पुराण विषय अनुक्रमणिका(ए-अः) Purana Subject Index

ओषधि अग्नि १०० ( द्वार प्रतिष्ठा हेतु प्रयोज्य ओषधि ), १२३.२६ ( तिलक हेतु प्रशस्त औषधियां ), १२५.४३ ( ओषधि धारण से रक्षा का कथन ), १४० ( वशीकरण आदि के हेतु १६ औषधियों के योगों का वर्णन ), १४१( छत्तीस कोष्ठों में विभाजन और गुण ), १४२ ( मन्त्रौषध चक्र का वर्णन ), १४९.१३ (  कोटि होम में प्रयुक्त औषधि योग का कथन ), २२२.७ ( विषहारक ओषधि वर्ग का कथन ), २६५.५ ( स्नान कर्म में प्रयुक्त उद्वर्तन / उबटन निर्माण हेतु ओषधि योग का कथन ), २६५.१४ ( कुम्भ में निक्षेप हेतु ओषधि योग का कथन ), २७९+ ( रोग निवारण हेतु ओषधि वर्णन ), २८३ ( रोग नाश हेतु ओषधि योग का वर्णन ), २८४ ( मन्त्र रूप ओषधि का कथन ), २८५ ( मृत संजीवन कारक सिद्ध ओषधि योग ),  २८६ ( मृत्युञ्जय योगों का वर्णन ), २९७ ( सर्प विष हारक मन्त्र ओषधि योग का वर्णन ), ३०२ ( स्त्री वशीकरण, पुत्र प्राप्ति, केश क्षरण रोध आदि के लिए ओषधि योग ), ३६३.१४ ( फलपाकान्त ओषधि, फल व पुष्प सहित वानस्पत्य तथा बिना पुष्प फलने वाली वनस्पति होने का उल्लेख ), ३६३.१५ ( पर्यायवाची शब्द वर्ग का कथन ), गरुड १.१६९ ( आयुर्वेदानुसार गुण ), १.२०२ ( स्त्रीरोगों में विभिन्न ओषधियों का उपयोग ), गर्ग १.५.९ ( श्री हरि से वर प्राप्ति, वृन्दावन में लता रूपी गोपियां बनना ), देवीभागवत ७.३०.८० ( उत्तर कुरु प्रदेश में स्थित देवी का नाम ), ११.२४.२७ ( ओषधि होम से रोग शान्ति का वर्णन ), नारद १.७४.२२ ( हनुमन्मन्त्र से अभिमन्त्रित ओषध या जल के सेवन से रोग से मुक्ति का उल्लेख ), पद्म १.३.१०७ ( ब्रह्मा के रोमों से फल- मूलिनी ओषधियों के उत्पन्न होने का उल्लेख ), १.३.१४५ ( १७ ग्राम्य व १४ आरण्यक औषधियों के नाम ), १.८.२६ ( गिरियों द्वारा मेरु को दोग्धा व हिमवान को वत्स बनाकर पृथिवी रूपी गौ से रत्न व दिव्य औषधियों के दोहन का उल्लेख ), १.४०.८ ( सुरभि गौ से प्रवर ओषधियों के उत्पन्न होने का उल्लेख ), ६.७.४२ ( जालन्धर - देव युद्ध में बृहस्पति द्वारा द्रोण गिरि से ओषधियां लाकर देवों को जीवित करना , जालन्धर द्वारा द्रोणगिरि को क्षीरसागर में डुबाना ),ब्रह्म १.६६.४२ ( धान्य के समस्त ओषधियों में उत्तम होने का उल्लेख ), २.३.११ ( शिव - पार्वती विवाह में औषधियों द्वारा अन्न कर्म सम्पन्न करना ), २.४९.२ ( औषधियों द्वारा गङ्गा की स्तुति, सोम की पति रूप में प्राप्ति ), २.५०.१ ( धान्य तीर्थ के माहात्म्य के अन्तर्गत ओषधियों व सोम के वार्तालाप का वर्णन ; ओषधियों को गङ्गा में व विप्रों को देने के फल का कथन ), २.७१.१३ ( कपिला सङ्गम तीर्थ के माहात्म्य के संदर्भ में पृथु द्वारा मही / पृथिवी को ओषधी देने के लिए बाध्य करना ), ब्रह्मवैवर्त्त ४.२.७३.८३ ( नारायण के ओषधियों में दूर्वा व तृणों में कुश होने का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड १.२.७.१९ ( ब्रह्मा द्वारा ओषधियों से स्वयं / आत्मन को तथा आत्मन से वृक्ष - वीरुधों को उत्पन्न ? करने का उल्लेख ), १.२.७.१२२ ( त्रेतायुग के आरम्भ में उत्पन्न कल्पवृक्षों के नष्ट होने पर वृष्टि बिन्दुओं के पृथिवी से मिलने पर अकृष्टपच्या १४ ग्राम्य व आरण्यक ओषधियों के उत्पन्न होने का वर्णन ), १.२.७.१३८ ( त्रेतायुग के आरम्भ में १४ ग्राम्य व आरण्यक ओषधियों के नष्ट होने पर ब्रह्मा द्वारा सुमेरु को वत्स बनाकर पृथिवी रूपी गो का दोहन करके १७ ग्राम्य व १४ आरण्यक ओषधियों के बीज प्राप्त करना ), १.२.७.१४२ (ग्राम्य व आरण्यक ओषधियों के नाम ), १.२.७.१५२ ( ओषधियों का पुन: वर्धन न होने पर स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा कृष्टपच्या ओषधियों को हस्तसिद्धि द्वारा उत्पन्न करना ), १.२.९.२ ( त्र्यम्बक रुद्र की निरुक्ति के संदर्भ में ओषधि क्षय होने पर त्र्यम्बक द्वारा तीन कपालों द्वारा ओषधि फल प्राप्त करने ? का उल्लेख ), १.२.१०.६५ ( अमावास्या को ओषधि में सूर्य व चन्द्र के एक साथ आने का उल्लेख ), १.२.१३.१४३ (त्र्यम्बक रुद्र की निरुक्ति के संदर्भ में ओषधि क्षय होने पर त्र्यम्बक द्वारा तीन कपालों द्वारा ओषधि फल प्राप्त करने ? का उल्लेख), १.२.२४.४३ ( सूर्य द्वारा ओषधियों में बल प्रदान करने का उल्लेख ), ३.४.९.५० ( विष्णु द्वारा देवों को ओषधि - प्रवरों को क्षीरसागर में डालकर मन्थन करने का निर्देश ), ३.४.३०.९६ ( शिव द्वारा पार्वती से विवाह के पश्चात् ओषधिप्रस्थ नगर में श्वसुर के गृह में वास ), भविष्य १.५६.२२ ( नवग्रह होम हेतु विशिष्ट औषधियों की समिधाएं ), ४.१६४.१४ ( वसुधा दान से क्षीर संपन्न ओषधियों आदि की प्राप्ति ), भागवत ३.२६.६५ ( ओषधियों द्वारा विराट पुरुष के रोमों द्वारा त्वचा में प्रवेश करने पर भी विराट पुरुष का उत्थान न होने का कथन ), ११.१६.२१ ( विभूति योग के अन्तर्गत कृष्ण के ओषधियों में यव तथा वनस्पतियों में अश्वत्थ होने का उल्लेख ), मत्स्य १०.२६ ( गिरियों द्वारा वसुधा दोहन के संदर्भ में ओषधि आदि के दोहन में मेरु दोग्धा, हिमवान वत्स आदि का उल्लेख ), १३.५० ( पार्वती देवी का उत्तरकुरु में ओषधि नाम से वास का उल्लेख ), १७१.४२ ( सुरभि गौ व ब्रह्मा से प्रवर ओषधियों के समुत्थान का उल्लेख ), २१७.३८+ ( दुर्ग में संग्रहणीय औषधियों के नाम ), २४३.२ ( राजा के गमन पर अयुक्त ओषधियों के दर्शन के अशुभ होने का उल्लेख ), २४३.१८ ( राजा के गमन पर ओषधियों, यवों, सिद्धार्थ आदि के शुभ होने का उल्लेख ), मार्कण्डेय ४९.५८ ( कल्पवृक्षों के नष्ट होने पर वृष्टि से बिना बोए हुए औषधियों का उत्पन्न होना, पृथ्वी द्वारा सर्व औषधियों को ग्रास बना लेने पर पृथ्वी के दोहन से औषधियों की सृष्टि, परवर्ती काल में कृषि द्वारा औषधियों की उत्पत्ति ), लिङ्ग १.५९.४१ ( सूर्य द्वारा ओषधियों में बल रखने का उल्लेख ), १.७०.२३९ ( ब्रह्मा के रोमों से फल मूलिनी ओषधियों की सृष्टि का उल्लेख ), वामन ७५.३४( ओषधियों आदि में महानील निधि की स्थिति का उल्लेख ), ९०.८ ( ओषध पर्वत पर विष्णु का विष्णु नाम से वास ), वायु ८.१४८ ( ग्राम्य व आरण्यक औषधि नाम, पृथ्वी / गौ दोहन से उत्पत्ति ), ९.४५ /१.९.४१ ( ब्रह्मा के रोम से फलमूलिनी ओषधियों की उत्पत्ति का उल्लेख ), विष्णु १.५.५० ( वही),१.६.२१ ( १७ग्राम्य व १४आरण्यक औषधियों के नाम ), विष्णुधर्मोत्तर १.१०७.४७ ( फलपाकान्त तथा बहुपुष्प व फल वाली का ओषधि नाम, अपुष्प फलवान का वनस्पति तथा पुष्प व फलों से युक्त वृक्षों का उभयगुणी होना ), १.१०९.४३ ( शैलों द्वारा शिलामय पात्र में हिमवान को वत्स बनाकर वसुधा के दोहन का उल्लेख ), १.२४९.४ ( पितामह द्वारा सोम को ओषधियों, द्विजातियों आदि के राज्य पर अभिषिक्त करने का उल्लेख ), २.२७ ( विष निवारक औषधियों के नाम ), २..४२.२१ ( गौ को ओषध देने से विरोगी होने, विपत्ति, पातक, बन्धन आदि से मुक्ति का उल्लेख ), २.५६ ( रोग निवारक ओषधि - योग का वर्णन ), २.१२५.७४ ( कृषि कर्मों में ओषधी: प्रतिमोदध्वं इत्यादि मन्त्र के जपने से सिद्धि प्राप्त होने का कथन ), २.१२५.७६ ( ओषधी इति मातर: मन्त्र जप के साथ अपामार्ग, यव, धान्य होम से गोकाम, अश्व काम होने का उल्लेख ), २.१२५.७७ ( ओषधी: समजन्तेति मन्त्र से आज्य होम करने से यातुधान भय से मुक्ति का उल्लेख, अन्य मन्त्र भी ), ३.११९.८ (  ओषधि कर्मारम्भ में कूर्म की पूजा का उल्लेख ), ३.२५२.२७ ( ओषधियों, पशुओं आदि के यज्ञार्थ निधन को प्राप्त होने पर उनके पुन: प्ररोहण का उल्लेख ), ३.२६२..२ ( पशुओं, ओषधियों, पुरुषों की स्वयंभू द्वारा यज्ञार्थ सृष्टि करने का उल्लेख ), ३.३२१.१३ ( ओषधि दान से नासत्य लोक की प्राप्ति ), स्कन्द २.९.१०.३७ (( विष्णु द्वारा देवों को सभी ओषधियां समुद्र में डालकर समुद्र मन्थन करने का निर्देश ), ३.१.३६.८४ ( भाद्रपद कृष्ण दशमी को महालय श्राद्ध कर ओषधि - पति चन्द्रमा को व्रीहि आदि ओषधि देने का निर्देश ; ऐसा न करने पर उसकी ओषधियां तथा कृषि निष्फल होने का उल्लेख ), ४.१.१४.२३(सोम के पतित तेज से ओषधियों की उत्पत्ति), ४.१.२४.१५ ( कुष्ठ ओषधि होते हुए भी मनुष्यों में कुष्ठ रोग होने का उल्लेख , ५.१.२८.७२ ( सोम के पतित तेज से ओषधियों के जन्म का कथन ), ५.१.५२.४३ ( वराह विष्णु के तनु के बीज - ओषधि वाले होने का उल्लेख ), ५.३.१५५.१२ ( सब ओषधियों में अनशन? की प्रधानता का उल्लेख ), ५.३.१९८.८७ ( उत्तरकुरु देश में उमा की ओषधी नाम से स्थिति का उल्लेख ), ६.१.४६ ( सस्य के ओषधियों का अधिपति होने का उल्लेख ), ६.६३.५ ( ओषधियों के पति चन्द्रमा के भी क्षय रोग से पीडित होने के कारण का वर्णन करते हुए दक्ष - कन्याओं की कथा ), ७.१.२०.६० ( सोम के पृथ्वी पर पतित तेज से औषधियों की उत्पत्ति की कथा ; ओषधियों के फलपाक से उत्पन्न १७ कणों के नाम; ७ ग्राम्य व ७ आरण्यक ओषधियों के नाम ), हरिवंश १.६.४०( शैलों द्वारा पृथिवी से शैलपात्र में ओषधि व रत्न रूपी दुग्ध का दोहन ), १.२५.१६ ( ब्रह्मा द्वारा पृथिवी पर पतित सोम को रथ में धारण कर पृथिवी की २१ परिक्रमाएं करना , परिक्रमा के कारण सोम के पतित तेज से ओषधियों की उत्पत्ति ), वा.रामायण २.२५.३८ ( राम के वन गमन के समय कौसल्या द्वारा विशल्यकरणी ओषधि को राम की रक्षा के लिए हाथ पर बांधना ), २.९४.२१ ( राम द्वारा सीता को चित्रकूट पर्वत पर उत्पन्न स्वप्रभालक्ष्मी वाली भ्राजमान ओषधियों को दिखाना ), ४.३७.३१ ( वानरों द्वारा पूर्वकाल में शिव के यज्ञस्थल पर उत्पन्न दिव्य ओषधियों को ग्रहण करके सुग्रीव को भेंट करना ), ६.५०.३० ( मूर्च्छित लक्ष्मण के लिए द्रोण व चन्द्र पर्वत से विशल्यकरणी आदि ओषधियां लाने का उद्योग, गरुड के आगमन से पाश रूपी नागों का पलायन तथा राम - लक्ष्मण के व्रणों का भरना आदि ), ६.१०१.३१ ( मूर्च्छित लक्ष्मण के लिए महोदय पर्वत से विशल्यकरणी व संजीवकरणी ओषधि लाने का उद्योग, हनुमान द्वारा पर्वत शिखर को ही ले आना ), लक्ष्मीनारायण १.४५.२४ ( विभिन्न अमृतकलाओं वाली औषधियों की प्रार्थना पर ब्रह्मा द्वारा चन्द्रमा को १६ कलाओं वाले बनाना ), १.४७.६४ ( पृथ्वी से औषधियों के नष्ट होने पर पृथ्वी के दोहन व कृषि द्वारा औषधियां प्राप्त करने का वृत्तान्त ), कथासरित् ८.३.१८८(प्रभास द्वारा सूर्यप्रभ हेतु चन्द्रपाद गिरि से ओषधियां ग्रहण करने का वृत्तान्त), १०.८.१४ ( ओषध मूर्ख की कथा : बस्ति कर्म में प्रयोज्य ओषधि का मुख से सेवन करना ) महाभारत आदि २२६.३३ ( खाण्डव दाह के संदर्भ में अर्जुन व देवताओं के युद्ध में अश्विनौ द्वारा दीप्यमान ओषधियों को शस्त्र के रूप में ग्रहण करने का उल्लेख ), वन ३.८ ( स्वयोनि में स्थित सूर्य के चन्द्रमा के तेज से अभिषिक्त होने पर ६ रसों से युक्त ओषधियों के उत्पन्न होने का उल्लेख ), ६१.२९ ( नल - दमयन्ती आख्यान के संदर्भ में सब दुःखों में भार्या के अप्रतिम ओषध होने का उल्लेख ), भीष्म ८१.११ ( भीष्म द्वारा प्रदत्त विशल्यकरणी ओषधि से दुर्योधन के शल्यरहित होने का उल्लेख ), कर्ण ३४.२६ ( शिव के रथ में ओषधियों व वीरुधों के घण्टा बनने का उल्लेख ), शल्य ३५.६४ ( दक्ष के शाप से चन्द्रमा के यक्ष्मा - ग्रस्त हो जाने पर ओषधि, वीरुध आदि का भी क्षय हो जाने का कथन ), सौप्तिक १७.२५ ( शिव द्वारा तप से प्राप्त अन्न का ओषधियों द्वारा परिवर्तन करने का उल्लेख ), ११३.११( वायु और जल के वेग से नमित हो जाने वाली ओषधियों आदि का पराभव न होने का कथन ), १२२.४५ ( ब्रह्म - पुत्र व्यवसाय, व्यवसाय - पुत्र तेज, तेज से ओषधियों , ओषधियों से पर्वत आदि आदि द्वारा उत्पन्न होकर लोकरक्षा हेतु जाग्रत रहने का कथन ),शान्ति २०६.५ ( एकरसा भूमि में बीज अनुसार ओषधि रस उत्पन्न होने के समान अन्तरात्मा में कर्मानुगा बुद्धि की स्थिति का कथन ), २६३.३३ ( जाजलि - तुलाधार आख्यान में योग द्वारा गौ /पृथ्वी को स्वाभाविक रूप में प्राप्त कर लेने पर ही ओषधियों से यज्ञ होना संभव होने का उल्लेख ), २६८.२५ ( यज्ञ के १२ अङ्गों की गणना में ओषधि अङ्ग का उल्लेख ), अनुशासन ९८.२३( ओषधियों के उग्रा, सौम्या आदि प्रकार ), ९८.३० ( अथर्ववेद के अनुसार शत्रु अभिचार, भूत - प्रिय, मनुष्य - प्रिय आदि ओषधियों के लक्षणों का कथन ), आश्वमेधिक ४४.९ ( ओषधियों में यव के श्रेष्ठ होने का उल्लेख ), सुश्रुत संहिता चिकित्सा ३०.९(विभिन्न दिव्य ओषधियों का स्वरूप),  Oshadhi

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ओष्ठ देवीभागवत ५.८.६९( देवी के अधर व उत्तरोष्ठों की क्रमश: अरुण व कार्तिकेय के तेजों से उत्पत्ति का उल्लेख ), ब्रह्मवैवर्त्त ३.४.३५ ( सौम्य ओष्ठ - द्वय प्राप्ति के लिए लक्ष बन्धूक पुष्प दान का निर्देश ), ३.४.३८( ओष्ठ रूप हेतु रत्नपाश दान का निर्देश ), भागवत ३.१२.२६( ब्रह्मा के अधरोष्ठ से लोभ की उत्पत्ति का उल्लेख ),महाभारत शान्ति ३४७.५२(हयग्रीव के ओष्ठों के रूप में गोलोक व ब्रह्मलोक का उल्लेख), मत्स्य २४८.७३(यज्ञवराह के उपाकर्मोष्ठ रुचक होने का उल्लेख), स्कन्द १.२.६२.३२( लम्बोष्ठ : क्षेत्रपालों के ६४ प्रकारों में से एक ), ५.३.३९.२८ ( कपिला गौ के ओष्ठों में धाता - विधाता की स्थिति का उल्लेख ), ५.३.१९३.२७ (अप्सराओं द्वारा नारायण के ओष्ठों में समस्त क्रतुओं के दर्शन करने का उल्लेख ), हरिवंश २.८०.२१ (ओष्ठों को सुन्दर करने की विधि का कथन ), ३.७१.५५ ( वामन के विराट रूप में ओष्ठों में मखों के स्थित होने का उल्लेख )  Oshtha

 

औ अग्नि ३४८.३ ( महेश्वर हेतु औ का प्रयोग )

 

औदुम्बरी स्कन्द २.४.९.३९ ( औदुम्बर : यम के १४ नामों में से एक ), ६.१८८.८ (औदुम्बरी : छन्दोग ब्राह्मण देवशर्मा व सत्यभामा - पुत्री, ब्रह्मा के यज्ञ में आगमन, उद्गाता से संवाद, मोक्ष, पूर्व जन्म में पर्वत ऋषि की पुत्री ), द्र. उदुम्बर Audumbaree, Oudumbaree

 

और्व गरुड ३.१८.२९, ५६(और्व शब्द की निरुक्ति : सद को उर्वरित करने वाला), ३.१८.७०(सती के हिमाद्रि व मेनका-पुत्री बनने पर रुद्र द्वारा और्व संज्ञा प्राप्ति का कथन), नारद १.७+ ( और्व द्वारा बाहु राजा की गर्भवती पत्नी की रक्षा व सगर के पालन की कथा ), पद्म १.८.१४५ ( सगर की भार्याओं प्रभा व भानुमती द्वारा पुत्र प्राप्ति हेतु और्व अग्नि की उपासना, षष्टि सहस्र व एक पुत्र प्राप्ति का वर प्राप्त करना ), १.४१.६६ ( देवासुर सङ्ग्राम में मय द्वारा शक्र के विरुद्ध और्वी माया का प्रयोग, ऊर्व ऋषि द्वारा वंश वृद्धि हेतु और्व पुत्र उत्पन करने व और्व के बडवानल मुख में स्थित होने का वृत्तान्त ; हिरण्यकशिपु द्वारा और्वी माया की प्राप्ति ), ६.२०.११ ( सुबाहु राजा का शत्रुओं से पराजित होकर भार्गव आश्रम में शरण लेना, और्व / भार्गव द्वारा सुबाहु - पुत्र सगर का पालन आदि ), ब्रह्मवैवर्त्त ४.२४.४+ ( और्व मुनि की जानु से कन्दली कन्या की उत्पत्ति, और्व द्वारा कन्या का दुर्वासा से विवाह, दुर्वासा द्वारा कटुभाषिणी कन्दली को भस्म करने पर और्व द्वारा दुर्वासा को पराभव का शाप ), ब्रह्माण्ड २.३.१.९५( अप्रवान व ऋची - पुत्र, माता की ऊरु का भेदन करके उत्पन्न होने का उल्लेख ), २.३.४७.८३ ( और्व द्वारा बाहु राजा की गर्भवती पत्नी की रक्षा व सगर के पालन का प्रसंग ), २.३.५०.२९+ ( सगर द्वारा और्व की कृपा से पुत्रों की प्राप्ति का वृत्तान्त ), २.३.६३.१२२ ( और्व द्वारा बाहु नृप की भार्या की रक्षा व और्व का पालन ), भविष्य ३.४.१२.५९ ( ब्राह्मणी की ऊरु से उत्पन्न तेज का नाम, तेज का क्षत्रशर्मा रूप में अवतरण ), भागवत ९.८.३ ( और्व द्वारा बाहु राजा की पत्नियों की रक्षा, सगर का पालन ), ९.८.३१ ( सगर द्वारा और्व के उपदिष्ट मार्ग से उत्तम गति प्राप्त करना ), मत्स्य १७५.५० ( ऊर्व ऋषि द्वारा वंश वृद्धि हेतु और्व पुत्र को उत्पन्न करने का वर्णन, और्व द्वारा भोजन हेतु समुद्र में बडवा अग्नि के मुख में स्थित होना, और्व द्वारा सृष्ट और्वी माया की हिरण्यकशिपु द्वारा प्राप्ति ), मार्कण्डेय १२९.२१+ ( और्वाश्रम में सर्पों के उपद्रव पर मरुत्त राजा द्वारा संवर्तक अस्त्र से नागों को त्रस्त करना, मरुत्त - माता द्वारा सर्पों की रक्षा का उद्योग ), वराह १४७.५( शिव द्वारा और्व आश्रम को जलाना, शाप प्राप्ति, सुरभि दुग्ध से शान्ति ), वायु ६५.९२/ २.४.९२( आत्मवान् - पत्नी रुचि की ऊरु से और्व की उत्पत्ति, ऋचीक - पिता ), विष्णु ३.८.३( और्व द्वारा सगर को विष्णु आराधना विधि का वर्णन ), ४.३.२९( और्व द्वारा मृत राजा बाहु की भार्याओं की रक्षा व सगर के पालन का वर्णन ), शिव ४.२९.१२ ( पृथिवी पर प्राणियों की रक्षा हेतु और्व द्वारा राक्षसों को पृथिवी पर शाप का कथन, राक्षसों का जल में जाना ), स्कन्द ५.३.८५.१४ ( और्व सङ्गम पर रेवा की दुर्लभता का उल्लेख ), हरिवंश १.१३.३२+ ( और्व ऋषि द्वारा बाहु - पुत्र सगर के पालन की कथा ), १.२७.४१ ( ऋचीक का दूसरा नाम ), १.४५ ( अग्नि, ऊर्व मुनि के तप  से उत्पत्ति, हिरण्यकशिपु द्वारा प्राप्ति ), लक्ष्मीनारायण १.४७४+ ( और्व - कन्या कन्दली को भस्म करने पर और्व द्वारा दुर्वासा को अम्बरीष राजा से पराभव प्राप्त करने का शाप ), १.४७५.९( और्व की निरुक्ति : ऊर्ध्वरेता ) Aurva, Ourva

 

अं अग्नि ३४८.४ ( काम हेतु अं का प्रयोग )

 

अ: अग्नि ३४८.४ ( प्रशस्तता हेतु अ: का प्रयोग )