- ऋताषाडतृधामाऽग्निर्गन्धर्वस्तस्योषधयोऽप्सरस ऊर्जो नाम स इदं ब्रह्म क्षत्त्रं पातु ता इदं ब्रह्म क्षत्त्रं पान्तु - तै.सं.३.४.७.१

*सौमिकब्रह्मत्वविधिः :- रेवदस्योषधीभ्यस्त्वौषधीर्जिन्वेत्याहौषधीष्वेव पशून्प्रतिष्ठापयति - तै.सं.३.५.२.४

*आदित्यग्रहमन्त्रोक्तिः :- पशवो वा एते यदादित्य एष रुद्रो यदग्निरोषधीः प्रास्याग्नावादित्यं जुहोति रुद्रादेव पशूनन्तर्दधात्यथो ओषधीष्वेव पशून् प्रतिष्ठापयति - तै.सं.३.५.५.२

*दधिग्रहणमन्त्रोक्ति : प्राणाय त्वाऽपानाय त्वा व्यानाय त्वा सते त्वाऽसते त्वाऽद्भ्यस्त्वौषधीभ्यो विश्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यो - तै.सं.३.५.८.१

*मृदाक्रान्त्यभिधानम् :- अपो देवीरुप सृज मधुमतीरयक्ष्यमाय प्रजाभ्यः। तासां स्थानादुज्जिहतामोषधयः सुपिप्पलाः। (इति अश्वस्य पदेऽप उपसृज्य) - तै.सं.४.१.२.४

*मृदाक्रान्त्यभिधानम् :- त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः (इति अभ्रिया मृत्खनं परिलिखति बाह्यां वर्षीयसीम्)- तै.सं.४.१.२.५

*मृदाहरणाभिधानम् :- स जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ओषधीषु। चित्रः शिशुः परि तमाँस्यक्तः प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गा:। (इति हरति) - तै.सं.४.१.४.२

*चयनार्थदेवयजनपरिग्रहाभिधानम् :- अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे। गर्भे सञ्जायसे पुनः। गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्। गर्भो विश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि।(इति अप्सु भस्म प्रवेशयति) - तै.सं.४.२.३.३

*गार्हपत्यचयनाभिधानम् :- अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीषु अप्सु वा यजत्र। येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः (इति मध्ये प्राचीरिष्टका गार्हपत्यचितावुपदधाति)। - तै.सं.४.२.४.२

* आहवनीयचयनार्थ भूकर्षणाभिधानम् :- कामं कामदुघे धुक्ष्व मित्राय वरुणाय च। इन्द्रायाग्नये पूष्ण ओषधीभ्यः प्रजाभ्यः।(इति पुच्छाच्छिरोऽधि कृषति) - - - - तै.सं.४.२.५.६

*आहवनीयचयनार्थौषधिवापाभिधानम् :- या जाता ओषधयो देवभ्यस्त्रियुगं पुरा। मन्दामि बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च। शतं वो अम्ब धामानि सहस्रमुत वो रुहः। अथा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं कृत। पुष्पावतीः प्रसूवतीः फलिनीरफला उत। अश्वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्णवः। ओषोधीरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ब्रुवे। रपांसि विघ्नतीरित रपः चातयमानाः। अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिः कृता। गोभाज इत्किलासथ यतसनवथ पूरुषम्। यदहं वाजयन्निमा ओषधीर्हस्त आदधे। आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा। यदोषधयः संगच्छन्ते राजानः समिताविव। विप्रः स उच्यते भिषग्रक्षोहाऽमीवचातनः। - - - -ता सर्वा ओषधयः संविदाना इदं मे प्रावता वचः। उच्छुष्मा ओषधीनां गावो गोष्ठादिवेरते। धनं सनिष्यन्तीनामात्मानं तव पूरुष - - - - या ओषधयः सोमराज्ञी: प्रविष्टाः पृथिवीमनु। तासां त्वमस्युत्तमा प्र णो जीवातवे सुव। अवपतन्तीरवदन्दिव ओषधयः परि। यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः। - - - - - ओषधयः सं वदन्ते सोमेन सह राज्ञा। यस्मै करोति ब्राह्मणस्तं राजन्पारयामसि। - तै.सं.४.२.६.१-५

*आहवनीयचयनार्थलोष्टक्षेपाद्यभिधानम् :- आ नो गोषु विशत्वोषधीषु जहामि सेदिमनिराममीवाम् (इति चतसृभिर्दिग्भ्योलोष्टान्त्समस्यति येऽन्तर्विधाद्बहिर्विधमापन्ना भवन्ति) - तै.सं.४.२.७.२

*स्वयमातृण्णादीष्टकोपधानाभिधानम् :- मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः (इति दध्ना मधुमिश्रेण कूर्ममभ्यज्य)। - तै.सं.४.२.९.३

*अवभृथे प्रथमाज्यभागस्य पुरोनुवाक्या :- अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे। गर्भे सञ्जायसे पुनः। - तै.सं.४.२.११.३

*पञ्चमचितिशेषस्तोमभागाभिधानम् ; पश्चिमायां दिश्युपधेयानामिष्टकानां मन्त्राः :-  रेवदस्योषधीभ्यस्त्वौषधीर्जिन्व - तै.सं.४.४.१.२

*ऋतव्याख्येष्टकाभिधानम् :-- - - -द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप ओषधीः कल्पन्तामग्नयः पृथङ् - तै.सं.४.४.११.१

*अश्वाक्रमणपूर्वकभूसंस्काराभिधानम् :- यत्र वा आप उपगच्छन्ति तदोषधयः प्रति तिष्ठन्त्योषधीः प्रतितिष्ठन्तीः पशवोऽनु प्रतितिष्ठन्ति पशून्यज्ञो यज्ञं यजमानो यजमानं प्रजाः - तै.सं.५.१.३.१

*संभृतमृदो यज्ञभूमौ समाहरणम् :- इमे वै रोदसी तयोरेष गर्भो यदग्निस्तस्मादेवमाहाग्ने चारुर्विभृत ओषधीष्वित्याह यदा ह्येतं विभरन्त्यथ चारुतरो भवति प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गा इत्याहौषधयो वा अस्य मातरस्ताभ्य एवैनं प्र च्यावयति - तै.स.५.१.५.४

*उखानिर्माणम् :- ओषधयः प्रतिमोदध्वम् एनमित्याहौषधयो वा अग्नेर्भागधेयं ताभिरेवैनं समर्धयति पुष्पावतीः सुपिप्पला इत्याह तस्मादोषधयः फलं गृह्णन्ति - तै.सं.५.१.५.१०

*क्षेत्रकर्षणम् :- तिस्रस्तिस्रः सीताः कृषति त्रिवृतमेव यज्ञमुखे वि यातयत्योषधीर्वपति ब्रह्मणाऽन्नमवरुन्धे ऽर्केऽर्कश्चीयते चतुर्दशभिर्वपति सप्त ग्राम्या ओषधयः सप्ताऽऽरण्या उभयीषामवरुद्ध्या - - - -कृष्टे वपति कृष्टे ह्योषधयः प्रतितिष्ठन्त्यनुसीतं वपति प्रजात्यै - तै.सं.५.२.५.५

*रुक्माद्युपधानम् :- पृथिवीं शुचाऽर्पयेन्नोषधयो न वनस्पतयः प्र जायेरन्यदन्तरिक्षे चिन्वीतान्तरिक्षं शुचाऽर्पयेत् - तै.सं.५.२.७.१

*स्तोमभागास्येष्टकाभिधानम् :- पृतनाषाड् इति पशून्रेवदित्योषधीरभिजिदसि युक्तग्रावा - तै.सं.५.३.६.१

*भूयस्कृदादीष्टकाषट्काभिधानम् :- भूयस्कृदसीत्येव भूयांसोऽभवन् वनस्पतिभिरोषधीभिर्वरिवस्कृदसीतीमामजयन् - तै.सं.५.३.११.१

*वाजप्रसवीयाभिधानम् :- अथो अभिषेक एवास्य स चतुर्दशभिर्जुहोति सप्त ग्राम्या ओषधयः सप्त आरण्या उभयीषामवरुद्ध्या - तै.सं.५.४.९.१

*रेतसिगाद्यभिधानम् :- यत्र असौ रेतः सिञ्चति तदस्यां प्रति तिष्ठति तत्प्र जायते ता ओषधय वीरुधो भवन्ति ता अग्निरत्ति य एवं वेद प्रैव जायते ऽन्नादो भवति - तै.सं.५.५.४.१

*आहुत्याद्यभिधानम् :- यो रुद्रो अग्नौ यो अप्सु य ओषधीषु यो रुद्रो विश्वा भुवनाऽऽविवेश तस्मै रुद्राय नमो अस्तु - तै.सं.५.५.९.३

*बहुधा चयनप्रशंसा :- इयं वाव प्रथमा चितिरोषधयो वनस्पतय पुरीषमन्तरिक्षं द्वितीया वयांसि पुरीषमसौ तृतीया नक्षत्राणि पुरीषं - - - -तै.सं.५.६.१०.२

*ऋषभेष्टकाद्यभिधानम् :- ब्रह्मवादिनो वदन्ति यदर्धमासा मासा ऋतवः संवत्सर ओषधीः पचन्त्यथ कस्मादन्याभ्यो देवताभ्य आग्रयणं निरुप्यत - - - -तै.सं.५.७.२.५

*अग्नेः पक्षतिः सरस्वत्यै निपक्षति सोमस्य तृतीयाऽपां चतुर्थ्योषधीनां पञ्चमी संवत्सरस्य षष्ठी - - - तै.सं.५.७.२१.१

*क्षुरकर्मादिसंस्कृतस्य प्राग्वंशप्रवेशाभिधानम् - - - पितृणां नीविरोषधीनां प्रघातः आदित्यानां प्राचीनतानो - - - तै.सं.६.१.१.३

*कृष्णाजिनादिभिर्दीक्षाकरणाभिधानम् :- कृष्यै त्वै सुसस्याया इत्याह तस्मादकृष्टपच्या ओषधयः पच्यन्ते सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्य इत्याह तस्मादोषधयः फलं गृह्णन्ति - तै.सं.६.१.३.७

*सोमोन्मानाभिधानम् :- ब्रह्मवादिनो वदन्ति विचित्य सोमा ३ न विचित्या३ इति सोमो वा ओषधीनां राजा तस्मिन्यदापन्नं ग्रसितमेवास्य तद्यद्विचिनुयात्- - -तै.सं.६.१.९.१

*वेद्यभिधानम् :- उद्धन्ति यदेवास्या अमेध्यं तदप हन्त्युद्धन्ति तस्मादोषधय परा भवन्ति बर्हिः स्तृणाति तस्मादोषधयः पुनरा भवन्त्युत्तरं बर्हिष उत्तरबर्हिः स्तृणाति - - - तै.सं.६.२.४.५

*काम्ययागभूम्यभिधानम् :- यत्रान्याअन्या ओषधयो व्यतिषक्ता स्युस्तद्याजयेत्पशुकाममेतद्वै पशूनां रूपं रूपेणैवास्मै पशून् अवरुन्धे - तै.सं.६.२.६.३

*व्याघारणविधिः :- स (अग्निः) निलायत स यां वनस्पतिष्ववसत्तां पूतुद्रौ यामोषधीषु ताँ सुगन्धितेजने यां पशुषु तां पेत्वस्यान्तरा शृङ्गे - - - - तै.सं.६.२.८.४

*यूपखण्डनाभिधानम् :- देवस्त्वा सविता मध्वाऽनक्त्वित्याह तेजसैवैनमनक्त्योषधे त्रायस्वैनं स्वधिते मैनं हिंसीरित्याह वज्रो वै स्वधितिः शान्त्यै - - -तै.सं.६.३.३.२

*यूपस्थापनाभिधानम् :- सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्य इति चषालं प्रति मुञ्चति तस्माच्छीर्षत ओषधयः फलं गृह्णन्ति - तै.सं.६.३.४.२

*यूपस्थापनाभिधानम् :- पितृणां निखातं मनुष्याणामूर्ध्वं निखातादा रशनाया ओषधीनां रशना विश्वेषाम् देवानामूर्ध्वं रशनाया आ चषालादिन्द्रस्य - - -तै.सं.६.३.४.६

*पशुनियोजनम् :- अद्भ्यः त्वौषधीभ्यः प्रोक्षामीत्याहाद्भ्यो ह्येष ओषधीभ्यः संभवति यत्पशुः - तै.सं.६.३.६.४

*वपाहोमाभिधानम् :- ओषधे त्रायस्वैनं स्वधिते मैनं हिंसीरित्याह वज्रो वै स्वधितिः शान्त्यै - तै.सं.६.३.९.१

*वपाहोमाभिधानम् :- अग्रं वा एतत्पशूनां यद्वपाऽग्रमोषधीनां बर्हिरग्रेणैवाग्रं समर्धयत्यथो ओषधीष्वेव पशून्प्रतिष्ठापयति - तै.सं.६.३.९.५

*सोमपात्रस्तुतिः :- यानि पराचीनानि पात्राणि प्रयुज्यन्ते तान्यन्वोषधयः परा भवन्ति यानि पुनः प्रयुज्यन्ते तान्यन्वोषधयः पुनरा भवन्ति - - -यानि पराचीनानि प्रयुज्यन्ते तान्यन्वारण्याः पशवोऽरण्यमप यन्ति यानि पुनः प्रयुज्यन्ते तान्यनु ग्राम्याः पशवो ग्राममुपावयन्ति - तै.सं.६.५.११.१

*अवभृथहोमकथनम् :- सं त्वा विशन्त्वोषधीरुताऽऽप इत्याहाद्भिरेवैनमोषधीभिः सम्यञ्चं दधाति - तै.सं.६.६.३.४

*ज्योतिष्टोमतदाद्यसंस्थारूपाग्निष्टोमयोर्विधानम् :- - - - -तस्माद्वडवा द्विरेता अथो आहुरोषधीषु न्यमार्डिति तस्मादोषधयो ऽनभ्यक्ता रेभन्ति - तै.सं.७.१.१.२

*अश्वमेधमन्त्रकथनम् :- दिवे त्वा सते त्वाऽसते त्वाऽद्भ्यस्त्वौषधीभ्यस्त्वा विश्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यः। - तै.सं.७.१.११.१

*द्वादशरात्रकथनम् :-- - - स रसमह वसन्ताय प्रायच्छत् यवं ग्रीष्मायौषधीर्वर्षाभ्यो व्रीहीञ्छरदे - - -तै.सं.७.२.१०.२

*चतुर्दशरात्रकथमनम् :- चतुर्दश रात्रो भवति सप्त ग्राम्या ओषधयः सप्ताऽऽरण्या उभयीषामवरुद्ध्यै - तै.सं.७.३.४.१

*- - - -व्रीहिणाऽन्नानि यवेनौषधीर्न्यग्रोधेन वनस्पतीनुदुम्बरेणोर्जं - तै.सं.७.३.१४.१

*ओषधीभ्यः स्वाहा मूलेभ्यः स्वाहा तूलेभ्यः स्वाहा काण्डेभ्यः स्वाहा वल्शेभ्यः स्वाहा पुष्पेभ्यः स्वाहा फलेभ्यः स्वाहा - तै.सं.७.३.१९.१

*त्रिंशद्रात्रकथनम् :- ऋक्षा वा इयमलोमकाऽऽसीत्साऽकामयतौषधीभिर्वनस्पतिभिः प्र जायेयेति सैतास्त्रिंशतं रात्रीरपश्यत्ततो वा इयमोषधीभिर्वनस्पतिभिः प्राजायत - - - -इयं वा अक्षुध्यत्सैतां विराजमपश्यत्तामात्मन्धित्वान्नाद्यमवारुन्धौषधीः वनस्पतीन्प्रजां पशून्तेनावर्धते - तै.सं.७.४.३.१

*त्रिंशद्रात्रकथनम् :- यदेते स्तोमा व्यतिषक्ता भवन्ति तस्मादियम् ओषधीभिर्वनस्पतिभिर्व्यतिषक्ता  - तै.सं.७.४.३.५

*संवत्सरसत्रदीक्षाकालः :- ते पूर्वपक्ष उत्तिष्ठन्ति तानुत्तिष्ठत ओषधयो वनस्पतयोऽनूत्तिष्ठन्ति तान्कल्याणी कीर्तिरनूत्तिष्ठति - तै.सं.७.४.८.३

*अश्वमेधाङ्गमन्त्रकथनम् :- मयोभूर्वातोv अभि वातूस्रा ऊर्जस्वतीरोषधीरा रिशन्ताम्। पीवस्वतीर्जीवधन्या पिबन्त्ववसाय पद्वते रुद्र मृड। या सरूपा विरूपा एकरूपा - - - - -तै.सं.७.४.१७.१

*संवत्सरसत्रकथनम् :- उपरिष्टान्मासां पृष्ठान्युप यन्ति तस्मादुपरिष्टादोषधय फलं गृह्णन्ति। - तै.सं.७.५.१.६

*उपयामगृहीतोऽसि प्रजापतये त्वा जुष्टं गृह्णामि तस्य ते पृथिवी महिमौषधयो वनस्पतयो रूपमग्निस्ते तेजस्तस्मै त्वा महिम्ने प्रजापतये स्वाहा - तै.सं.७.५.१७.१

*- - -निकामेनिकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलिन्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्। - तै.सं.७.५.१८.१

*जज्ञि बीजं वर्ष्टा पर्जन्यः पक्ता सस्यं सुपिप्पला ओषधयः स्वधिचरणेयं सूपसदनोऽग्निः - - - -तै.सं.७.५.२०.१

*अश्वमेधाङ्गमन्त्रकथनम् :- अस्थानि नभो माँसान्योषधयो लोमानि वनस्पतयो - - -तै.सं.७.५.२५.१

*यदग्निं यजति तस्माद्दक्षिणतोऽग्रे ओषधयः पच्यमाना आयन्त्याग्नेय्यो ह्योषधयः। - ऐतरेय ब्राह्मण १.७

*स्तृणीत बर्हिरित्योषध्यात्मा वै पशुः पशुमेव तत्सर्वात्मानं करोति। - ऐ.ब्रा.२.६

*ऊवध्यगोहं पार्थिवं खनतादित्याहौषधं वा ऊवध्यमियं वा औषधीनां प्रतिष्ठा तदेनत्स्वायामेव प्रतिष्ठायामन्ततः प्रतिष्ठापयति - ऐ.ब्रा.२.६

*औषधं वा ऊवध्यमियं वा ओषधीनां प्रतिष्ठा तदेनत्स्वायामेव प्रतिष्ठायामन्ततः प्रतिष्ठापयन्ति - ऐ.ब्रा.२.११

*सोमं राजानं क्रीणन्त्यौषधो वै सोमो राजौषधिभिस्तं भिषज्यन्ति यं भिषज्यन्ति सोममेव राजानं क्रीयमाणमनु यानि कानि च भेषजानि तानि सर्वाण्यग्निष्टोममपियन्ति - - - -ऐ.ब्रा.३.४०

* इयं वै सर्पराज्ञीयं हि सर्वतोv राज्ञीयं वा अलोमिकेवाग्र आसीत्सैतं मन्त्रमपश्यदाऽयं गौः पृश्निरक्रमीदिति तामयं पृश्निर्वर्ण आविशन्नानारूपो यं यं काममकामयत यदिदं किंचौषधयो वनस्पतयः सर्वाणि रूपाणि। - ऐ.ब्रा.५.२३

*यस्याग्निहोत्र्युपावसृष्टा दुह्यमाना स्पन्देत का तत्र प्रायश्चितिरिति - - - यदद्य दुग्धं पृथिवीमसृप्त यदोषधीरत्यसृपद्यदापः। पयो गृहेषु पयो अघ्न्यायां पयो वत्सेषु पयो अस्तु तन्मयीति। - ऐ.ब्रा.५.२७

*अग्निहोत्रप्रशंसार्थं भावनारूपो होमः :- असौ वा अस्याऽऽदित्यो यूपः पृथिवी वेदिरोषधयो बर्हिर्वनस्पतय इध्मा आपः प्रोक्षण्यो दिशः परिधयः। - ऐ.ब्रा.५.२८

*यस्याग्निहोत्र्युपावसृष्टा दुह्यमाना स्पन्देत का तत्र प्रायश्चित्ति - - - -तदभिमृश्य जपेद्यदद्य दुग्धं पृथिवीमसृप्त यदोषधीरत्यसृपद्यदापः। पयो गृहेषु पयो अघ्न्यायां पयो वत्सेषु पयो अस्तु तन्मयीति - ऐ.ब्रा.७.३

*अथैतानि ह वै क्षत्त्रियादीजानाद् व्युत्क्रान्तानि भवन्ति ब्रह्मक्षत्त्रे ऊर्गन्नाद्यमपामोषधीनां रसो ब्रह्मवर्चसमिरापुष्टिः प्रजातिः क्षत्त्ररूपं तदथो अन्नस्य रस ओषधीनां क्षत्त्रं प्रतिष्ठा - - ऐ.ब्रा.८.७

*अथ यद्दधि मधु घृतं भवत्यपां स ओषधीनां रसो ऽपामेवास्मिंस्तदोषधीनां रसं दधाति - ऐ.ब्रा.८.८

*इन्द्रियं वा एतदस्मिँल्लोके यद्दधि यद्दध्नाऽभिषिञ्चतीन्द्रियमेवास्मिंस्तद्दधाति रसो वा एष ओषधिवनस्पतिषु यन्मधु यन्मध्वाऽभिषिञ्चति रसमेवास्मिंस्तद्दधाति - - -ऐ.ब्रा.८.२०

*पुरोहितस्य राजदत्तविष्टराभिमन्त्रणम् :- या ओषधीः सोमराज्ञीर्बह्वी: शतविचक्षणाः। ता मह्यमस्मिन्नासनेऽच्छिद्रं शर्म यच्छत। या ओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु। ता मह्यमस्मिन्नासनेऽच्छिद्रं शर्म यच्छत। - ऐ.ब्रा.८.२७

*तस्याग्निर्होतासीद्, वायुरध्वर्युः, सूर्य उद्गाता, - - - -ओषधिवनस्पतयश्चमसाध्वर्यवो, विश्वे देवा होत्रका - - -गोपथ ब्राह्मण १.१.१३

*अन्तरिक्षेण यजुः समदधाद्, यजुषा वायुं, वायुनाभ्रम्, अभ्रेण वर्षं, वर्षेणौषधिवनस्पतीन्, ओषधिवनस्पतिभिः पशून् - - - - गो.ब्रा.१.१.३५

*दिवा साम समदधात्, साम्नादित्यम्, आदित्येन रश्मीन्, रश्मिभिर्वर्षं, वर्षेणौषधिवनस्पतीन्, ओषधिवनस्पतिभिः पशून् - - -गो.ब्रा.१.१.३६

*जायमानो ह वै ब्राह्मणः सप्तेन्द्रियाण्यभिजायते - ब्रह्मवर्चसं च यशश्च - - - -मृगानस्य ब्रह्मवर्चसं गच्छति, - - -- - कुमारीं रूपम्, ओषधिवनस्पतीन् पुण्यो गन्धः। - - - - - अथैतद् ब्रह्मचारिणः पुण्यो गन्धो य ओषधिवनस्पतीनां, तासां पुण्यं गन्धं प्रच्छिद्य नोपजिघ्रेत्। तेन तं पुण्यं गन्धमवरुन्द्धे, यो ऽस्योषधिवनस्पतिषु भवति। - गो.ब्रा.१.२.२

*अथ ब्रह्माणं दीक्षयति। चन्द्रमा वै ब्रह्माधिदैवं मनो ऽध्यात्मम्। मनसैव तदोषधीः संदधाति। तद् या ओषधीर्वेद, स एव ब्रह्मौषधीस्तदनेन लोकेन संदधाति - गोब्रा.१.४.२

*अथोद्गातारं दीक्षयति। - - - - -पर्जन्यः आदित्यः। पर्जन्यादधि वृष्टिर्जायते। वृष्टिरेव तदोषधीः संदधाति। - गो.ब्रा.१.४.३

*पुरुषो वाव संवत्सरः। - - - - नखानि नक्षत्राणां रूपं, लोमान्योषधिवनस्पतीनाम्। - गो.ब्रा.१.५.३

*देवा वा ओषधीषु पक्वास्वाजिमयुः । स इन्द्रो ऽवेद् - अग्निर्वावेमा प्रथमः उज्जेष्यतीति। - - - - गो.ब्रा.२.१.१७

*- - - -अथो प्रतिष्ठित्या एव यो द्यावापृथिवीयः। सौमीर्वा ओषधीः। सोमः ओषधीनामधिराजः। याश्च ग्राम्या याश्चारण्यास्तासामेष उद्धारो यच्छ्यामाकः। - गो.ब्रा.२.१.१७

*रेवदसि, ओषधीभ्यस्त्वेति। ओषधीष्वेव यज्ञं प्रतिष्ठापयति। - गो.ब्रा.२.२.१३

*कुसीदं वा एतद् यमस्य यजमान आदत्ते, यदोषधीभिर्वेदिं स्तृणाति। - गो.ब्रा.२.४.८

*दक्षिणा वा एकेषां पशूनां रज्जवः सव्या एकेषां तद्यदुभय्यो रज्जवो भवन्त्युभयेषां पशूनामाप्त्यै। दार्भ्य: स्युर्दर्भो वा ओषधीनामपहतपाप्मा - ऐतरेय आरण्यक १.२.३

*समुत्सृप्य वा ओषधिवनस्पयः फलं गृह्णन्ति - ऐ.आ.१.२.४

*प्रजापते रेतो देवा देवानां रेतो वर्षं वर्षस्य रेत ओषधय ओषधीनां रेतोऽन्नमन्नस्य रेतो रेतो - - ऐ.आ.२.१.३

*अथातो विभूतयोऽस्य पुरुषस्य। तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्चास्यामोषधयो जायन्ते ऽग्निरेना स्वदयति - ऐ.आ.२.१.७

*ओषधिवनस्पतयोऽन्नं प्राणभृतोऽन्नादमोषधिवनस्पतीन्हि प्राणभृतोऽदन्ति - ऐ.आ.२.३.१

*ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत्स आत्मानमविस्तरां वेद। ओषधिवनस्पतिषु हि रसो दृश्यते चित्तं प्राणभृत्सु। प्राणभृत्सु त्वेवाविस्तरामात्मा तेषुहि रसोऽपि दृश्यते न चित्तमितरेषु। - ऐ.आ.२.३.२

*----त्वङ्निरभिद्यत त्वचा लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो। हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा। - ऐ.आ.२.४.१

*- - - दिश श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् - ऐ.आ.२.४.२

*- - - -एतमप्स्वेतमोषधीष्वेतं वनस्पतिष्वेतं चन्द्रमस्येतं नक्षत्रेष्वेतं सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते। - ऐ.आ.३.२.३

*- - - -मिथुनमिव मरीचयो भूयासम्। आप इव रस ओषधय इव रूपं भूयासम। अन्नमिव विभु यज्ञ इव प्रभुर्भूयासम्। - ऐ.आ.५.१.१

*अपां पुष्पमस्योषधीनां रस इन्द्रस्य प्रियतमं हविः स्वाहा - ताण्ड~य ब्राह्मण १.६.८

*शमद्भ्य ओषधीभ्यः (इत्युदञ्चं चमसन्निनयेयुः) - तां.ब्रा.१.६.१६

*रेवदस्योषधीभ्यस्त्वौषधीर्ज्जिन्व सवितृप्रसूता वृहस्पतये स्तुत - तां.ब्रा.१.१०.२

*- - -ऽयमन्यतरः पक्षः स ओषधिभिश्च वनस्पतिभिश्च साहस्रोऽन्तरिक्षमात्मा तद्वयोभिः साहस्रं - - - -तां.ब्रा.५.२.३

*पूर्व्वपक्षे मासाः सन्तिष्ठमाना यन्ति पूर्वपक्ष उत्तिष्ठन्ति तानुत्तिष्ठतः पशव ओषधयोऽनूत्तिष्ठन्ति तान्कल्याणी वागभिवदत्यरात्सुरिमे सत्रिण इति ते राध्नुवन्ति - तां.ब्रा.५.९.१४

*विषेण व ताँ समामोषधयोक्ता भवन्ति यां समाम्महादेवः पशून् हन्ति यच्छं राजन्नोषधीभ्य इत्याहौषधीरेवास्मै स्वदयत्युभय्योऽस्मै स्वदिता पच्यन्तेऽकृष्टपच्याश्च कृष्टपच्याश्च। - तां.ब्रा.६.९.९

*सोमपीथो वा एतस्मादपक्रामतीत्याहुर्यस्य सोममपहरन्तीति स ओषधीश्च पशूंश्च प्रविशति तमोषधिभ्यश्च पशुभ्यश्चावरुन्धे - तां.ब्रा.९.५.६

*दशरात्रगतान् त्रिवृदादिस्तोमान प्रशंसा :- अग्निना पृथिव्यौषधिभिस्तेनायं लोकस्त्रिवृद्वायुनान्तरिक्षेण वयोभिस्तेनैष लोकस्त्रिवृत्- - - -तां.ब्रा.१०.१.१

*षडहे विभक्तेर्नानात्वं :- यस्मादेषा समाना सतीन्द्रविभक्तिर्नानारूपा तस्माद्यथर्त्वोषधयः पच्यन्ते - तां.ब्रा.१०.८.१

*सत्रं सर्व्वनिधिसाधनमिति विवक्षुराह अथ ह वै तर्हि नौषधीषु पय आसीन्न क्षीरे सर्पिर्न्न माँसे मेदो न त्वचि लोमानि न वनस्पतिषु पलाशानि तद्यत एतदेकषष्टिरात्रं दैवाब्रात्या उपांस्ततोवै तानि तान्येतैर्व्वीर्य्यै समसृज्यन्त - तां.ब्रा.१४.१८.३?

*यदुन्नतं भूम्या अनूषरं यत्र बहुला ओषधयश्चात्वालसारिण्यो यत्राप स्युस्तस्य नु पुर। - षड्विंश ब्राह्मणम् ३.३.११

*यूप स्तुति -  तस्य यन्नैखान्यं तत्पितॄणाम्। यदूर्ध्वं तन्मनुष्याणाम् यत्तदधो रशनाया ओषधिवनस्पतीनाम्। - - - -ष.विं.ब्रा.५.४.१३

*अथ संभरणम् :- चन्द्रमस कलाभ पोषणम्। तमोषधीभ्यश्च वनस्पतिभ्यश्च गोभ्यश्च पशुभ्यश्चादित्याच्च ब्रह्मणश्च ब्राह्मणा संनयन्ते। - ष.वि.ब्रा.५.६.३

*स्वाहा वै सत्यसंभूता - - - - - ओषधिवनस्पतयो लोमानि - ष.विं.ब्रा.५.६.२

*जड वैराग वृक्ष की लावहु। सोंठ सँतोषहि आनि मिलावहु॥ मिरच तितीक्षन करुना चीता। निस्पृह पीपर मिलवहु मीता॥ कोमलता सब सौंज गिलोई। मधुवानी सों लेहु समोई॥ हरर आमरे शुचि अरु दाया। तातें निर्मल ह्वै है काया॥ असगँध आसन दृढ कै करौ। चिंतामनि चिंता परिहरौ॥ मुसलि सौंफ अजवाइन जीरा। ज्ञान ध्यान जप जोग में धीरा॥ सांत मृगांग बिना सुख नाहीं। साँच लौंग मिलवहु ता माहीं॥ भगवत धर्म धातु सब लीजै। नाम सुधा रस की पुट दीजै॥ ये औषधि सब आनि मिलावौ। ग्यान ओखली माहिं कुटावौ॥ हिय हांडी में आनि चढावौ। चेतन वह्नी करि औटावौ॥ निर्मत्सर चपनी ढकि लैयै। श्रद्धा करछी फेरत जैयै॥ हस्त क्रिया जबहीं बनि आवै। जो कबहूं सत्संगति पावै॥ पुनि लै प्रेम चखक में करै। भूमि गरीबी में लै धरै॥ प्रात कृपा बन जल सों पीवै। रोग जाई अरु जुग जुग जीवै॥ - श्री ध्रुवदास – कृत बयालीस लीला में वैद्यक ज्ञान लीला( प्रकाशक : बाबा तुलसीदास, गोपाल भवन, दुसायत, वृन्दावन, वि.सं. २०२८)