पुराण विषय अनुक्रमणिका(ए-अः) Purana Subject Index

OJA

As is evident from the lengthy list of quotations from vedic texts, OJA is one of the most frequently used, but least understood words of vedic texts. In Aayurveda, it is understood that oja is one type of essence produced from the gradual digestion of food in our body. In common parlance, it is thought that oja is some brightness on face. This site tries to investigate the real meaning of oja on the basis of sacred puraanic and vedic texts. Dr. Fatah Singh suggests that oja is born out of O, omkara. Omkara has three components – a, connected with compensation of loss, u – connected with preservation and m- connected with loss. It seems that oja is the third component of Omkara – loss. The earlier state of Omkara is O, the great resonance and one can expect that some energy will be constantly lost from this resonance.

  Vedic texts  quote some synonyms for brightness, tejas, like teja, oja, bala, nrimna etc. and it becomes difficult to differentiate between these terms. Vedic texts indicates that these states are born out of churning of  holy water.  First state tejas is related with brahmin, the second oja with a warrior, the third payah with a vaishya or businessman and the fourth  aapah with a mean caste or shuudra. Oja has been solely devoted to the vedic qualities of a warrior and therefore one can expect that wherever fighting with enemy is involved, oja is required. It is an open question whether the fighting with so many foreign bodies in our body also involves oja in some way. There is one statement in Bhagvad Gita where Krishna says that it is he who enters the earth to preserve all the beings by his oja. Those waters which are not in a position to flow, have to be made to flow with the help of oja.

 There are some universal vedic statements where oja has been stated to be present in thigh in the body. This seems to be a symbolic statement in the sense that thigh or uuru represents a vast state of consciousness while it’s opposite puuru/confined in space represents the mortal state.

  There are few mantras which indicate that our senses can be catalyzed by oja to open inward. There are two types of oja – one of slave and the other of gods. One has to annihilate oja of slave. Word oja has been interpreted on the basis of root straightness and  we are now familiar with the importance of terms straightness and curvature in modern sciences. This whole universe has been stated to be based on curvature and nothing is straight. Thus it becomes important how straightness is to be achieved in the realm of consciousness.

 

ओज

टिप्पणी : इन्द्र कहलाने वाले जीवात्मा को शुद्ध प्राण या जल पांच प्रकार की शक्तियों के रूप में प्राप्त होते हैं । हिरण्यय कोश में ओज जिससे वाणी ओजस्वी बनती है । विज्ञानमय कोश में सह जो नीचे के कोशों में उतरने पर संगठन के लिए प्रवृत्त करती है ; मनोमय कोश में बल जिसे मनोबल कहते हैं ;प्राणमय कोश में वीर्य, अन्नमय कोश में नृम्ण । अथवा ओज की परिभाषा ऐसे कर सकते हैं कि ओ से जन्मा हुआ तत्त्व ओज है । ओ = अ + उ । अ - स्थूल शरीर, उ - सूक्ष्म शरीर । सूक्ष्म शरीर की शक्तियों के विकास से स्थूल शरीर को जो प्राप्ति होती है, वह ओज है । - फतहसिंह

  मनुष्य देह की तुलना एक पुष्प या फल देने वाले पादप से की जा सकती है जिसमें मुख पुष्प या फल का रूप होता है । पादप पुष्प का विकास करने में अपनी सारी शक्ति लगा देता है । फिर कुछ समय पश्चात् वह पुष्प मूर्च्छित होकर नष्ट हो जाता है । मनुष्य व्यक्तित्व ऐसा है कि इसमें मुख रूपी पुष्प को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता है । योगी पुरुषों के मुख पर एक आभा मण्डल का विकास हो जाता है जिसे सामान्यतः तेज कहते हैं । यह विकास अनायास ही हो जाता है । जब शरीर में उदान प्राण प्रबल हो जाता है तो वह देह के शुक्र को संभवतः सुषुम्ना नाडी के माध्यम से ऊपर की ओर फेंकता है और वह मुख आदि पर आभा मण्डल के रूप में विकसित हो जाता है । लोक  में इसका इतना ही ज्ञान है । लेकिन वैदिक साहित्य इस घटना का भली भांति विश्लेषण करता है और इस घटना से उत्पन्न परिणामों से भी अवगत कराता है । कहा जा सकता है कि यदि आभामण्डल विकसित हो ही गया तो उससे क्या हो जाएगा ? आधुनिक चिकित्सा शास्त्र जहां तक पहुंच पाया है, उसके अनुसार भी शरीर से शुक्र धातु के क्षरण का बुद्धिमत्ता पर तो कोई प्रभाव नहीं पडता । लेकिन अभी हमारे सामने सार्वत्रिक रूप से जो कुपरिणाम दिखाई पडते हैं, उनमें केशों का श्वेत होना, केशों का झडना, वृद्धावस्था में मस्तिष्क के सिकुडने के कारण स्मृति का नाश आदि प्रत्यक्ष हैं । लेकिन इन तथ्यों के विरुद्ध भी तर्क उपलब्ध हैं । भारत में ऐसे प्रदेश विशेष भी हैं जिनमें मनुष्यों के केश वृद्धावस्था तक सुरक्षित रहते हैं । अतः वैदिक साहित्य इस आभामण्डल के जो लाभ दर्शाता है, वह लौकिक लाभों से ऊपर होते होंगे ।

  सामान्य रूप से जो मुख का तेज या आभामण्डल माना जाता है, उसे वैदिक साहित्य में चार भागों में बांटा गया है ( तैत्तिरीय ब्राह्मण २.७.७.७ आदि ) । एक तो आपः के द्रवण से उत्पन्न रस से तेज का प्रादुर्भाव होता है । इसे ब्रह्मवर्चस नाम दिया गया है । दूसरे, आपः में उत्पन्न ऊर्मियों के, तरङ्गों के कारण जिस रस का विकास होता है, उससे ओज का प्रादुर्भाव होता है जो वर्तमान टिप्पणी का विवेचनीय विषय है । तीसरे, आपः में मधु/मध्य(? ) के कारण जिस रस का विकास होता है, उसका नाम नहीं दिया गया है । उससे पुष्टि प्राप्त होती है । चौथे, आपः का जो यज्ञिय रस है, उससे आयु की वृद्धि होती है । इन रसों की पूर्वावस्था को मन्थ भी कहा जाता है । बौधायन श्रौत सूत्र १.८.९ में यह रस क्रमशः मधु, सुरा, पयः ( क्षीर या दुग्ध ) व आपः/  जल कहे गए हैं । मधु के स्थान पर आज्य का भी उल्लेख आता है ।

  ओज को समझने की पहली कुञ्जी हमें डा. फतहसिंह के इस सुझाव से प्राप्त होती है कि ओ (अ + उ) से जन्मा हुआ ओज है । वैदिक साहित्य कईं प्रकार से इस तथ्य की पुष्टि करता है । सोमयागों में प्रातःसवन में बहिष्पवमान नामक स्तोत्र का गान किया जाता है । यह स्तोत्र प्रायःगायत्री छन्द में होता है । सामवेद में गायन के लिए तृचों का प्रयोग होता है । तृच अर्थात् ऋग्वेद की तीन ऋचाओं से मिलकर बना हुआ । बहिष्पवमान स्तोत्र में तृच की ऋचाओं को पूरा नहीं गाया जाता, अपितु गायत्री छन्द में निबद्ध ऋचा के तीन पदों में से केवल प्रथम पद को ही गाया जाता है । शेष पदों की पूर्त्ति ओ आदि का दीर्घकालिक उच्चारण करके की जाती है । उदाहरण के लिए, ऋचा "पवमानस्य ते कवे वाजिन्त्सर्गा असृक्षत । अर्वन्तो न श्रवस्यव:" का उच्चारण इस प्रकार किया जाता है ( श्रौत कोश, खण्ड २, पृष्ठ २८० ) : पवमानस्यतेकवोम्। ओमोओओओओ ओओओ२ ओओओओओओ१२१२ । हुम् आ२ । ओओ। आ३४५ ।। ऐसा अनुमान है कि साधक गान करते समय आश्चर्य चकित हो जाता है और पूरी ऋचा का गान करने में अपने आपको असमर्थ पाता है । वह आश्चर्य में केवल ओ का उच्चारण ही कर पाता है , जैसे लोक में आश्चर्य से ओहो करते  हैं ।

  उपनिषदों में ओंकार को तीन अक्षरों से बना हुआ कहा गया है - अ, उ तथा म । अ से पूरण किया जाता है, उ से धारण और म से विसर्जन । यह पूरण, धारण, विसर्जन किस वस्तु का किया जाता है, यह अपने - अपने साधना के स्तर पर निर्भर करता है । आरम्भिक रूप में श्वास द्वारा प्राणों का पूरण आदि किया जाता है । ब्राह्मण और श्रौत ग्रन्थों से प्रतीत होता है कि ओंकार का निरूपण ओदन / भात पकाने के द्वारा किया गया है । ओदन को ओदान मान सकते हैं - ओ का दान ) । ओ द्वारा इतनी शक्ति का संचय हो जाए कि उसका दूसरों को दान कर दिया जाए तो भी कोई अन्तर नहीं पडता । आधुनिक विज्ञान में ओ का निरूपण अनुनाद, रेजोनेन्स द्वारा किया जा सकता है । यह अनुनाद ध्वनि की तरङ्गों में हो सकता है, वैद्युतचुम्बकीय तरङ्गों में हो सकता है, आवेश धारण करने वाले सूक्ष्म कणों इलेक्ट्रान आदि में हो सकता है अथवा अन्य किसी प्रकार से । अनुनाद में शक्ति का संचय कितना अधिक होता है, यह विज्ञान में सर्वविदित है । लेकिन अभी तक आधुनिक विज्ञान में अनुनाद द्वारा प्राप्त इस शक्ति को धारण करने की किसी सम्यक् विधि का विकास नहीं हो पाया है । अनुनादित अवस्था से शक्ति का सतत् रूप से क्षय होता रहता है जिसकी क्षतिपूर्त्ति करते रहना पडता है । यह कहा जा सकता कि जड पदार्थों से व्यवहार करने वाले आधुनिक विज्ञान के माध्यम से हमने जो अनुभव प्राप्त किया है, उसका उपयोग चेतना के विज्ञान को समझने के लिए भी किया जा सकता है ।। अनुनादित अवस्था में शक्ति के क्षय को ओज कहा जा सकता है । यह ओंकार के म अक्षर का, विसर्जन का एक भाग है । तैत्तिरीय ब्राह्मण २.७.७.२, बौधायन श्रौत सूत्र १८.९ व १० आदि में ओदन सव के अन्तर्गत मन्थ के मन्थन से तेज, ओज, पुष्टि या पयः तथा आपः प्राप्ति का वर्णन है । मन्थ ओदन सव का ही एक भाग है जो चन्द्रमा से सम्बन्धित है । मन्थ की निरुक्ति का प्रयास इस प्रकार कर सकते हैं कि जो मन को स्थिरता प्रदान करे, वह मन्थ है । इस मन्थ के मन्थन से तेज, ओज, पयः और आपः प्राप्त होते हैं जिन्हें क्रमशःब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र प्राप्त करते हैं । साथ ही, इन्हें क्रमशः हिरण्मय, राजत, अयस्मय, और मृन्मय पात्रों में ग्रहण किया जाता है । यह आवश्यक नहीं है कि ओज का उपयोग केवल क्षत्रिय तक ही सीमित हो । चाहें तो ओज का प्रयोग ब्रह्मत्व की पुष्टि के लिए किया जा सकता है ( तैत्तिरीय संहिता ३.३.१.१ ), अथवा इसके द्वारा वैश्य भाग की पुष्टि की जा सकती है ( आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १४.६.८, १७.१७.१ ) । कर्मकाण्ड में ब्रह्म, क्षत्र व वैश्य के प्रतीक क्रमशः त्रिवृत्~, पञ्चदश व सप्तदश स्तोम होते हैं । क्षत्र की स्थिति पञ्चदश स्तोम पर होती है । स्तोम का स्थूल अर्थ स्तुति होता है ।। समुचित अर्थ अभी स्पष्ट नहीं है । पञ्चदश स्तोम के विषय में कहा गया है कि यह अर्धमास की १५ रात्रियों का प्रतीक है । चूंकि अर्धमास चन्द्रमा से सम्बन्धित होता है, अतः पञ्चदश स्तोम चन्द्रमा की १५ कलाओं से सम्बन्धित होना चाहिए । और इसमें भी चन्द्रमा का एक शुक्ल पक्ष है, एक कृष्ण पक्ष । अतः कुल ३० कलाएं हुईं । हमें यह आशा करनी चाहिए कि यदि वैदिक साहित्य में ओज को सार्वत्रिक रूप से पञ्चदश स्तोम से सम्बन्धित किया गया है तो उसका कोई गहन निहितार्थ होगा ।

  योगवासिष्ठ में ओज की अनुपस्थिति में चित्तवृत्तियों के बहिर्मुखी हो जाने का उल्लेख है । भगवद्गीता १५.१३ का कथन है कि गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । अर्थात् विष्णु गायों में  प्रवेश करके ओज के द्वारा भूतों को धारण करते हैं । इस कथन की एक व्याख्या ऐसे की जा सकती है कि चन्द्रमा आकाश में जितना अपूर्ण दिखाई देता है, उसका वह अपूर्ण अंश उस दिन पृथिवी पर ओषधियों आदि की पुष्टि करता है । पृथिवी को भी गौ कहा जाता है , अतः गौ रूपी पृथिवी चन्द्रमा के विभिन्न अंशों को प्रतिदिन ग्रहण करती है और उससे भूतों का पालन करती है । हो सकता है कि पृथिवी पर ओषधियां अपने जिन फलों को उत्पन्न करती हैं, उसे पृथिवी का अथवा ओषधियों का ओज कहा जा सकता हो क्योंकि पृथिवी इसी अन्न द्वारा भूतों को धारण करती है । सूर्य की किरणों को भी गो कहा जाता है । लोक में तो गौ अपने पयः के द्वारा वत्स का पालन करती है । इस पयः में ही ओज छिपा है जिसको प्रत्यक्ष करना है ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.७.६.१२) । चेतना के स्तर पर यह ओज क्या होगा जिसके द्वारा भूतों को धारण किया जा सकता है ? ऐसा कहा जा सकता  है कि योगी में गौ रूपी किरणों का जन्म ओज के कारण, ओ की स्थिति के क्षय के कारण होता है और इन गायों रूपी किरणों के कारण जैसे सूर्य सारे संसार का पालन करता है, वैसे ही सूर्य स्थिति को प्राप्त योगी समस्त भूतों को धारण शक्ति प्रदान कर सकता है । गौ का एक अन्य अर्थ इन्द्रियां होता है । इन्द्रियां, जैसे चक्षु, अपना प्रवेश करके भूतों को धारण करते हैं । गौ रूपी इन्द्रियों को अपना कार्य करने के लिए प्रकाश, ध्वनि, विद्युत आदि शक्तियों की आवश्यकता पडती है । यह शक्तियां जैसी होंगी, उसी कार्य का ज्ञान भूतों के बारे में देंगी । हमें दूसरे भूतों का ज्ञान इसलिए है कि हमारी इन्द्रियां उनका ज्ञान हमें कराती हैं । यदि हमारे चक्षु आधुनिक विज्ञान की भांति एक्स किरणों को देखने लगें तो यह भूतों का आन्तरिक ज्ञान भी प्रदान करने लगेंगे । इन्द्रियों के कार्य करने के लिए अपेक्षित इस शक्ति को ओज कहा जा सकता है । योगीजन संभवतः तृतीय नेत्र से प्राप्त प्रकाश से अपने चक्षुओं को प्रकाशित कर उससे भूतों का ज्ञान प्राप्त करते हैं । अन्य इन्द्रियों को आन्तरिक रूप से संवेदन किस प्रकार प्राप्त होता है, यह अज्ञात है । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१०.३.१ में तप द्वारा ज्योति को अनिभृष्ट ओज में रूपान्तरित करने का उल्लेख है । गवामयन आदि यज्ञों के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों का कहना है कि ज्योति गौ के लिए वृषभ का कार्य करती है जिससे आयु का जन्म होता है । ऋग्वेद १.७.८ व अथर्ववेद २०.७०.१४ में ईशान इन्द्र द्वारा ओज से कृष्टि को प्रेरित करने का उल्लेख है । अन्य स्थानों जैसे ऋग्वेद १.१६०.५, ६.४६.७, ८.६२.२, ८.७५.१०, तैत्तिरीय संहिता २.६.११.१ में भी ओज के संदर्भ में कृष्टि का उल्लेख है । यद्यपि निघण्टु में कृष्टि शब्द मनुष्य नामों के अन्तर्गत परिगणित है, लेकिन डा. फतहसिंह कृष्टि की व्याख्या कर्षण - योग्य इन्द्रियों के रूप में करते हैं । अथर्ववेद ७.९५.१ आदि में इन्द्र से प्रार्थना की गई है कि वह दास के ओज का दम्भन कर दे । तैत्तिरीय संहिता १.२.१०.२ में यज्ञार्थ लाए गए अतिथि सोम को देवों का ओज कहा गया है । ऋग्वेद ३.५१.१० में विश्वामित्र इन्द्र से प्रार्थना करते हैं कि जिस सोम का सोतन ओज के अनु, ओज के द्वारा किया गया है, हे इन्द्र, तुम उसे पिओ । इन कथनों से संकेत मिलता है कि हमारी इन्द्रियां जिस ओज को प्राप्त करके कार्य कर रही हैं, वह दास का ओज है । देवों का ओज सोम है जिसका यज्ञार्थ आगे भी शोधन किया जा सकता है । क्या इसका निहितार्थ यह हो सकता है कि हमारी इन्द्रियां अभी जिस ओज को प्राप्त कर रही हैं, वह सौर्य है जबकि अपेक्षा चान्द्र ओज की है ?

पुराणों में ओजस्वती नदी को इडा का रूप कहा गया है । इडा भी चन्द्रमा से सम्बन्धित है । शांखायन श्रौत सूत्र ७.५.१३ में यज्ञ में ३ सवनों में इडा के तीन रूपों तेज, ओज व पुष्टि का क्रमशः भक्षण किया जाता है । ताण्ड्य ब्राह्मण ६.१०.१६ व ६.१०.१८, अथर्ववेद २०.१३८.१, तैत्तिरीय संहिता २.४.९.१ में ओज द्वारा वृष्टि के च्यावयन का उल्लेख है । यदि ओज स्वयं रस है, सोम है, तो फिर ओज द्वारा सोम रूपी, पर्जन्य रूपी वृष्टि के च्यावयन का क्या तात्पर्य है ? हो सकता है कि ऋग्वेद ९.५.३, ९.२९.१, ९.६५.१४, ९.१०६.७ में ओज के द्वारा जिस मधु धारा , सोम की धारा प्राप्त करने की बात कही गई है, वह पुराणों में ओजस्वती नदी से साम्य रखती हो ।

  भागवत पुराण में मरुतों से ओज प्रदान की प्रार्थना का उल्लेख है । यह एक ऐसा विषय है जो व्यावहारिक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण है लेकिन जिसका वैदिक साहित्य में प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, केवल परोक्ष रूप मिलता है । ऋग्वेद १.८५.१० में मरुद्गण गोतम ऋषि के लिए जल की प्राप्ति ओज द्वारा सुगम बना देते हैं । ऋग्वेद ३.२६.६ में अग्नि के भाम: /क्रोध तथा मरुतों के ओज का उल्लेख है । ऋग्वेद ३.४७.३ में मरुद्गण इन्द्र के लिए ओज का भरण करते हैं । ऋग्वेद ५.५९.७ में मरुद्गण ओज की सहायता से पक्षियों की भांति उडते हैं । ऋग्वेद ७.५६.६ व ७ में मरुतों के उग्र ओज का उल्लेख है । तैत्तिरीय संहिता १.८.११.१ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण १.७.५.२ में राजसूय में अभिषेक हेतु जल ग्रहण करते समय उसे मरुतों का ओज कहा गया है । तैत्तिरीय संहिता १.८.१५.२ में राजसूय में  रथ द्वारा विजय के संदर्भ में इन्द्र के बल व मरुतों के ओज का उल्लेख है । तैत्तिरीय संहिता २.३.१.५ में अश्वत्थ को मरुतों का ओज कहा गया है । मरुत ७ गणों में विभक्त विशः हैं । शतपथ ब्राह्मण ४.३.३.८ में इन्द्र मरुतों के ओज की सहायता से वृत्र का वध करता है । ओज मुख्य रूप से क्षत्रिय के लिए होता है जिसके द्वारा वह शत्रु का वध करता है । आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १४.६.८ व १७.१७.१ आदि में इसका विवेचन है कि यदि ओज को विशः या वैश्य प्राप्त करते हैं तो उसका क्या प्रभाव होगा । इन्द्र को ऋग्वेद में सार्वत्रिक रूप से ओजिष्ट ओजस्पति कहा गया है । फिर भी वृत्र वध के लिए उसे मर्त्य स्तर के मरुतों के ओज की आवश्यकता क्यों पडती है, यह एक विचारणीय प्रश्न है ।

   में विष्णु की ऊरुओं में ओज होने का उल्लेख है । ऋग्वेद ५.५७.६ व ८.९६.३ आदि में बाहुओं में ओज होने का उल्लेख आता है जो अधिक उपयुक्त लगता है क्योंकि ओज क्षत्र से सम्बन्धित है । लेकिन दूसरी ओर, अथर्ववेद १९.६०.२, तैत्तिरीय संहिता ५.५.९.२ व तैत्तिरीय आरण्यक १०.७२.१ में ऊरुओं में ओज होने का उल्लेख है । लगता है कि ऊरु शब्द प्रतीकात्मक है और ऋग्वेद १०.१८०.३ उरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम् के आधार पर ऐसा मान सकते हैं कि ऊरु अमर्त्य स्तर का प्रतीक है । ऋग्वेद १.५३.७, १.१०३.३, ८.३३.७, ८.९७.१४ व अथर्ववेद २०.५७.११ में इन्द्र द्वारा ओज से पुर के भेदन का उल्लेख आता है । पुर को उरु से विपरीत स्थिति मान सकते हैं । यह मर्त्य स्तर का प्रतीक हो सकता है तथा ॐ लोक की उपलब्धि का विस्तार इस मर्त्य स्तर तक करना है ।

  वामन पुराण में ओजस तीर्थ में कार्तिकेय के अभिषेक होने के कथन के संदर्भ में तैत्तिरीय संहिता १.८.११.१ में राजसूय यज्ञ में अभिषेक हेतु जल प्राप्ति के संदर्भ में जल को मरुतों का ओज भी कहा गया है । अतः यह कहा जा सकता है कि वास्तविक अभिषेक वही है जब उसके लिए स्वतःही ओज उत्पन्न हो जाए ।

  पुराणों में तेज, ओज, बल आदि काल के अवयव होने का सार्वत्रिक कथन यह संकेत करता है कि यह गुण अमृत नहीं हैं, अपितु नश्वर हैं ।

  जैसे पुराणों में सार्वत्रिक रूप से ओज के साथ सह, बल आदि का उल्लेख आता है, इसी प्रकार वैदिक साहित्य में भी ओज, सह, बल, नृम्ण आदि का सार्वत्रिक रूप से उल्लेख है ( अथर्ववेद १०.५.१-६, १८.४.५३, ऋग्वेद ५.५७.६, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.११.१.२१ आदि ) । डा. फतहसिंह ने इस सम्बन्ध में जो टिप्पणी की है, उसकी सत्यता की पुष्टि अपेक्षित है । अथर्ववेद ७.५७.१ में यजु:को बल व साम को ओज कहा गया है । तैत्तिरीय संहिता १.८.१५.२ में इन्द्र के बल व मरुतों के ओज का उल्लेख है । डा. फतहसिंह के अनुसार नृम्ण बल अन्नमय कोश में होता है । लेकिन ऋग्वेद ५.५७.६ में शीर्ष में नृम्ण/नृत्य तथा बाहुओं में ओज की स्थिति कही गई है । सह को उत्साह के रूप में समझ सकते हैं ।

  आँक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार अंग्रेजी में ऊज(ooze) का अर्थ स्थिर जल होता है जबकि वैदिक साहित्य में ओज का अर्थ ऊर्मि से युक्त ( तैत्तिरीय ब्राह्मण २.७.७.७ ), स्थिर के विपरीत बहता हुआ, शब्दायमान जल ( तैत्तिरीय आरण्यक १.२४.३) लिया गया है ।

 

  ऋग्वेद १.७.८, १.११.८, १.१७५.४, ८.६.४१, ८.१७.९, ८.३२.१४, ८.४०.५, ८.७६.१, ९.१०१.५ आदि में सार्वत्रिक रूप से ओज के साथ ईशान शब्द का उल्लेख आता है । ऐसा लगता है कि ईशान बनना पहली आवश्यकता है । पुराणों के सार्वत्रिक कथन के अनुसार ईशानः सर्वविद्यानाम् - सारी विद्याओं का जानने वाला । इसी प्रकार ओज के साथ सार्वत्रिक रूप से उग्र शब्द का उल्लेख मिलता है ( ऋग्वेद १.१९.४, १.१६५.१०, ३.३६.४, ४.२०.१, ६.१९.६, ७.५६.६, ७.५६.७, ८.९७.१०, ९.६६.१६, ९.६६.१७, १०.७३.१, १०.११३.६ आदि ) ।

  अथर्ववेद १.१२.१ में एक ओज के त्रेधा विभक्त कर दिए जाने का उल्लेख है । ऋग्वेद १.१६५.१० में एक ओज के विभु होने का उल्लेख है । ऋग्वेद १.१०२.८ में ओज की प्रतिमान ३ धातुओं, ३ भूमियों, ३ रोचनों का उल्लेख है ।

  तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.५ में ग्रावस्तुत् ऋत्विज को ओज का प्रतीक कहा गया है । यह कथन यज्ञ में ग्रावस्तुत् ऋत्विज की प्रकृति को समझने में सहायक होगा ।

  ओज की निरुक्ति उणादि कोश ४.१९७ के सूत्र उब्जेर्बले बलोपश्च के आधार पर की गई है । यहां उब्ज को आर्जव, ऋजुता, दीनता के अर्थ में लिया जाता है । उणादिकोश के टीकाकार नारायण ने ओज की परिभाषा उब्जति आर्जवेन गच्छति इति ओज: की है । दण्डनाथ नारायण वृत्ति में ओज की परिभाषा उषेर्जश्च ( २.१.३२६) के आधार पर की गई है । दुर्गसिंह की वृत्ति में ओज की परिभाषा उषेर्जश्च के आधार पर उषतीति ओज: बलम् की गई है । यास्क के निरुक्त ६.२.८ में भी ओज की परिभाषा ओजतेर्वोब्जतेर्वा की गई है । एक ओर ओ से उत्पन्न होने वाले ओज की ऋजुता है तो दूसरी ओर केवल अ से उत्पन्न होने वाले अज के संदर्भ में काशकृत्स्न धातु कोश में अज धातु वक्रता के अर्थ में बताई गई है । आर्जव, ऋजुता या सरलता व वक्रता की व्याख्या लक्ष्मीनारायण संहिता में संन्यास मार्ग व गृहस्थ मार्ग द्वारा की गई है । लेकिन अब ऋजुता व वक्रता को समझने के लिए हमारे पास आधुनिक विज्ञान का आधार है । जीवन के लिए ऋजु गति आवश्यक है । कैंसर व्याधि में शरीर के जीवन शक्ति वाले कोषों का जनन मन्द पड जाता है और व्याधि के कोषों का तीव्र हो जाता है । इसे इस प्रकार कह सकते हैं कि जीवन की गति अब ऋजु से वक्र बन जाती है । दूसरा उदाहरण लोहे में चुम्बकत्व का दे सकते हैं । लोहे में चुम्बकत्व इसलिए उत्पन्न होता है कि किन्हीं कारणों से लौह का एक कण दूसरे कण को एक विशिष्ट प्रकार से आकर्षित करता है और यह घटना लौह के सभी कणों के बीच घटती है । यदि लौह के तापमान में वृद्धि कर दी जाए या दो लौह कणों के बीच अन्य धातुओं के कण रख दिए जाएं तो यह चुम्बकीय गुण या तो समाप्त हो जाता है या बहुत  मन्द पड जाता है । भौतिक विज्ञान की शब्दावली में इसे व्यवस्था - अव्यवस्था की घटना कहते हैं, जबकि वेद की शब्दावली में इसे ऋजुता व वक्रता कह सकते हैं । उणादि कोष के टीकाकारों ने उष धातु के आधार पर भी ओज की निरुक्ति का प्रयास किया है । पुराण विषय अनुक्रमणिका में उषा शब्द की टिप्पणी में उषा को अव्यवस्था का माप माना गया है । अतः उष शब्द के आधार पर भी ओज की निरुक्ति ठीक हो सकती है । ओज व्यवस्था से उत्पन्न हो रहा है, ओ की व्यवस्था से । इस व्यवस्था से सम्बन्ध कटा कि अव्यवस्था उत्पन्न हुई ।

  वैदिक साहित्य में ओज के देवता - द्वय इन्द्राग्नि कहे गए हैं ( तैत्तिरीय संहिता ५.३.२.१, ५.६.२१.१, ६.५.५.१, ६.६.५.२, तैत्तिरीय ब्राह्मण १.३.४.३, १.६.४.४, ३.८.७.१, शतपथ ब्राह्मण १३.१.२.६, ताण्ड्य ब्राह्मण २४.१७.३, २५.११.३, बौधायन श्रौत सूत्र २६.११ आदि )तथा इनके उष्ट्र - द्वय पशुओं का उल्लेख आता है ( तैत्तिरीय संहिता ५.६.२१.१, बौधायन श्रौत सूत्र २६.११) । उष्ट्र पशु यज्ञीय पशु अवि का अपक्रान्त मेध है । यह अपक्रान्त मेध वैसे ही हो सकता है जैसे ओज ओ की अपक्रान्त शक्ति है । उष्ट्र उषा से, अव्यवस्था से सम्बन्धित हो सकता है । वास्तव में, यदि भौतिक विज्ञान की दृष्टि से विचार किया जाए तो ओ, अनुनाद अपने आप में बहुत बडी व्यवस्था है जिसका माप एण्ट्रापी होता है ( ट्रांफी अर्थात् ट्रान्सफार्मेशन, रूपान्तरण ) । यह एण्ट्रांपी जितनी कम होगी, अव्यवस्था उतनी ही कम होगी । एण्ट्रांपी का विवेचन उषा व ओषधि शब्दों पर टिप्पणियों में किया जा चुका है । किसी तन्त्र की एण्ट्रांपी जितनी कम होगी, उस तन्त्र से उतना ही अधिक उपयोगी कार्य कराया जा सकता है ( फिजिकल रिव्यू) । इन्जन से बहुत कार्य लिया जा सकता है । इसका अर्थ हुआ कि उसकी एण्ट्रांपी कम है । ओज का जन्म ओ से हुआ है । अतः ओज में कार्य करने की शक्ति होनी चाहिए । वेदों में ओज की सहायता से बहुत से कार्य करने का वर्णन है  । ऋग्वेद १.१६५.१० में एक विभु( भावनात्मक ) ओज का उल्लेख है जबकि अथर्ववेद १.१२.१ में एक ओज के त्रेधा विभक्त किए जाने का उल्लेख है । इसका अर्थ यह हो सकता है कि ओज इच्छा, ज्ञान व क्रिया में प्रयुक्त हो सकता है । ऋग्वेद में ओज द्वारा जितने कार्य होने का उल्लेख है, उन्हें इच्छा, ज्ञान व क्रिया के आधार पर समझने की आवश्यकता है, जैसे ईशान द्वारा किए गए कार्य ज्ञान से सम्बन्धित हो सकते हैं । उदुम्बर ( शतपथ ब्राह्मण ७.४.१.३९, ७.४.१.४२ ) को प्राप्त ओज भावना प्रकार का हो सकता है ।

प्रथम लेखन : २६-२-२००५ई.

संदर्भ

*वृषा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्त्योजसा । ईशानो अप्रतिष्कुतः ॥ - ऋग्वेद १.७.८

*इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः । महाँ अभिष्टिरोजसा ॥ - ऋ.१.९.१

*इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥ - ऋ.१.११.८

*य उग्रा अर्कमानृचुरनाधृष्टास ओजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ - ऋ.१.१९.४

*आ ये तन्वन्ति रश्मिभिस् तिरः समुद्रमोजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ - ऋ.१.१९.८

*सध्रीचीनेन मनसा तमिन्द्र ओजिष्ठेन हन्मनाहन्नभि द्यून् ॥ - ऋ.१.३३.११

*यावत्तरो मघवन् यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम् ॥ - ऋ.१.३३.१२

*वि तं युयोत शवसा व्योजसा वि युष्माकाभिरूतिभिः ॥ - ऋ.१.३९.८

*असाम्योजो बिभृथा सुदानवो ऽसामि धूतयः शवः । ऋषिद्विषे मरुतः परिमन्यव इषुं न सृजत द्विषम् ॥ - ऋ.१.३९.१०

*त्वमस्य पारे रजसो व्योमनः स्वभूत्योजा अवसे धृषन्मनः । - ऋ.१.५२.१२

*युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा । - ऋ.१.५३.७

*इन्द्रः सोमस्य पीतये वृषायते सनात् स युध्म ओजसा पनस्यते । - ऋ.१.५५.२

*स इन्महानि समिथानि मज्मना कृणोति युध्म ओजसा जनेभ्यः । - ऋ.१.५५.५

*स हि श्रवस्यु: सदनानि कृत्रिमा क्ष्मया वृधान ओजसा विनाशयन् । - ऋ.१.५५.६

*त्वं दिवो धरुणं धिष ओजसा पृथिव्या इन्द्र सदनेषु माहिनः । - ऋ.१.५६.६

*अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे ॥ - ऋ.१.५७.५

*शविष्ठ वजि|न्नोजसा पृथिव्या नि: शशा अहिमर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ - ऋ.१.८०.१

*येना वृत्रं निरद्भ~यो जघन्थ वजि|न्नोजसार्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ - ऋ.१.८०.२

*यदिन्द्र वजि|न्नोजसा वृत्रं मरुत्वाँ अवधीरर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ - ऋ.१.८०.११

*तस्मिन्नृम्णमुत क्रतुं देवा ओजांसि सं दधुरर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ - ऋ.१.८०.१५

*वि ये भ्राजन्ते सुमखास ऋष्टिभिः प्रच्यावयन्तो अच्युता चिदोजसा । मनोजुवो यन्मरुतो रथेष्वा वृषव्रातासः पृषतीरयुग्ध्वम् ॥ - ऋ.१.८५.४

*ऊर्ध्वं नुनुद्रेऽवतं त ओजसा दादृहाणं चिद् बिभिदुर्वि पर्वतम् । - ऋ.१.८५.१०

*अकल्प इन्द्रः प्रतिमानमोजसाथा जना विह्वयन्ते सिषासवः ॥ - ऋ.१.१०२.६

*त्रिविष्टिधातु प्रतिमानमोजसस्तिस्रो भूमीर्नृपते त्रीणि रोचना । - ऋ.१.१०२.८

*स जातूभर्मा श्रद्दधान ओजः पुरो विभिन्दन्नचरद् वि दासीः । - ऋ.१.१०३.३

*शुष्णस्य चित् परिहितं यदोजो दिवस्परि सुग्रथितं तदादः ॥ - ऋ.१.१२१.१०

*स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहंतर परशुर्न द्रुहंतरः । - ऋ.१.१२७.३

*स्थिरा चिदन्ना नि रिणात्योजसा नि स्थिराणि चिदोजसा ॥ - ऋ.१.१२७.४

*ओजिष्ठ त्रातरविता रथं कं चिदमर्त्य । - ऋ.१.१२९.१०

*संविव्यान ओजसा शवोभिरिन्द्र मज्मना । तष्टेव वृक्षं वनिनो नि वृश्चसि परश्वेव नि वृश्चसि ॥ - ऋ.१.१३०.४

*महो धनानि दयमान ओजसा विश्वा धनान्योजसा ॥ - ऋ.१.१३०.७

*सूरश्चक्रं प्र वृहज्जात ओजसा प्रपित्वे वाचमरुणो मुषायतीशान आ मुषायति । - ऋ.१.१३०.९

*तस्मा आयु: प्रजावदिद् बाधे अर्चन्त्योजसा । - ऋ.१.१३२.५

*ओजायमानस्तन्वश्च शुम्भते भीमो न शृङ्गा दविधाव दुर्गृभिः ॥ - ऋ.१.१४०.६

*येनाभि कृष्टीस्ततनाम विश्वहा पनाय्यमोजो अस्मे समिन्वतम् ॥ - ऋ.१.१६०.५

*एकस्य चिन्मे विभ्वस्त्वोजो या नु दधृष्वान् कृणवै मनीषा । - ऋ.१.१६५.१०

*त्वं तू न इन्द्र तं रयिं दा ओजिष्ठया दक्षिणयेव रातिम् । - ऋ.१.१६९.४

*मुषाय सूर्यं कवे चक्रमीशान ओजसा । वह शुष्णाय वधं कुत्सं वातस्याश्वैः ॥ - ऋ.१.१७५.४

*पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम् । यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत् ॥ - ऋ.१.१८७.१

*प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्रवीरमस्तृणन् । यत्रादित्या विराजथ ॥ - ऋ.१.१८८.४

*यः शम्बरं पर्वतेषु क्षियन्तं चत्वारिश्यां शरद्यन्वविन्दत् । ओजायमानं यो अहिं जघान दानुं शयानं स जनास इन्द्रः ॥ - ऋ.२.१२.११

*स भूतु यो ह प्रथमाय धायस ओजो मिमानो महिमानमातिरत् । - ऋ.२.१७.२

*स प्राचीनान् पर्वतान् दृंहदोजसा ऽधराचीनमकृणोदपामपः । - ऋ.२.१७.५

*अध त्विषीमाँ अभ्योजसा क्रिविं युधाभवदा रोदसी अपृणदस्य मज्मना प्र वावृधे । - ऋ.२.२२.२

*साकं जातः क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीर्यैः सासहिर्मृधो विचर्षणि: । - ऋ.२.२२.३

*भुवद् विश्वमभ्यादेवमोजसा विदादूर्जं शतक्रतुर्विदादिषम् । - ऋ.२.२२.४

*यो नन्त्वान्यनमन्न्योजसोतादर्दर्मन्युना शम्बराणि वि । - ऋ.२.२४.२

*अश्मास्यमवतं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारमभि यमोजसातृणत् । - ऋ.२.२४.४

*सिन्धुर्न क्षोदः शिमीवाँ ऋघायतो वृषेव वध्रीँरभि वष्ट्योजसा । - ऋ.२.२५.३

*अनिभृष्टतविषिर्हन्त्योजसा यं यं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः ॥ - ऋ.२.२५.४

*यूयं देवाः प्रमतिर्यूयमोजो यूयं द्वेषांसि सनुतर्युयोत । - ऋ.२.२९.२

*अर्हन्निदं दयसे विश्वमभ्वं न वा ओजीयो रुद्र त्वदस्ति ॥ - ऋ.२.३३.१०

*एष स्य ते तन्वो नृम्णवर्धनः सह ओजः प्रदिवि बाह्वोर्हितः । - ऋ.२.३६.५

*ओजिष्ठं ते मध्यतो मेद उद्भृतं प्र ते वयं ददामहे । - ऋ.३.२१.५

*व्रातं व्रातं गणंगणं सुशस्तिभिरग्नेर्भामं मरुतामोज ईमहे । - ऋ.३.२६.६

*ये ते शुष्मं ये तविषीमवर्धन्नर्चन्त इन्द्र मरुतस्त ओजः । माध्यन्दिने सवने वज्रहस्त पिबा रुद्रेभिः सगणःसुशिप्र ॥ - ऋ.३.३२.३

*न द्याव इन्द्र तवसस्त ओजो नाहा न मासा शरदो वरन्त ॥ - ऋ.३.३२.९

*अहन्नहिं परिशयानमर्ण ओजायमानं तुविजात तव्यान् । - ऋ.३.३२.११

*महाँ अमत्रो वृजने विरप्श्युग्रं शवः पत्यते धृष्वोजः । - ऋ.३.३६.४

*स वावृधान ओजसा पुरुष्टुत भवा नः सुश्रवस्तमः ॥ - ऋ.३.४५.५

*याf आभजो मरुतो ये त्वा ऽन्वहन् वृत्रमदधुस्तुभ्यमोजः ॥ - ऋ.३.४७.३

*इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते । पिबा त्वस्य गिर्वणः ॥ - ऋ.३.५१.१०

*अभि व्ययस्व खदिरस्य सारमोजो धेहि स्पन्दने शिंशपायाम् । - ऋ.३.५३.१९

*शुचिमर्कैर्बृहस्पतिमध्वरेषु नमस्यत । अनाम्योज आ चके ॥ - ऋ.३.६२.५

*सद्यो जातस्य ददृशानमोजो यदस्य वातो अनुवाति शोचि । - ऋ.४.७.१०

*भिनद् गिरिं शवसा वज्रमिष्णन्नाविष्कृण्वानः सहसान ओजः । - ऋ.४.१७.३

*दृळहान्यौभ्नादुशमान ओजो ऽवाभिनत् ककुभः पर्वतानाम् । - ऋ.४.१९.४

*ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः संगे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून् ॥ - ऋ.४.२०.१

*दभ्रेभिश्चिच्छशीयांसं हंसि व्राधन्तमोजसा । सखिभिर्ये त्वे सचा ॥ - ऋ.४.३२.३

*इन्द्रा युवं वरुणा दिद्युमस्मिन्नोजिष्ठमुग्रा नि वधिष्टं वज्रम् । यो नो दुरेवो वृकतिर्दभीतिस्तस्मिन् मिमाथामभिभूत्योजः ॥ - ऋ.४.४१.४

*अग्न ओजिष्ठमा भर द्युम्नमस्मभ्यमधि|गो । - ऋ.५.१०.१

*तदिन्नु ते करणं दस्म विप्राऽहिं यद् घ्नन्नोजो अत्रामिमीथा: । - ऋ.५.३१.७

*वावन्धि यज्यूंरुत तेषु धेह्योजो जनेषु येषु ते स्याम ॥ - ऋ.५.३१.१३

*इमे चिदस्य ज्रयसो नु देवी इन्द्रस्योजसो भियसा जिहाते । - ऋ.५.३२.९

*सं यदोजो युवते विश्वमाभिरनु स्वधाव्ने क्षितयो नमन्त ॥ - ऋ.५.३२.१०

*पपृक्षेण्यमिन्द्र त्वे ह्योजो नृम्णानि च नतृमानो अमर्तः । - ऋ.५.३३.६

*उतान्तरिक्षं ममिरे व्योजसा शुभं यातामनु रथा अवृत्सत ॥ - ऋ.५.५५.२

*नि ये रिणन्त्योजसा वृथा गावो न दुर्धुरः । अश्मानं चित् स्वर्यं पर्वतं गिरिं प्र च्यावयन्ति यामभिः ॥ - ऋ.५.५६.४

*ऋष्टयो वो मरुतो अंसयोरधि सह ओजो बाह्वोर्वो बलं हितम् । नृम्णा शीर्षस्वायुधा रथेषु वो विश्वा वःश्रीरधि तनूषु पिपिशे ॥ - ऋ.५.५७.६

*वयो न ये श्रेणीः पप्तुरोजसा ऽन्तान् दिवो बृहतः सानुनस्परि । - ऋ.५.५९.७

*यस्य प्रयाणमन्वन्य इद् ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा । ( दे. सविता ) - ऋ.५.८१.३

*दृळहा चिद् या वनस्पतीन् क्ष्मया दर्धर्ष्योजसा । यत् ते अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टयः ॥ (पृथिवी  )- ऋ.५.८४.३

*अनु द्यावापृथिवी तत् त ओजो ऽमर्त्या जिहत इन्द्र देवाः । - ऋ.६.१८.१५

*शविष्ठं न आ भर शूर शव ओजिष्ठमोजो अभिभूत उग्रम् । - ऋ.६.१९.६

*तूर्वन्नोजीयान् तवसस्तवीयान् कृतब्रह्मेvन्द्रो वृद्धमहाः । - ऋ.६.२०.३

*अहं चन तत् सूरिभिरानश्यां तव ज्याय इन्द्र सुम्नमोजः । - ऋ.६.२६.७

*य ओजिष्ठ इन्द्र तं सु नो दा मदो वृषन् त्स्वभिष्टिर्दास्वान् । - ऋ.६.३३.१

*अनु प्र येजे जन ओजो अस्य सत्रा दधिरे अनु वीर्याय । - ऋ.६.३६.२

*इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरf ओजिष्ठं पपुरि श्रवः । येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्रा: ॥ - ऋ.६.४६.५

*यदिन्द्र नाहुषीष्वाँ ओजो नृम्णं च कृष्टिषु । यद्वा पञ्च क्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौंस्या ॥ - ऋ.६.४६.७

*दिवस्पृथिव्या: पर्योज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः । अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज ॥ - ऋ.६.४७.२७

*आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि दुरिता बाधमानः । अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व ॥ - ऋ.६.४७.३०

*यामं येष्ठाः शुभा शोभिष्ठाः श्रिया संमिश्ला ओजोभिरुग्राः । उग्रं व ओजः स्थिरा शवांस्यधा मरुद्भिर्गणस्तुविष्मान् । - ऋ.७.५६.६-७

*प्र ये महोभिरोजसोत सन्ति विश्वो वो यामन् भयते स्वर्दृक् ॥ - ऋ.७.५८.२

*विश्वे देवासः परमे व्योमनि सं वामोजो वृषणा सं बलं दधुः ॥ - ऋ.७.८२.२

*अन्वपां खान्यतृन्तमोजसा सूर्यमैरयतं दिवि प्रभुम् । ( इन्द्रावरुणौ ) - ऋ.७.८२.३

*महे शुल्काय वरुणस्य नू त्विष ओजो मिमाते ध्रुवमस्य यत् स्वम् । - ऋ.७.८२.६

*यावत् तरस्तन्वो यावदोजो यावन्नरश्चक्षसा दीध्यानाः । ( इन्द्रवायू ) - ऋ.७.९१.४

*प्र चक्रे सहसा सहो बभञ्ज मन्युमोजसा । विश्वे त इन्द्र पृतनायवो यहो नि वृक्षा इव येमिरे । - ऋ.८.४.५

*निमेघमानो मघवन् दिवेदिव ओजिष्ठं दधिषे सहः ॥ - ऋ.८.४.१०

*महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव । स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे । - ऋ.८.६.१

*ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत् समवर्तयत् । इन्द्रश्चर्मेव रोदसी ॥ - ऋ.८.६.५

*न द्याव इन्द्रमोजसा नान्तरिक्षाणि वजि|णम् । न विव्यचन्त भूमय ॥ - ऋ.८.६.१५

*यदङ्ग तविषीयस इन्द्र प्रराजसि क्षिती । महाँ अपार ओजसा । - ऋ.८.६.२६

*ऋषिर्हि पूर्वजा अस्येक ईशान ओजसा । इन्द्र चोष्कूयसे वसु । - ऋ.८.६.४१

*सृजन्ति रश्मिमोजसा पन्थां सूर्याय यातवे । ते भानुभिर्वि तस्थिरे ॥ - ऋ.८.७.८

*इमं स्तोममभिष्टये घृतं न पूतमद्रिव । येना नु सद्य ओजसा ववक्षिथ ॥ - ऋ.८.१२.४

*इन्द्रं वृत्राय हन्तवे देवासो दधिरे पुरः । इन्द्रं वाणीरनूषता समोजसे ॥ महान्तं महिना वयं स्तोमेभिर्हवनश्रुतम् । अर्कैरभि प्र णो नुम समोजसे ॥ न यं विविक्तो रोदसी नान्तरिक्षाणि वजि|णम् । अमादिदस्य तित्विषे समोजसः ॥ - ऋ.८.१२.२२- २४

*इन्द्र प्रेहि पुरस्त्वं विश्वस्येशान ओजसा । वृत्राणि वृत्रहञ्जहि ॥ - ऋ.८.१७.९

*आयन्तारं महि स्थिरं पृतनासु श्रवोजितम् । भूरेरीशानमोजसा ॥ - ऋ.८.३२.१४

*अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्र्यन्धसः ॥ - ऋ.८.३३.७

*नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महाँश्चरस्योजसा ॥ - ऋ.८.३३.८

*आ यदिन्द्रश्च दद्वहे सहस्रं वसुरोचिषः । ओजिष्ठमश्व्यं पशुम् ॥ - ऋ.८.३४.१६

*ऊर्जा देवाँ अवस्योजसा त्वां पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो । - ऋ.८.३६.३

*या सप्तबुध्नमर्णवं जिह्मबारमपोर्णुत इन्द्र ईशान ओजसा नभन्तामन्यके समे । - ऋ.८.४०.५

*अपि वृश्च पुराणवद् व्रततेरिव गुष्पितमोजो दासस्य दम्भय । - ऋ.८.४०.६

*उतो नु चिद् य ओजसा शुष्णस्याण्डानि भेदति जेषत् स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे ॥ - ऋ.८.४०.१०

*उतो नु चिद् य ओहत आण्डा शुष्णस्य भेदत्यजैः स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे ॥ - ऋ.८.४०.११

*रथिरासो हरयो ये ते अस्रिध ओजो वातस्य पिप्रति । - ऋ.८.५०८

*प्र यो ननक्षे अभ्योजसा क्रिविं वधैः शुष्णं निघोषयन् । - ऋ.८.५१.८

*तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । - ऋ.८.६१.२

*पूर्वीरति प्र वावृधे विभ्वा जातान्योजसा भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥ - ऋ. ८.६२.२

*यद्धंसि वृत्रमौजसा शचीपते भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥ - ऋ. ८.६२.८

*नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः । अमैरमित्रमर्दय ॥ - ऋ. ८.७५.१०

*इमं नु मायिनं हुव इन्द्रमीशानमोजसा । मरुत्वन्तं न वृञ्जसे ॥ - ऋ. ८.७६.१

*मरुत्वन्तमृजीषिणमोजस्वन्तं विरप्शिनम् । इन्द्रं गीर्भिर्हवामहे ॥ - ऋ. ८.७६.५

*प्र हि रिरिक्ष ओजसा दिवो अन्तेभ्यस्परि। न त्वा विव्याच रज इन्द्र पार्थिवमनु स्वधां ववक्षिथ ॥ -ऋ. ८.८८.५

*अस्य पीत्वा मदानां देवो देवस्योजसा । विश्वाभि भुवना भुवत्॥ - ऋ. ८.९२.६

*यस्ते चित्रश्रवस्तमो य इन्द्र वृत्रहन्तमः। य ओजोदातमो मदः ॥ - ऋ. ८.९२.१७

*इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः । द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः ॥ - ऋ. ८.९३.८

*इष्टा होत्रा असृक्षतेन्द्रं वृधासो अध्वरे । अच्छावभृथमोजसा ॥ - ऋ. ८.९३.२३

*इन्द्रस्य वज्र आयसो निमिश्ल इन्द्रस्य बाह्वोर्भूयिष्ठमोजः ॥ - ऋ. ८.९६.३

*त्वं ह त्यदप्रतिमानमोजो वज्रेण वजि|न् धृषितो जघन्थ । - ऋ. ८.९६.१७

*क्रत्वा वरिष्ठं वर आमुरिमुतोग्रमोजिष्ठं तवसं तरस्विनम् । - ऋ. ८.९७.१०

*स्वर्पतिं यदीं वृधे धृतव्रतो ह्योजसा समूतिभिः ॥ - ऋ. ८.९७.११

*त्वं पुर इन्द्र चिकिदेना व्योजसा शविष्ठ शक्र नाशयध्यै । - ऋ. ८.९७.१४

*त्व न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे । आ वीरं पृतनाषहम् ॥ - ऋ.८.९८.१०

*गिरस्त इन्द ओजसा मर्मृज्यन्ते अपस्युवः । याभिर्मदाय शुम्भसे। - ऋ. ९.२.७

*ईळेन्यः पवमानो रयिर्वि राजति द्युमान् । मधोर्धाराभिरोजसा ॥ बर्हिः प्राचीनमोजसा पवमानः स्तृणन् हरिः । देवेषु देव ईयते । - ऋ. ९.५.३-४

*एष शृङ्गाणि दोधुवच्छिशीते यूथ्यो३ वृषा । नृम्णा दधान ओजसा ॥ - ऋ. ९.१५.४

*प्रास्य धारा अक्षरन् वृष्णः सुतस्योजसा । देवाँ अनु प्रभूषत ॥ - ऋ. ९.२९.१

*प्र सुवानो धारया तनेन्दुर्हिन्वानो अर्षति । रुजद्दृळ्हा व्योजसा ॥ - ऋ. ९.३४.१

*इन्दो समुद्रमीङ्खय पवस्व विश्वमेजय । रायो धर्ता न ओजसा ॥ - ऋ. ९.३५.२

*सुत एति पवित्र आ त्विषिं दधान ओजसा । विचक्षाणो विरोचयन् । - ऋ. ९.३९.३

*अया निजघ्निरोजसा रथसङ्गे धने हिते । स्तवा अबिभ्युषा हृदा ॥ - ऋ. ९.५३.२

*परि णो याह्यस्मयुर्विश्वा वसून्योजसा । पाहि नः शर्म वीरवत्॥ - ऋ. ९.६४.१८

*वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः । विश्वा दधान ओजसा ॥ - ऋ. ९.६५.१०

*आ कलशा अनूषतेन्दो धाराभिरोजसा । एन्द्रस्य पीतये विश ॥ -ऋ. ९.६५.१४

*महाँ असि सोम ज्येष्ठ उग्राणामिन्द ओजिष्ठः । युध्वा सञ्छश्वज्जिगेथ ॥ य उग्रेभ्यश्चिदोजीयाञ्छूरेभ्यश्चिच्छूरतरः । भूरिदाभ्यश्चिन्मंहीयान् ॥ - ऋ. ९.६६.१७

*त्वं सोमासि धारयुर्मन्द्र ओजिष्ठो अध्वरे । पवस्व मंहयद्रयिः ॥ - ऋ. ९.६७.१

*अदधादिन्द्रे पवमान ओजो ऽजनयत् सूर्ये ज्योतिरिन्दुः ॥ - ऋ. ९.९७.४१

*इन्दुरिन्द्राय पवते इति देवासो अब्रुवन् । वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा ॥ - ऋ. ९.१०१.५

*य ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम् । यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहै ॥ - ऋ. ९.१०१.९

*पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा । आ कलशं मधुमान् त्सोम नः सदः ॥ - ऋ. ९.१०६.७

*य उस्रिया अप्या अन्तरश्मनो निर्गा अकृन्तदोजसा । अभि व्रजं तत्निषे गव्यमश्व्यं वर्मीव धृष्णवा रुज ॥ -ऋ. ९.१०८.६

*भूरीदिन्द्र उदिनक्षन्तमोजो ऽवाभिनत् सत्पतिर्मन्यमानम् । - ऋ.१०.८.९

*ओजः कृष्व सं गृभाय त्वे अप्यसो यथा केनिपानामिनो वृधे ॥ - ऋ. १०.४४.४

*अहं सूर्यस्य परि याम्याशुभिः प्रैतशेभिर्वहमान ओजसा । - ऋ. १०.४९.७

*प्रावो देवाँ आतिरो दासमोजः प्रजायै त्वस्यै यदशिक्ष इन्द्र ॥ - ऋ. १०.५४.१

*अन्तरिक्षं मह्या पप्रुरोजसा सोमो घृतश्रीर्महिमानमीरयन् ॥ - ऋ. १०.६५.२

*स्वर्णरमन्तरिक्षाणि रोचना द्यावाभूमी पृथिवीं स्कम्भुरोजसा । - ऋ. १०.६५.४

*द्यां स्कभित्वय१प आ चक्रुरोजसा यज्ञं जनित्वी तन्वी३ नि मामृजुः ॥ - ऋ. १०.६५.७

*जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय मन्द्र ओजिष्ठो बहुलाभिमानः । - ऋ. १०.७३.१

*अश्वादियायेति यद्वदन्त्योजसो जातमुत मन्य एनम् । - ऋ. १०.७३.१०

*प्र सप्तसप्त त्रेधा हि चक्रमुः प्र सृत्वरीणामति सिन्धुरोजसा ॥ - ऋ. १०.७५.१

*हत्वाय शत्रून् वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व ॥ - ऋ. १०.८४.२

*जज्ञिष इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत् पुरूरवो म ओजः । - ऋ. १०.९५.११

*मही चिद्धि धिषणाहर्यदोजसा बृहद्वयो दधिषे हर्यतश्चिदा ॥ - ऋ. १०.९६.१०

*अस्य त्रितो न्वोजसा वृधानो विपा वराहमयोअग्रया हन् ॥ - ऋ. १०.९९.६

*गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा । - ऋ. १०.१०३.६

*तमस्य विष्णुर्महिमानमोजसांऽशुं दधन्वान् मधुनो वि रप्शते। - ऋ. १०.११३.२

*वृत्रं यदुग्रो व्यवृश्चदोजसा ऽपो बिभ्रतं तमसा परीवृतम् ॥ - ऋ. १०.११३.६

*व्यर्य इन्द्र तनुहि श्रवांस्योजः स्थिरेव धन्वनोऽभिमातीः । - ऋ. १०.११६.६

*ओजीयो धृष्णो स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् यातुधाना दुरेवाः ॥ - ऋ. १०.१२०.४

*त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः । त्वं वृषन् वृषेदसि ॥ तवमिन्द्रासि वृत्रहा व्यन्तरिक्षमतिरः। उद् द्यामस्तभ्ना ओजसा ॥ त्वमिन्द्र सजोषसमर्कं बिभर्षि बाह्वोः। वज्रं शिशान ओजसा॥ त्वमिन्द्राभिभूरसि विश्वा जातान्योजसा । स विश्वा भुव आभुवः ॥ - ऋ. १०.१५३.२-५

*विश्वभ्राड~ भ्राजो महि सूर्यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम् । - ऋ. १०.१७०.३

*इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजो ऽजायथा वृषभ चर्षणीनाम् । - ऋ. १०.१८०.३

*स नो मृडाति तन्व: ऋजुगो रुजन् य एकमोजस्त्रेधा विचक्रमे ॥ - अथर्ववेद १.१२.१

*नैनं रक्षांसि न पिशाचा: सहन्ते देवानामोजः प्रथमजं ह्ये३तत् । यो बिभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स जीवेषु कृणुते दीर्घमायु: ॥ - अ.१.३५.२

*अपां तेजो ज्योतिरोजो बलं च वनस्पतीनामुत वीर्याणि । इन्द्र इवेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन् तद् दक्षमाणो बिभरद्धिरण्यम् । - अ.१.३५.३

*ओजोऽस्योजो मे दाः स्वाहा । सहोऽसि सहो मे दाः स्वाहा ॥ - अ.२.१७.२

*इन्द्रः सेनां मोहयतु मरुतो घ्नन्त्वोजसा । चक्षूंष्यग्निरा दत्तां पुनरेतु पराजिता ॥ - अ.३.१.६

*असौ या सेना मरुतः परेषामस्मानैत्यभ्योजसा स्पर्धमाना । तां विध्यत तमसापव्रतेन यथैषामन्यो अन्यं न जानात् ॥ - अ.३.२.६

*आयमगन् पर्णमणिर्बली बलेन प्रमृणन्त्सपत्नान् । ओजो देवानां पय ओषधीनां वर्चसा मा जिन्वत्वप्रयावन् ॥ - अ.३.५.१

*समहमेषां राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं१ बलम् । वृश्चामि शत्रूणां बाहूननेन हविषाहम् ॥ - अ.३.१९.२

*शतेन मा परि पाहि सहस्रेणाभि रक्ष मा । इन्द्रस्ते वीरुधां पत उग्र ओज्मानमा दधत् ॥ - अ.४.२०.८

*यस्मिन्नर्कः शिश्रिये यस्मिन्नोजः स नो मुञ्चत्वंहसः ॥ - अ.४.२४.५

*हत्वाय शत्रून् वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व ॥ - अ.४.३१.२

*यस्ते मन्योऽविधद् वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक् । - अ.४.३२.१

*विश्वचर्षणिः सहुरि: सहीयानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि ॥ - अ.४.३२.४

*वावृधानः शवसा भूर्योजा शत्रुर्दासाय भियसं दधाति । - अ.५.२.२

*ओजीयः शुष्मिन्त्स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् दुरेवासः कशोका: ॥ - अ.५.२.४

*इमं वीरमनु हर्षध्वमुग्रमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम् । ग्रामजितं गोजितं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा ॥ - अ.६.९७.३

*दिवस्पृथिव्या: पर्योज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः । अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज ॥ इन्द्रस्योजो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः । - अ.६.१२५.२-३

*आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा अभि ष्टन दुरिता बाधमानः । अप सेध दुन्दुभे दुच्छुनामित इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीडयस्व ॥ - अ.६.१२६.२

*यत् पुरुषेण हविषा यज्ञं देवा अतन्वत । अस्ति नु तस्मादोजीयो यद्विहव्येनेजिरे ॥ - अ.७.५.४

*ययोरोजसा स्कभिता रजांसि यो वीर्यैर्वीरतमा शविष्ठा । यो पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर्विष्णुमगन् वरुणं पूर्वहूतिः ॥ - अ.७.२६.१

*ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोजो यजुर्बलम् । एष मा तस्मान्मा हिंसीद् वेदः पृष्टः शचीपते ॥ - अ.७.५७.२

*इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजोऽजायथा वृषभ चर्षणीनाम् । अपानुदो जनममित्रायन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम् ॥ - अ.७.८९.२

*अपि वृश्च पुराणवद् व्रततेरिव गुष्पितम् । ओजो दास्यस्य दम्भय ॥ - अ.७.९५.१

*अयं स्राक्त्यो मणिः प्रतीवर्तः प्रतिसरः । ओजस्वान् विमृधो वशी सो अस्मान् पातु सर्वतः ॥ - अ.८.५.४

*अयमिद् वै प्रतीवर्त ओजस्वान् संजयो मणिः । प्रजां धनं च रक्षतु परिपाणः सुमङ्गले: ॥ - अ.८.५.१६

*साध्या एकं जालदण्डमुद्यत्य यन्त्योजसा । रुद्रा एकं वसव एकमादित्यैरेक उद्यतः ॥ विश्वेदेवा उपरिष्टादुब्जन्तो यन्त्वोजसा । मध्येन घ्नन्तो यन्तु सेनामङ्गिरसो महीम् ॥ - अ.८.८.१२-१३

*यथा मक्षा इदं मधु न्यञ्जन्ति मधावधि । एवा मे अश्विना वर्चस्तेजो बलमोजश्च ध्रियताम् ॥ - अ.९.१.१७

*इन्द्रस्योजो वरुणस्य बाहू अश्विनोरंसौ मरुतामियं ककुत् । - अ.९.४.८

*अरात्यास्त्वा निर्ऋत्या अभिचारादथो भयात् । मृत्योरोजीयसो वधाद् वरणो वारयिष्यते ॥ - अ.१०.३.७

*इमं बिभर्मि वरणमायुष्मान्छतशारदः । स मे राष्ट्रं च क्षत्रं च पशूनोजश्च मे दधत् ॥ यथा वातो वनस्पतीन् वृक्षान् भनक्त्योजसा । एवा सपत्नान् मे भङ्ग्धि पूर्वान् जाताf उतापरान् वरणस्त्वाभि रक्षतु ॥ - अ.१०.३.१२-१३

*इन्द्रस्योज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ । जिष्णवे योगाय ब्रह्मयोगैर्वो युनज्मि ॥ - - - -- - - - -- - - - -अ.१०.५.१-६

*अरातीयोर्भ्रातृव्यस्य दुर्हार्दो द्विषतः शिरः । अपि वृश्चाम्योजसा ॥ - अ.१०.६.१

*यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्चचुतमुग्रं खदिरमोजसे । तमिन्द्रः प्रत्यमुञ्चतौजसे वीर्याय कम् । सो अस्मै बलमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि ॥ - अ.१०.६.६

*यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्चnतमुग्रं खदिरमोजसे । - - - - -- - - अ.१०.६.७-१०

*समृद्धिरोज आकूतिः क्षत्रं राष्ट्रं षडुर्व्यः । संवत्सरोऽध्युच्छिष्ट इडा प्रैषा ग्रहा हविः ॥ - अ.११.७.१८

*स्तेयं दुष्कृतं वृजिनं सत्यं यज्ञो यशो बृहत् । बलं च क्षत्रमोजश्च शरीरमनु प्राविशन् ॥ - अ.११.८.२०

*बृहस्पतिराङ्गिरसो वज्रं यमसिञ्चतासुरक्षयणं वधम् । तेनाहममूं सेनां नि लिम्पामि बृहस्पतेऽमित्रान् हन्म्योजसा ॥ - अ.११.१२.१३

*ओजश्च तेजश्च सहश्च बलं च वाक् चेन्द्रियं चे श्रीश्च धर्मश्च ।-- - - - - - - -तानि सर्वाण्यप क्रामन्ति ब्रह्मगवीमाददानस्य जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य ॥ - अ.१२.६.७

*पर्णो राजापिधानं चरूणामूर्जो बलं सह ओजो न आगन् । आयुर्जीवेभ्यो विदधद् दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ॥ - अ.१८.४.५३

*इमं वीरमनु हर्षध्वमुग्रमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम् । ग्रामजितं गोजितं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा । - अ.१९.१३.६

*त्वं भूमिमत्येष्योजसा त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे । त्वां पवित्रमृषयोऽभरन्त त्वं पुनीहि दुरितान्यस्मत् ॥ - अ.१९.३३.३

*ओजो देवानां बलमुग्रमेतत् तं ते बध्नामि जरसे स्वस्तये ॥ - अ.१९.३३.४

*स जङ्गिडस्य महिमा परि णः पातु विश्वतः । विष्कन्धं येन सासह संस्कन्धमोज ओजसा ॥ - अ.१९.३४.५

*उग्र इत् ते वनस्पत इन्द्र ओज्मानमा दधौ । अमीवाः सर्वाश्चातयं जहि रक्षांस्योषधे ॥ - अ.१९.३४.९

*इदं वर्चो अग्निना दत्तमागन् भर्गो यशः सह ओजो वयो बलम् । त्रयस्त्रिंशद् यानि च वीर्याणि तान्यग्निः प्र ददातु मे ॥ वर्च आ धेहि मे तन्वां३ सह ओजो वयो बलम् । इन्द्रियाय त्वा कर्मणे वीर्याय प्रति गृह्णामि शतशारदाय ॥ ऊर्जे त्वा बलाय त्वौजसे सहसे त्वा । अभिभूयाय त्वा राष्ट}भृत्याय पर्यूहामि  शतशारदाय ॥ - अ.१९.३७.१-३

*भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे । ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसंनमन्तु ॥ - अ.१९.४१.१

*अपां नपातमश्विना हुवे धिय इन्द्रियेण त इन्द्रियं दत्तमोजः ॥ - अ.१९.४२.४

*त्वं काम सहसासि प्रतिष्ठितो विभुर्विभावा सख आ सखीयते । त्वमुग्र: पृतनासु सासहि: सह ओजो यजमानाय धेहि । - अ.१९.५२.२

*ऊर्वोरोजो जङ्घयोर्जवः पादयोः । प्रतिष्ठा अरिष्टानि मे सर्वात्मानिभृष्टः ॥ - अ.१९.६०.२

*इन्द्र प्रेहि पुरस्त्वं विश्वस्येशान ओजसा । वृत्राणि वृत्रहं जहि ॥ - अ.२०.५.३

*युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा । - अ.२०.२१.७

*मही चिद्धि धिषणा हर्यदोजसा बृहद् वयो दधिषे हर्यतश्चिदा । - अ.२०.३१.५

*ओजायमानं यो अहिं जघान दानुं शयानं स जनास इन्द्रः ॥ - अ.२०.३४.११

*उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् ॥ - अ.२०.४२.३

*इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः । द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः ॥ - अ.२०.४७.२

*क इ‰ वेद सुते सचा पिबन्तं कद् वयो दधे । अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्र्यन्धसः ॥ - अ.२०.५३.१

*नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महांश्चरस्योजसा ॥ - अ.२०.५३.२

*क्रत्वा वरिष्ठं वर आमुरिमुतोग्रमोजिष्ठं तवसं तरस्विनम् ॥ - अ.२०.५४.१

*स्वर्पतिं यदीं वृधे धृतव्रतो ह्योजसा समूतिभिः ॥ - अ.२०.५४.२

*अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्र्यन्धसः ॥ - अ.२०.५७.११

*नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महांश्चरस्योजसा ॥ - अ.२०.५७.१२

*श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम ॥ - अ.२०.५८.१

*एष स्य ते तन्वो नृम्णवर्धनः सह ओजः प्रदिवि बाह्वोर्हितः । - २०.६७.६

*वृषा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्त्योजसा । ईशानो अप्रतिष्कुतः ॥ - अ.२०.७०.१४

*इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः । महाँ अभिष्टिरोजसा ॥ - अ.२०.७१.७

*इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरँ ओजिष्ठं पपुरि श्रवः । येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्राः ॥ - अ.२०.८०.१

*त्वमिन्द्रासि वृत्रहा व्यन्तरिक्षमतिरः । उद् द्यामस्तभ्ना ओजसा ॥ त्वमिन्द्र सजोषसमर्कं बिभर्षि बाह्वोः । वज्रं शिशान ओजसा ॥ त्वमिन्द्राभिभूरसि विश्वा जातान्योजसा । स विश्वा भुव आभवः ॥ - अ.२०.९३.६-८

*ओजः कृष्व सं गृभाय त्वे अप्यसो यथा केनिपानामिनो वृधे ॥ - अ.२०.९४.४

*ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत् समवर्तयत् । इन्द्रश्चर्मेव रोदसी ॥ - अ.२०.१०७.२

*त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे । आ वीरं पृतनाषहम् ॥ - अ.२०.१०८.१

*इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन् । वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा ॥ - अ.२०.१३७.५

*त्वं ह त्यदप्रतिमानमोजो वज्रेण वज्रिन्धृषितो जघन्थ । - अ.२०.१३७.११

*इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः । द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः ॥ - अ.२०.१३७.१३

*महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव । स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे ॥ - अ.२०.१३८.१

*आधान प्रकरणम् :- यो भ्रातृव्यवान्त्स्यात् । स चित्रायामग्निमादधीत । अवकीर्यैव भ्रातृव्यान् ।ओजो बलमिन्द्रियं वीर्यमात्मन्धत्ते । - तैत्तिरीय ब्राह्मण १.१.२.६

*गवामयनशेषविधिः। गार्हपत्ये प्रणयनीयमाश्वत्थमिध्ममादीप्य सिकताश्चोपयमनीरुपकल्पयते तमुद्यच्छति  :- ओजसे बलाय त्वोद्यच्छे । वृषणे शुष्मायाऽऽयुषे वर्चसे । - तै.ब्रा.१.२.१.२१

*वाजपेय पशूनां विधिः :- ओजो बलमैन्द्राग्नेयेन । इन्द्रियमैन्द्रेण । वाचँ सारस्वत्या । - तै.ब्रा.१.३.४.३

*वरुणप्रघासपर्वानन्तरभावि वपनमन्त्रौ :- यद्घर्मः पर्यवर्तयत् । अन्तान्पृथिव्या दिवः । अग्निरीशान ओजसा । वरुणो धीतिभिः सह । इन्द्रो मरुद्भिः सखिभिः सह । - तै.ब्रा.१.५.५.२

*अथर्वशिरोभिधानेष्टका मन्त्राः :- इन्द्रः स दामने कृतः । ओजिष्ठः स बले हितः । द्युम्नी श्लोकी स सौम्यः ॥ - तै.ब्रा.१.५.८.३

*राजसूये वरुणप्रघासविधिः :- ओजो बलं वा एतौ देवानाम् । यदिन्द्राग्नी । यदैन्द्राग्नो भवति । ओजो बलमेवावरुन्धे । - तै.ब्रा.१.६.४.४

*राजसूये जलग्रहण - जलाहरण विधिः :- मरुतामोजः स्थेत्याह । अन्नं वै मरुतः । अन्नमेवावरुन्धे । - तै.ब्रा.१.७.५.२

*राजसूये विजयादूर्ध्वमासनोपविष्टस्य यजमानस्य सवै सेव्यत्ववर्णनम् :-ब्रह्माँ३ त्वं राजन्ब्रह्माऽसीन्द्रोऽसि सत्यौजा इत्याह । इन्द्रमेवैनं सत्यौजसं करोति । -- - - - - इन्द्रोऽसि सत्यौजा इत्याह । त्रिष्टुभमेवैतेनाभिव्याहरति । - तै.ब्रा.१.७.१०.३

*ऐन्द्रे सौमिके कर्मणि मन्त्राः :- अक्षोदयच्छवसा क्षाम बुध्नम्। वार्णवातस्तविषीभिरिन्द्रः । दृढान्यौघ्नादुशमान ओजः । अवाभिनत्ककुभः पर्वतानाम् । - तै.ब्रा.२.४.५.३

*उपहोममन्त्राः :- शुचिमर्कैर्बृहस्पतिम् । अध्वरेषु नमस्यत । अनाम्योज आचके । - तै.ब्रा.२.४.६.३

*आग्नेयकर्मणि विनियोक्तव्यो मन्त्राः :- अग्निः क्षत्रभृदनिभृष्टमोजः । सहस्रियो दीप्यतामप्रयुच्छन् । विभ्राजमानः समिधान उग्रः । आऽन्तरिक्षमरुहदगन्द्याम् । - तै.ब्रा.२.४.६.१२

*उपहोमशेषाभिधानम् :- अग्ने जेता त्वं जय । शत्रून्त्सहस ओजसा । वि शत्रून्विमृधो नुद । - तै.ब्रा.२.४.७.४

*धारावरा मरुतो धृष्णुवोजसः । मृगा न भीमास्तविषेभिरूर्मिभिः । - - - तै.ब्रा.२.५.५.४

*उपहोमशेषाभिधानम् :- इदं वर्चो अग्निना दत्तमागात् । यशो भर्गः सह ओजो बलं च । दीर्घायुत्वाय शतशारदाय । प्रतिगृभ्णामि महते वीर्याय । - तै.ब्रा.२.५.७.१

*सौत्रामणेः कौकिल्या ग्रहाभिधानम् :- ओजोऽस्योजो मयि धेहि । मन्युरसि मन्युं मयि धेहि । महोऽसि महो मयि धेहि । सहोऽसि सहो मयि धेहि । - तै.ब्रा.२.६.१.५

*सौत्रामणेः कौकिल्या अभिधानम् :-होता यक्षत्समिधेन्द्रमिडस्पदे । नाभा पृथिव्या अधि । दिवो वर्ष्मन्त्समिध्यते । ओजिष्ठश्चर्षणीसहान् । वेत्वाज्यस्य होतर्यज । - तै.ब्रा.२.६.७.१

*सौत्रामणेः मैत्रावरुणेन पठनीया एकादश प्रयाज प्रैषाः :- होता यक्षदोजो न वीर्यम् । सहो द्वार इन्द्रमवर्धयन् । सुप्रायणा विश्रयन्तामृतावृधः । - - - तै.ब्रा.२.६.७.३

*सौत्रामण्याम् विहित पशुत्रये प्रयाजार्थ मैत्रावरुण प्रैषाभिधानम् :- होता यक्षत्त्वष्टारमिन्द्रमश्विना । भिषजं न सरस्वतीम् । ओजो न जूतिरिन्द्रियम् । वृको न रभसो भिषक् । - - - - तै.ब्रा.२.६.११.७

*अनूयाजानां मैत्रावरुण प्रैषाभिधानम् :-देव इन्द्रो वनस्पतिः । हिरण्यपर्णो अश्विभ्याम् । सरस्वत्याः सुपिप्पलः । इन्द्राय पच्यते मधु । ओजो न जूतिमृषभो न भामम् । वनस्पतिर्नो दधदिन्द्रियाणि । - तै.ब्रा.२.६.१४.५

*ओदनसवस्य होत्रादि मन्त्राः :- इन्द्राय त्वा तेजस्वते तेजस्वन्तं श्रीणामि ( इति ब्राह्मणः )। इन्द्राय त्वौजस्वत ओजस्वन्तं श्रीणामि ( इति क्षत्रियः )। इन्द्राय त्वा पयस्वते पयस्वन्तं श्रीणामि ( इति वैश्यः )। इन्द्राय त्वाऽऽयुष्मत आयुष्मन्तं श्रीणामि ( इति शूद्रः )। - तै.ब्रा.२.७.७.३

*अपां ग्रहान्गृहणन्ति । ये मन्थान्कल्पयन्ति ।:- अपां यो द्रवणे रसः । तमहमस्मा आमुष्यायणाय । तेजसे ब्रह्मवर्चसाय गृह्णामि ( इति ब्राह्मणः ) । अपां य ऊर्मौ रसः । तमहमस्मा आमुष्यायणाय । ओजसे वीर्याय गृह्णामि ( इति क्षत्रियः ) । अपां यो मध्यतो रसः । तमहमस्मा आमुष्यायणाय पुष्ट्यै प्रजननाय गृह्णामि इति वैश्यः )। अपां यो यज्ञियो रसः । तमहमस्मा आमुष्यायणाय । आयुषे दीर्घायुत्वाय गृह्णामि । - तै.ब्रा.२.७.७.७

*पशुसूक्तानामभिधानम् । वपाया याज्या :-जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय । मन्द्र ओजिष्ठो बहुलाभिमानः। अवर्धन्निन्द्रं मरुतश्चिदत्र । माता यद्वीरं दधनद्धनिष्ठा । - तै.ब्रा.२.८.३.४

*पशुसूक्ताभिधानम् । पुरोडाशस्य याज्या :-ययोरोजसा स्कभिता रजांसि । वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा । या पत्येते अप्रतीता सहोभिः । विष्णू अगन्वरुणा पूर्वहूतौ । - तै.ब्रा.२.८.४.५

*पुरोडाशस्य याज्या :- तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजाः । वन्वन्नवातः पुरुहूत इन्द्रः । अषाढमुग्रं सहमानमाभिः । गीर्भिर्वर्ध वृषभं चर्षणीनाम् । - तै.ब्रा.२.८.५.८

*इष्टिहौत्रस्य मन्त्राणामभिधानम् :- महाँ इन्द्रो य ओजसा । पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव । स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे । - तै.ब्रा.३.५.७.४

*अच्छिद्रकाण्डाभिधानम् । बर्हिषाऽऽस्तीर्यमाणाया वेदेरनुमन्त्रणे मन्त्रम् :- ब्रह्मतेजो मे पिन्वस्व । क्षत्त्रमोजो मे पिन्वस्व । विशं पुष्टिं मे पिन्वस्व - - - - - तै.ब्रा.३.७.६.६

*अच्छिद्रकाण्डाभिधानम् । पक्वे पयसि सादिते सत्यभिमर्शने मन्त्रम् :-इदमिन्द्रियममृतं वीर्यम् । अनेनेन्द्राय पशवोवचिकित्सन् । तेन देवा अवतोप माम् । इहेषमूर्जं यशः सह ओजः सनेयम् । शृतं मयि श्रयताम् । - तै.ब्रा.३.७.६.१२

*अभिषवादिविषया मन्त्राः । दधिघर्मे स्रुचि गृहीतस्याभिघारितस्य दध्न आग्नीध्रीयाग्नावधिश्रयणे मन्त्रम् :- - - दक्षश्च त्वा बलं च श्रीणीताम् । ओजश्च त्वा सहश्च श्रीणीताम् । आयुश्च त्वा जरा च श्रीणीताम् । - - - तै.ब्रा.३.७.९.३

*अश्वमेधे प्रथममहः । एकस्याध्वर्योरेव चतुर्दिक्षु प्रोक्षणस्याभिधानम् :- इन्द्राग्निभ्यां त्वेति दक्षिणतः । इन्द्राग्नी वै देवानामोजिष्ठौ बलिष्ठौ । ओज एवास्मिन्बलं दधाति । तस्मादश्वः पशूनामोजिष्ठो बलिष्ठः ॥ - तै.ब्रा.३.८.७.१

*अश्वमेधे द्वितीयममहः :- ओजो बलं वा एतौ देवानाम् । यदर्काश्वमेधौ । ओजो बलमेवावरुन्धे । - तै.ब्रा.३.९.२१.३

*सावित्रचयनाभिधानम् :-सहस्वान्त्सहीयानोजस्वान्त्सहमानः । जयन्नभिजयन्त्सुद्रविणो द्रविणोदाः । - तै.ब्रा.३.१०.१.३

*सावित्रचयनाभिधानम् । निष्पन्नायाश्चितेरध्वर्योरुपस्थानम् :- तपसो जातमनिभृष्टमोजः । तत्ते ज्योतिरिष्टके । तेन मे तप । - तै.ब्रा.३.१०.३.१

*होतुरनुशंसाभिधानम् :- भूर्भुवः स्व: । ओजो बलम् । ब्रह्म क्षत्त्रम् । - - तै.ब्रा.३.१०.५.१

*नाचिकेताग्निचयनविधिः। इष्टकोपधानमन्त्राः :- ओजोऽसि सहोऽसि । बलमसि भ्राजोऽसि । - - तै.ब्रा.३.११.१.२१

*अन्नहोमार्थो मन्त्रः :- इन्द्रौजसां पते । बृहस्पते ब्रह्मणस्पते । - - - तै.ब्रा.३.११.४.२

*वैश्वसृज चयनाभिधानम् :-ऊर्ग्राजानमुदवहत् । ध्रुवगोपः सहोऽभवत् । ओजोऽभ्यष्टौद्ग्राव्ण: । यद्विश्वसृज आसत ॥ - तै.ब्रा.३.१२.९.५

*अबीष्टका :-वहन्तीर्गृह्णाति । ता उत्तरत उपदधाति । ओजसा वा एता वहन्तीरिवोद्गतीरिव आकूजतीरिव धावन्तीः । ओज एवास्योत्तरतो दधाति । तस्मादुत्तरोऽर्ध ओजस्वितरः । - तै.आ.१.२४.२

*इममग्न आयुषे वर्चसे कृधि तिग्ममोजो वरुण संशिशाधि । मातेवास्मा अदिते शर्म यच्छ विश्वे देवा जरदष्टिर्यथाऽसत् । - तै.आ.२.५.१

*भद्रं पश्यन्त उपसेदुरग्रे । तपो दीक्षामृषयः सुवर्विद: । ततः क्षत्त्रं बलमोजश्च जातम् । तदस्मै देवा अभिसंनमन्तु । - तै.आ.३.११.९

*- - - - - दक्षाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा । ओजसे स्वाहा बलाय स्वाहा । - तै.आ.४.५

*धनुर्हस्तादाददाना मृतस्य श्रियै क्षत्त्रायौजसे बलाय । अत्रैव त्वमिह वयं सुशेवा विश्वा स्पृधो अभिमातीर्जयेम । - तै.आ.६.१.३

*आदित्यो वै तेज ओजो बलं यशश्चक्षुः श्रोत्रमात्मा मनो मन्युः - - - - तै.आ.१०.१४.१

*गायत्री छन्दसां माता इदं ब्रह्म जुषस्व नः । ओजोऽसि सहोऽसि बलमसि भ्राजोऽसि - - - तै.आ.१०.२६.१

*गायत्र्या आवाहनमन्त्रम् :- ओजोऽसि सहोऽसि बलमसि भ्राजोऽसि - - - तै.आ.१०.३५.१

*कर्णयोः श्रोत्रम् । बाहुवोर्बलम् । ऊरुवोरोजः । - तै.आ.१०.७२.१

*सोमानयनम् :- एतद्वै वयसामोजिष्ठं बलिष्ठं - यच्छ~येनः । तमेवैतद्भूतं प्रपातयति - यदाह श्येनो भूत्वा परापतेति । - शतपथ ब्राह्मण ३.३.४.१५

*प्रवर्ग्यकर्मणि तानूनप्त्रम् :- शक्वनऽओजिष्ठाय इति । एष वै शक्वौजिष्ठः । एतस्माऽउ हि गृह्णाति । तस्मादाह - शक्वनऽओजिष्ठायेति । - मा.श.३.४.२.१२

*ते समवमृशन्ति - अनाधृष्टमस्यनाधृष्यं देवानामोजः इति । अनाधृष्टा हि देवा आसन्, अनाधृष्याः- - - -मा.श.३.४.२.१४

*मरुत्वीय ग्रहः :- ते ( मरुतः ) होचुः - अपनिधायैनमोज उपावर्तामहाऽइति । त एनमपनिधायैवौज उपाववृतुः । तद्वाऽइन्द्रोऽस्पृणुत । अपनिधाय वै मौज उपावृतन्निति । स होवाच सहैव मौजसोपावर्तध्वमिति । तेभ्यो वै नस्तृतीयं ग्रहं गृहाणेति । तेभ्य एतं तृतीयं ग्रहमगृह्णात् उपयामगृहीतोऽसि मरुतां त्वोजसे इति । त एनं सहैवौजसोपावर्तन्त । तैर्व्यजयत ।- - - क्षत्रं वाऽइन्द्रः, विशो मरुतः । - मा.श. ४.३.३.९

*- - - एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते । उपयामगृहीतोऽसि मरुतां त्वौजसे इति तृतीयं ग्रहं गृह्णाति । - मा.श.४.३.३.१४

*अतिग्राह्याग्रहाः :- नो ह वाऽइदमग्रऽइन्द्रऽओज आस - यदिदमस्मिन्नोजः । सोऽकामयत । इदं मय्योजः स्यादिति । स एतं ग्रहमपश्यत् । तमगृह्णीत ततोऽस्मिन्नेतदोज आस । नो ह वाऽइदमग्रे सूर्ये भ्राज आस - - - - -मा.श.४.५.४.४

*उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रेऽअवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौजसऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वौजसे इति - मा.श.४.५.४.१०

*पात्रावकाशमन्त्राः :- अथोक्थ्यम् - ओजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व इति । - मा.श.४.५.६.३

*प्रायश्चित्तम् :-यत्रऽइदं किं चार्च्छति - वरुण एवेदं सर्वमार्पयति । ययोरोजसा स्कभिता रजांसि वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा । - - -- -मा.श.४.५.७.७

*तमुपरिष्टाच्छीर्ष्णो निदधाति - ओजोऽसि सहोऽस्यमृतमसि इति । अमृतमायुर्हिरण्यम् । तदस्मिन्नमृतमायुर्दधाति । - मा.श.५.४.१.१४

*अभिषेकोत्तरकर्माणि :- मरुतामोजसे स्वाहा इति । स यदेव मारुतं रथस्य - तदेवैतेन प्रीणाति । - मा.श.५.४.३.१७

*वरुणोऽसि सत्यौजा इति । वीर्यमेवास्मिन्नेतद्दधाति । वरुणमेव सत्यौजसं करोति । - मा.श.५.४.४.१०

*तम् ( भर्गम् ) एताभिर्देवताभिरनुसमसर्पत् । - - - बृहस्पतिना ब्रह्मणा वरुणेनौजसाऽग्निना तेजसा - - - मा.श.५.४.५.२

*अथ वारुणं यवमयं चरुं निर्वपति । स येनैवौजसेमाः प्रजा वरुणोऽगृह्णात् - तेनैव तदोजसा वरुणोऽनुसमसर्पत् । तेनोऽएवैष तदोजसाऽनुसंसर्पति । तत्रैकं पुण्डरीकं प्रयच्छति । - मा.श.५.४.५.१२

*यस्य प्रयाणमन्वन्यऽइद्ययुः इति । - - -देवा देवस्य महिमानमोजसा इति । यज्ञो वै महिमा, देवा देवस्य यज्ञं वीर्यमोजसेत्येतद् । - मा.श.६.३.१.१८

*स्रुगिष्टकाद्वयोपधानम् :- यद्वेव स्रुचाऽउपदधाति । प्रजापतेर्विस्रस्तस्याग्निस्तेज आदाय दक्षिणाऽकर्षत् ।  - - - -अथास्येन्द्र ओज आदायोदङ्ङुदक्रामत् । स उदुम्बरोऽभवत्~ । - मा.श.७.४.१.३९

*अथौदुम्बरीमुत्तरत उपदधाति । इन्द्रस्य त्वौजसा सादयामि इति । यदेवास्य तदिन्द्र ओज आदायोदङ्ङुदक्रामत् - तदस्मिन्नेतत्प्रतिदधाति । - मा.श.७.४.१.४२

*अष्टादश स्तोमेष्टकोपधानम् :-ओजस्त्रिणवः इति । य एव त्रिणवः स्तोमः - तं तदुपदधाति । तद्यत्तमाह - ओज इति । वज्रो वाऽओजः । वज्रस्त्रिणवः । - मा.श.८.४.१.२०

*स्पृदिष्टकोपधानम् :-ओजः स्पृतं, त्रिणवः स्तोमः इति । ओजः प्रजानां त्रिणवेन स्तोमेन पाप्मनो मृत्योरस्पृणोत् । - मा.श.८.४.२.९

*पञ्चम चितेः असपत्नेष्टकोपधानम् :- अथ दक्षिणतः । षोडशी स्तोम ओजो द्रविणम् इति । एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप् । त्रैष्टुमन्तरिक्षम् । - - - मा.श.८.५.१.१०

*पञ्चचूडेष्टकोपधानम् :- स पुरस्तादुपदधाति । अयं पुरो हरिकेशः इति ।- - - - -तस्य रथगृत्सश्च रथौजाश्च सेनानीग्रामण्यौ इति - मा.श.८.६.१.१६

*सौत्रामणी यागः :- मूत्रादेवास्योजोऽस्रवत्स वृकोऽभवत्~ , आरण्यानां पशूनां जूतिः ।- - - -लोहितादेवास्य सहोऽस्रवत्स सिंहोऽभवत्~ , आरण्यानां पशूनामीशः । - मा.श.१२.७.१.८

सौत्रामणी :- वृकलोमानि भवंति । ओज एव जूतिमारण्यानां पशूनामवरुन्धे । व्याघ्र|लोमानि भवन्ति । मन्युमेव राज्यमारण्यानां पशूनामवरुन्धे । सिंहलोमानि भवन्ति । सह एवेशामारण्यानां पशूनामवरुन्धे । - मा.श.१२.७.२.८

*अश्वमेधः :- इन्द्राग्निभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि इति । इन्द्राग्नी वै देवानामोजस्वितमौ । ओज एवास्मिन् दधाति । तस्मादश्वः पशूनामोजस्वितमः । - मा.श.१३.१.२.६

*महावीरादि प्रवर्ग्यपात्र संभरण ब्राह्मणम् :-अथादारान् - इन्द्रस्योजः स्थ इति । यत्र वा एनमिन्द्र ओजसा पर्यगृह्णात् । तदस्य परिगृहीतस्य रसो व्यक्षरत् । - - - - यज्ञस्य हि रसात्संभूताः । अथ यदेनं तदिन्द्र ओजसा पर्यगृह्णात् । तस्मादाह । इन्द्रस्योजः स्थ इति । - मा.श.१४.१.२.१२

*घर्मसन्दीपनं ब्राह्मणम् :- विधृतिरुपरिष्टात् इति - - बृहस्पतेराधिपत्ये इति ।- - - - ओजो मे दाः इति । ओज एवात्मन्धत्ते । तथौजस्वी बलवान् भवति । - मा.श. १४.१.३.२३

*गायत्रब्रह्मोपासना ब्राह्मणम् :- प्राणो वै बलम् । तत्प्राणे प्रतिष्ठितम् । तस्मादाहुः - बलं सत्यादोजीय इति । एवं उ एषा गायत्री अध्यात्मं प्रतिष्ठिता । - मा.श.१४.८.१५.६

*सोमस्य आतिथ्येष्टिः :- ( हे तानूनप्त्राऽऽज्य! ) शक्मन्नोजिष्ठाय त्वा गृह्णाम्यनाधृष्टमस्यनाधृष्यं देवानामोजोऽभिशस्तिपा अनभिशस्तेन्यम् - तैत्तिरीय संहिता १.२.१०.२

*अतिग्राह्यषोडशिग्रहाभिधानम् :- उत्तिष्ठन् ओजसा सह पीत्वा शिप्रे अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौजस्वत एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजस्वते । - तै.सं.१.४.३०.१

*गार्हपत्याहवनीययोरुपस्थानम् :- उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या इत्याहौजो बलमेवावरुन्धे - तै.सं.१.५.७.२

*प्राधान्येनाऽऽज्यग्रहणानुमन्त्रणमन्त्राः :- ब्रह्मणस्त्वा तेजसे यन्त्राय धर्त्राय गृह्णामि क्षत्त्रस्य त्वौजसे यन्त्राय धर्त्राय गृह्णामि विशे त्वा यन्त्राय धर्त्राय गृह्णामि - तै.सं.१.६.१.२

*याज्यापुरोनुवाक्याभिधानम् :-अपां नपातमश्विना ह्वयन्तमस्मिन्नर इन्द्रियं धत्तमोजः । - - - -इन्द्र क्षत्त्रमभि वाममोजोऽजायथा वृषभ चर्षणीनाम् । अपानुदो जनममित्रयन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम् ।  - तै.सं.१.६.१२.४

*राजसूयविषयाणामभिषेकार्थजलविषयमन्त्राणामभिधानम् :-- - - व्रजक्षितः स्थ मरुतामोजः स्थ सूर्यवर्चसः स्थ - - - तै.सं.१.८.११.१

*राजसूयविषयस्य रथेन विजयस्याभिधानम् :- - - - - इन्द्रस्य बलाय स्वाहा मरुतामोजसे स्वाहा - - - तै.सं.१.८.१५.२

*भूतिकामादीनामादित्यचर्वादीष्टिविधिः :- आश्वत्था भवन्ति मरुतां वा एतदोजो यदश्वत्थ ओजसैव विशमव गच्छति सप्त भवन्ति सप्तगणा वै मरुतो - तै.सं.२.३.१.५

*आयुष्कामेष्टिविधिः :- बृहद्रथंतरयोस्त्वा स्तोमेनेत्याहौज एवास्मिन्नेतेन दधाति - तै.सं.२.३.११.४

*भ्रातृव्यवतः स्पर्धमानस्य संवर्गेष्टिविधिः :- न्यतराँ श्चनोपावर्तत ते देवा एतद्यजुरपश्यन्नोजोऽसि सहोऽसि बलमसि भ्राजोऽसि - - - - - इति वाव देवा असुराणामोजो बलमिन्द्रियं वीर्यं प्रजां पशूनवृञ्जत- - - - - - यदेतया देवा असुराणामोजो बलमिन्द्रियं वीर्यम् प्रजां पशूनवृञ्जत तस्मादेताँ संवर्ग इतीष्टिमाहुः - - - - अग्नये संवर्गाय पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेत्तं© शृतमासन्नमेतेन यजुषाऽभिमृशेदोज एव बलमिन्द्रियं वीर्यं प्रजां पशून्भ्रातृव्यस्य वृङœ~ते - तै.सं.२.४.३.३

*चित्रायागस्योपहोममन्त्राः :- अग्ने गृहपते यस्ते घृत्यो भागस्तेन सह ओज आक्रममाणाय धेहि- तै.सं.२.४.५.२

*कारीरीष्टिविधिः :- मारुतमसि मरुतामोजोऽपां धारां भिन्धि (इति अग्नीनन्वाधायापरेणाऽऽहवनीयं दक्षिणाऽतिक्रम्य कृष्णं कृष्णतूषं परिधत्ते ) - तै.सं.२.४.७.१

*कीरीरीष्टिमन्त्रव्याख्यानम् :- मारुतमसि मरुतामोज इति कृष्णं वासः कृष्णतूषं परि धत्त एतद्वै वृष्ट्यै रूपं सरूप एव भूत्वा पर्जन्यं वर्षयति - तै.सं.२.४.९.१

*संवर्गेष्टिहोत्रमन्त्राभिधानम् :-- - - ऊर्मिर्न नावमा वधीत् । नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः । अमैः अमित्रमर्दय । - तै.सं.२.६.११.२

*दीक्षितेन वक्तव्यमन्त्राणां तद्विधीनां चाभिधानम् :- यद्वै दीक्षितमभिवर्षन्ति दिव्या आपोऽशान्ता ओजो बलं दीक्षाम् तपोऽस्य निर्घ्नत्युन्दतीर्बलं धत्तौजो धत्त बलं धत्त - - - - एतदेव सर्वमात्मन्धत्ते नास्योजो बलं न दीक्षां न तपो निर्घ्नन्ति । - तै.सं.३.१.१.२

*अतिग्राह्यगतमन्त्राभिधानम् :-तेजोविदसि तेजो मा मां हासीन्माऽहं तेजो हासिषं मा मां तेजो हासीदिन्द्रौजस्विन्नोजस्वी त्वं देवेषु भूया ओजस्वन्तं वर्चस्वन्तं मनुष्येषु कुरु ब्रह्मणश्च त्वा क्षत्त्रस्य च ओजसे जुहोम्योजोविदस्योजो मा मा हासीन्माऽहमोजो हासिषं मा मामोजो हासीत्सूर्य भ्राजस्विन्भ्राजस्वी - - - -तै.सं.३.३.१.१

*राष्ट}भृन्मन्त्राणां काम्यप्रयोगाभिधानम् :- रथमुख ओजस्कामस्य होतव्या ओजो वै राष्ट}भृत ओजो रथ ओजसैवास्मा ओजोऽव रुन्ध ओजस्व्येव भवति - तै.सं.३.४.८.२

*चतुर्थचितावक्ष्णयास्तोमीयास्येष्टकासु कासांचिदभिधानम् :-- - - योनिश्चतुर्विंशो गर्भा पञ्चविँश ओजस्त्रिणवः - - - तैत्तिरीय संहिता ४.३.८.१

*अवशिष्टाक्ष्णयास्तोमीयास्येष्टकाभिधानम् :-- - - - ऽदित्यै भागोऽसि पूष्ण आधिपत्यमोजः स्पृतं त्रिणवःस्तोमो- - -तै.सं.४.३.९.१

*पञ्चम्यां चितावसपत्नादीष्टकाभिधानम् :- चतुश्चत्वारिंशः स्तोमो वर्चो द्रविण© षोडशः स्तोम ओजो द्रविणं पृथिव्याः पुरीषमसि अप्सो नाम । - तै.सं.४.३.१२.१

*- - - ओजोऽसि पितृभ्यस्त्वा पितॄञ्जिन्व तन्तुरसि प्रजाभ्यस्त्वा प्रजा जिन्व - - - तै.सं.४.४.१.२

*याज्यानुवाक्याभिधानम् :-त्रिवृन्नो विष्ठया स्तोमो अह्नां समुद्रो वात इदमोज पिपर्तु । उग्रा दिशामभिभूतिर्वयोधाः शुचिः शुक्रे अहन्योजसीना । - - - बृहत्साम क्षत्त्रभृद्वृद्धवृष्णियं त्रिष्टुभौजःशमितमुग्रवीरम् । - तै.सं.४.४.१२.१

*अश्वमेधकर्तू रथसज्जीकरणभाविकवचस्वीकाराद्यङ्गाभिधानम् :-दिवः पृथिव्या परि ओज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः । अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज । - तै.सं.४.६.६.६

*आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निष्टनिहि दुरिता बाधमानः । अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुनां इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीडयस्व ॥ - तै.सं.४.६.६.७

*वसोर्धाराद्यभिधानम् :-- - - दक्षश्च मे बलं च मे ओजश्च मे सहश्च म आयुश्च मे जरा च म - - -तै.सं.४.७.१.२

*अश्वमेधसंबन्धि याज्यानुवाक्याभिधानम् :- मन्वे वां मित्रावरुणा तस्य वित्तं सत्यौजसा दृंहणा यं नुदेथे । - तै.सं.४.७.१५.२

*स्वयमातृण्णाद्यभिधानम् :-इन्द्राग्नी वै देवानामोजोभृतावोजसैवैनामन्तरिक्षे चिनुते धृत्यै - तै.सं.५.३.२.१

*अक्ष्यणयास्तोमीयादीनामभिधानम् :- पृथिवी छन्द इति पश्चात्प्रतिष्ठित्या अग्निर्देवतेत्युत्तरत ओजो वा अग्निरोज एवोत्तरतो धत्ते - तै.सं.५.३.२.४

*अक्ष्णयास्तोमीयादीनामभिधानम् :- भान्त पञ्चदश इत्युत्तरत ओजो वै भान्त ओजः पञ्चदश ओज एवोत्तरतो धत्ते - तै.सं.५.३.३.२

*ओजस्त्रिणव इति पश्चादिमे वै लोकास्त्रिणव एष्वेव लोकेषु प्रति तिष्ठति - तै.सं.५.३.३.४

*अक्ष्णयास्तोमीयादीनामभिधानम् :- इन्द्रस्य भागोऽसीत्युत्तरत ओजो वा इन्द्र ओजो विष्णुरोजः क्षत्त्रमोजः पञ्चदश ओज एवोत्तरतो धत्ते - तै.सं.५.३.४.२

*यस्योजस्वतीरुत्तरत ओजस्व्येव भवत्याऽस्योजस्वी जायते - तै.सं.५.३.४.६

*असपत्नविराडाख्येष्टकाभिधानम् :-षोडशः स्तोम इत्युत्तरत ओजो वै षोडश ओज एवोत्तरतो धत्ते - तै.सं.५.३.५.१

*सुदीतिरित्यादित्यानोज इति पितॄंस्तन्तुरिति प्रजाः - तै.सं.५.३.६.१

*उपस्थानाद्यभिधानम् :-गायत्रेण पुरस्तादुप तिष्ठते प्राणमेवास्मिन्दधाति बृहद्रथंतराभ्यां पक्षावोज एवास्मिन्दधाति - तै.सं.५.५.८.१

*आहुत्याद्यभिधानम् :- बाहुवोर्बलमूरुवोरोजोऽरिष्टा विश्वान्यङ्गानि - तै.सं.५.५.९.२

*सर्पाहुत्याद्यभिधानम् :- ओजस्विनी नामासि दक्षिणा दिक्तस्यास्त इन्द्रोऽधिपतिः पृदाकुः प्राची - - - तै.सं.५.५.१०.१

*कुम्भेष्टकामन्त्रणार्थमन्त्राभिधानम् :- सर्वां अग्नींरप्सुषदो हुवे वो मयि वर्चो बलमोजो नि धत्त । - तै.सं.५.६.१.२ं

*द्वंद्विपश्वभिधानम् :- इन्द्राग्निभ्यामोजोदाभ्यामुष्टारा - - - - तै.सं.५.६.२१.१

*भद्रं पश्यन्त उप सेदुरग्रे तपो दीक्षामृषयः सुवर्विद । ततः क्षत्त्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा अभि सं नमन्तु । - तै.सं.५.७.४.३

*ओजो ग्रीवाभिर्निर्ऋतिमस्थभिः - तै.सं.५.७.१८.१

*तानूनप्त्रेष्ट्यभिधानम् :- शक्मन्नोजिष्ठायेत्याहौजिष्ठं हि ते तदात्मनः समवाद्यन्तानाधृष्टमस्यनाधृष्यमित्याहानाधृष्टं ह्येतदनाधृष्यं देवानामोजः इत्याह देवानां ह्येतदोजो- - -तै.सं.६.२.२.३

*मरुत्वतीयमाहेन्द्रग्रहकथनम् :- ओजोभृतौ वा एतौ देवानां यदिन्द्राग्नी यदैन्द्राग्नो गृह्यते ओज एवाव रुन्धे - तै.सं.६.५.५.१

*पश्वेकादशिनीकथनम् :- विश मारुतेनोजो बलमैन्द्राग्नेन - तै.सं.६.६.५.२

*स्तोमानां संभूयकारित्वकथनम् :- पञ्चदशेनौजसा वीर्येण - तै.सं.७.१.२.१

*त्रैष्टुभमुत्तर ओजो वै वीर्यं त्रिष्टुबोज एव वीर्यमात्मन्धत्ते - तै.सं.७.१.४.२

*अन्यच्चतुर्दशरात्रकथनम् :- ओजो वै वीर्यं पृष्ठान्योज एव वीर्यं मध्यतो दधते - तै.सं.७.३.५.३

*पञ्चदशरात्रकथनम् :- ओजो वै वीर्यं पृष्ठानि पशवश्छन्दोमा ओजस्येव वीर्ये पशुषु प्रति तिष्ठन्ति - तै.सं.७.३.६.२

*द्वितीयपञ्चदशरात्रकथनम् :- पञ्चदशरात्रेणौजो बलमिन्द्रियं वीर्यमात्मन्नधत्त- - -एता एव पशव्याः पञ्चदश वा अर्धमासस्य रात्रयो ऽर्धमासशः संवत्सर आप्यते - तै.सं.७.३.७.१

*यदन्यतः पृष्ठानि स्युर्विविवधं स्यान्मध्ये पृष्ठानि भवन्ति सविवधत्वायौजो वै वीर्यं पृष्ठान्योज एव वीर्यं मध्यतो दधते - तै.सं. ७.३.७.३

*देवता एव पृष्ठैरव रुन्धते पशूञ्छन्दोमैरोजो वै वीर्यं पृष्ठानि पशवश्छन्दोमा ओजस्येव वीर्ये पशुषु प्रति तिष्ठन्ति - तै.सं.७.३.८.२

*मध्ये पृष्ठानि भवन्ति सविवधत्वायौजो वै वीर्यं पृष्ठान्योज एव वीर्यं मध्यतो दधते - तै.सं.७.३.९.३

*प्रथमचतुर्विशतिरात्रकथनम् :- देवता एव पृष्ठैरव रुन्धते पशूञ्छन्दोमैरोजो वै वीर्यं पृष्ठानि पशवश्छन्दोमा ओजस्येव वीर्ये पशुषु प्रति तिष्ठन्ति - तै.सं.७.४.१.२

*द्वितीयचतुर्विंशतिरात्रकथनम् :- देवता एव पृष्ठैरव रुन्धते पशूञ्छन्दोमैरोजो वै वीर्यं पृष्ठानि पशवः छन्दोमा ओजस्येव वीर्ये पशुषु प्रति तिष्ठन्ति - तै.सं.७.४.२.३

*षट्त्रिंशद्रात्रकथनम् :-देवता एव पृष्ठैरव रुन्धते पशूञ्छन्दोमैरोजो वै वीर्यं पृष्ठानि पशवश्छन्दोमा ओजस्येव वीर्ये पशुषु प्रति तिष्ठन्ति - तै.सं.७.४.६.२

*त्रिष्टुभौ वीर्यकामः कुर्वीत । ओजो वा इन्द्रियं वीर्यं त्रिष्टुप् । - ऐतरेय ब्राह्मण १.५

*ते वा असुरा इमानेव लोकान्पुरोऽकुर्वत यथौजीयांसो बलीयांस एवं ते वा अयस्मयीमेवेमामकुर्वत - - - - - - ऐ.ब्रा.१.२३

*त्रैष्टुभो वै राजन्य ओजो वा इन्द्रियं वीर्यं त्रिष्टुपबोजसैवैनं तदिन्द्रियेण वीर्येण समर्धयति । - ऐ.ब्रा.१.२८

*ते देवा अबिभयुरादातारो वै न इमं प्रातर्यज्ञमसुरा यथौजीयांसो बलीयांस एवमिति तानब्रवीदिन्द्रो मा बिभीत त्रिषमृद्धमेभ्योऽहं प्रातर्वज्रं प्रहर्ताऽस्मि - - - - ऐ.ब्रा.२.१६

*वाक्च वै प्राणापानौ च वषट्कारस्य एते वषट्कृते वषट्कृते व्युत्क्रामन्ति ताननुमन्त्रयेत वागोजः सह ओजो मयि प्राणापानाविति - ऐ.ब्रा.३.८

*धारावरा मरुतो धृष्ण्वोजस इति मारुतं बह्वभिव्याहृत्यम् अन्तो वै बह्वन्तस्तृतीयमहः - ऐ.ब्रा.५.२

*प्रउग शस्त्र :- - - -यावत्तरस्तन्वो३यावदोजः - ऐ.ब्रा.५.१८

*तं विश्वेदेवा ऊचुरिन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठः सहिष्ठः सत्तमः - - -तं नु स्तुहि - ऐ.ब्रा.७.१६

*मरुत्वतीये शस्त्रे निविद्धानीयं सूक्तं :- मन्द्र ओजिष्ठ इत्योजस्वत्तत्क्षत्रस्य रूपं - - - -ओजो वा इन्द्रियं वीर्यं त्रिष्टुबोजः क्षत्त्रं वीर्यं राजन्यस्तदेनमोजसा क्षत्त्रेण वीर्येण समर्धयति - ऐ.ब्रा.८.२

*निष्केवल्य शस्त्रे निविद्धानीयं सूक्तं :- तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजा इति सूक्तमभिवदभिभूत्यै रूपम् - ऐ.ब्रा.८.३

*तत्पञ्चदशर्चं भवत्योजो वा इन्द्रियं वीर्यं पञ्चदश ओजः क्षत्त्रं वीर्यं राजन्यस्तदेनमोजसा क्षत्त्रेण वीर्येण समर्धयति - ऐ.ब्रा.८.३

*उक्थ्य एवायं पञ्चदशः स्यादित्याहुरोजो वा इन्द्रियं वीर्यं पञ्चदश ओजः क्षत्त्रं वीर्यं राजन्यस्तदेनमोजसा क्षत्त्रेण वीर्येण समर्धयति - ऐ.ब्रा.८.४

*सर्वाf अग्नीfरप्सुषदो हुवे वो मयि वर्चो बलमोजो निधत्तेति - ऐ.ब्रा.८.६

*ते देवा अब्रुवन्सप्रजापतिका अयं वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठः सहिष्ठः सत्तमः पारयिष्णुतम इममेवाभिषिञ्चामहा इति - ऐ.ब्रा.८.१२

*वावृधानः शवसा भूर्योजा इति एष वै वावृधानः शवसा भूर्योजाः । - ऐतरेय आरण्यक १.३.४

*तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजाः सुत इत्त्वं निमिश्ल - - - ऐतरेय आरण्यक ५.२.२

*यद्यज्ञ उल्बणं क्रियते तदप उपनिनयेद्ययोरोजसा स्कभिता रजांसि वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा - - - षड्विंश ब्राह्मण १.५.१५

*एतस्यां वा एकादशिन्यामादित्याः सूर्यमजनयन् । स तेजो ब्रह्मवर्चसमवरुन्धते । ओजस्वी ब्रह्मवर्चसी भवति । य एवं वेद । - षड्विंश ब्राह्मण ४.१.२०

*एष वै वज्राणामोजिष्ठो यत्साम वज्र: । - षड्विंश ब्राह्मण ४.२.८

*विष्टुतिः :- ब्रह्मणो वा आयतनं प्रथमा क्षत्रस्य मध्यमा विश उत्तमा, यत् प्रथमा भूयिष्ठा भाजयति ब्रह्मण्येव तदोजोवीर्य्यन्दधाति - ताण्ड~य ब्राह्मण १.८.२

*ओजोसि पितृभ्यस्त्वा पितॄञ्जिन्व सवितृप्रसूता बृहस्पतये स्तुत - ताण्ड~य ब्राह्मण १.९.१२

*तामेतामाभिप्रतारिणा उपासते तस्मात्त ओजिष्ठा स्वानाम् - तां.ब्रा.२.९.४

*विष्टुतयः :- यत् पञ्चदशिन्यौ पूर्वे भवतश्चतुर्द्दशोत्तमा ब्रह्मणि चैव तत् क्षत्रे चौजो वीर्य्यं दधाति - तां.ब्रा.३.९.२

*विश्वा दधान ओजसेत्योजसैवास्मै वीर्य्येण विशं परस्तात्परिगृह्णाति - तां.ब्रा.६.१०.११

*ओजसा वा एतद्वीर्य्येण प्रदीयते यदप्रत्तं भवति यद्वृष्ण: सुतस्योजस इत्याहौजसैवास्मै वीर्य्येण दिवो वृष्टिं प्रयच्छति - तां.ब्रा.६.१०.१८

*इदं ह्यन्वोजसेति माधुछन्दसं प्रजापतेर्व्वा एषा तनूरयातयाम्नी प्रयुज्यते - तां.ब्रा.९.२.१७

*ऐयाहा इति वा इन्द्रो वृत्रमहन्नैयादोहोवेति न्यगृह्णाद्वार्त्रघ्नेÀv सामनी वीर्यवती । ओज एवैताभ्यां वीर्य्यमवरुन्धे । पञ्चदश एव स्तोमो भवत्योजस्येव तद्वीर्य्ये प्रतितिष्ठत्योजो वीर्यं पञ्चदशः । - तां.ब्रा.११.११.१४

*ओजो वीर्य्यं त्रिष्टुबोजस्येव वीर्य्ये पराक्रम्य प्रयन्ति - तां.ब्रा.१४.१.६

*प्रजापति प्रजा असृजत तां अस्मात् सृष्टा अबला इवाछदयंस्तास्वेतेन साम्ना दक्षायेत्योजोवीर्य्यमदधाद्यदेतत् साम भवत्योज एव वीर्य्यमात्मन्धत्ते । - तां.ब्रा.१४.५.१३

*एकादशाक्षरणिधनो भवत्येकादशाक्षरा त्रिष्टुबोजोवीर्य्यं त्रिष्टुबोजस्येव वीर्य्यं प्रतितिष्ठति - तां.ब्रा.१४.५.१९

*चतुश्चत्वारिंश एव स्तोमो भवत्योजस्येव तद्वीर्य्ये प्रतितिष्ठत्योजोवीर्य्यं त्रिष्टुप् । - तां.ब्रा.१४.७.१०

*तृतीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं तृचं :-पुरां भिन्दुर्य्युवकविरमितौजा अजायतेन्द्रो विश्वस्य कर्म्मणो - - - तां.ब्रा.१४.१२.३

*चतुश्चत्वारिंश एव स्तोमो भवत्योजस्येव तद्वीर्य्ये प्रतितिष्ठत्योजो वीर्य्यं त्रिष्टुप् । - तां.ब्रा.१४.१२.१०

*त्रैककुभं ( साम ) भवति । ओजस्येव तद्वीर्य्ये प्रतितिष्ठत्योजोवीर्य्यन्त्रैककुभं - तां.ब्रा.१५.६.५

*पञ्चदशेनातिरात्रेण वीर्य्यकामो यजेतौजो वीर्य्यं पञ्चदश ओज एव वीर्य्यमवरुन्ध ओजसि वीर्य्ये प्रतितिष्ठति - तां.ब्रा.२०.१०.१

*इन्द्राग्नी वै देवानामोजिष्ठा ओजिष्ठा भवन्ति य एता उपयन्ति - तां.ब्रा.२४.१७.३, २५.११.३

*तम् अश्वम् एतयर्चाज्याहुत्याभ्यजुहोत् - इन्द्रस्योजो मरुतामनीकम् इति - गोपथ ब्राह्मण १.२.२१

*ते देवा अब्रुवन् - इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठः । तस्मा एनत् परिहरतेति । - गो.ब्रा.२.१.३

*शाक्वरायेत्याह । शक्त्यै हि ते तां समवाद्यन्त । शक्मन ओजिष्ठायेत्याह ओजिष्ठं हि ते तदात्मनः समवाद्यन्त । - - - - - -देवानामोज इत्याह । देवानां ह्येतदोजः । - गो.ब्रा.२.२.३

*ओजोऽसि, पितृभ्यस्त्वेति । बलमेव तत् पितॄननुसंतनोति - गो.ब्रा.२.२.१३

*तदु ह स्माह दीर्घमेवैतत् सदप्रभ्वोजः सह ओज इत्यनुमन्त्रयेत । ओजश्च ह वै सहश्च वषट्कारस्य प्रियतमे तन्वौ । प्रियाभ्यामेव तत् तनूभ्यां समर्धयति । - गोपथ ब्राह्मण २.३.५

*वाक् च वै प्राणापानौ च वषट्कारः । ते वषट्कृते वषट्कृते व्युत्क्रामन्ति । ताननुमन्त्रयते - वागोजः , सह ओजो, मयि प्राणापानाविति । - गो.ब्रा.२.३.६

*यदेव - इन्द्राय मद्वने सुतम् , इदं वसो सुतमन्धः, इदं ह्यन्वोजसा सुतम् इति स्तुवन्ति च शंसन्ति च, तेन रात्रिः पवमानवती । - गो.ब्रा.२.५.३

*त्रिवृता ब्रह्मवर्चसेन पञ्चदशायौजसे वीर्याय ज्योतिर् अदधुः । पञ्चदशेनौजसा वीर्येण सप्तदशाय प्रजायै पशुभ्यः प्रजननाय ज्योतिर् अदधुः । - जैमिनीय ब्राह्मण १.६६

*गायत्री ब्रह्मवर्चसम् ओजो वीर्यं त्रिष्टुप् प्रजननं जगती । ब्रह्मवर्चस्य् ओजस्वी वीर्यवान् प्रजया पशुभिर् जायते य एवं वेद । - जैमिनीय ब्राह्मण १.९३

*इदं ह्य् अन्व~ ओजसा इति घृतश्चुन्निधनम् । - जै.ब्रा.१.२२४

*त्रिष्टुप्स्व् ओजस्कामः वीर्यकामः । ओजो वै वीर्यं त्रिष्टुप् । ओजस्व्य् एव वीर्यवान् भवति । - जै.ब्रा.१.२२९

*तेजो वै ब्रह्मवर्चसं त्रिवृत् स्तोम ओजो वीर्यं पञ्चदशः । ओजसैव तद् वीर्येण प्रतिष्ठाय तेजो ब्रह्मवर्चसं हरति य एवं वेद । - जै.ब्रा.१.२५३

*सा जगती प्रथमोदपतद् ओजिष्ठा बलिष्ठा भूयिष्ठा वीर्यवत्तमा मन्यमाना । - जै.ब्रा.१.२८७

*एकविंशेन प्रतिष्ठाकामस् , त्रिणवेनौजस्कामस् , त्रयस्त्रिंशेन श्रीकामः । - जै.ब्रा.२.१३६

*वावृधानश् शवसा भूर्योजाश् शत्रुर् दासाय भियसं दधातीतीन्द्रो ह सः । - जै.ब्रा.२.१४४

*त (देवाः ) एतं यज्ञम् अपश्यन् । तम् आहरन् । तेनायजन्त । ततो वै त ओजिष्ठा बलिष्ठा भूयिष्ठा वीर्यवत्तमा देवानाम् आसन्न् , अजयन् स्वर्गं लोकम् । ओजिष्ठो बलिष्ठो भूयिष्ठो वीर्यवत्तम स्वानां भवति -  - - - - - तेन हैतेनैकयावा कांदम ईजे । स हौजिष्ठश् चैव बलिष्ठश् च भूयिष्ठश् च वीर्यवत्तमश् च स्वानाम् आस, जिगाय वा लोकं न वा । - जै.ब्रा.२.१७५

*अथाकामयत भरद्वाज - ओजिष्ठा मे बलिष्ठा प्रजा स्याद् इति । स एतं पञ्चदशं स्तोमम् अपश्यत् । -- - - - - ओजो वै बलं पञ्चदश स्तोमानाम् । ततो वै तस्योजिष्ठा बलिष्ठा प्रजाभवत्~ । - जै.ब्रा.२.२१७

*तेजो वै ब्रह्मवर्चसं त्रिवृत् स्तोम, ओजो वीर्यं पञ्चदशो, ऽन्नं सप्तदशः - जै.ब्रा.२.३३२

*उभे प्रतिपदौ भवत्, उभे ह्य् अत्र सामनी क्रियेते । तर्ह्य् अथौजिष्ठौ बलिष्ठौ वहिष्ठौ संपादयिष महान्तम् अध्वानं संयुज्योपप्रेयात् तादृक् तत् । - जै.ब्रा.२.३७९

*मरुतो वा अकामयन्तौजिष्ठा बलिष्ठा भूयिष्ठा वीर्यवत्तमा देवानां स्याम, जयेम स्वर्गं लोकम् इति । त एतत् सामापश्यन् । तेनास्तुवत । - जै.ब्रा.३.२३७

*पुरां भिन्दुर् युवा कविर् अमितौज अजायत । - जै.ब्रा.३.२३८

*अथ यस्माद् दवीयस् सन् ज्यायस्तोमम् उत्तमम् अहस् तस्माद् असाव~ आदित्यो दवीयस् सन्न् ओजीयस् तपति - जै.ब्रा.३.३१८

*अश्वाद् इयायेति यद्वदन्त्य~ ओजसो जातम् उत मन्य एनम् । -- - - - - इत्य् ओजसो ऽन्वाहं जातं मन्य इति होवाच । - जै.ब्रा.३.३६५

*अग्न्याधेयम् :-अथ मुञ्जकुलायमाहरति या त अग्न ओजस्विनी तनूरोषधीषु प्रविष्टा । तां त इह संभरामीति - बौधायन श्रौत सूत्र २.६

*अग्निष्टोम प्रातः सवनम् :- - - - शाक्वराय त्वा गृह्णामि शक्मन्नोजिष्ठाय त्वा गृह्णामीति स यावन्त ऋत्विजस्त एनत्समवमृशन्त्यनाधृष्टमस्यनाधृष्यं देवानामोजो ऽभिशस्तिपा - - - बौ.श्रौ.सू.६.१९

*अग्निचयनम् :-स य एवैष उखायै संतापाज्जायते तस्मिन्मुञ्जकुलायमवदधाति या ते अग्न ओजस्विनी तनूरोषधीषु प्रविष्टा - - - बौ.श्रौ.सू.१०.१३

*अग्निचयनम् :-समीची नामासि प्राची दिगिति पश्चादासीनः पूर्वे बिले जुहोत्योजस्विनी नामासि दक्षिणा दिगित्युत्तरत आसीनो दक्षिणे बिले जुहोति -- - - - - बौ.श्रौ.सू.१०.४९

*औपानुवाक्यम् :-अथैन्द्रं गृह्णात्युत्तिष्ठन्नोजसा सहेत्यनुद्रुत्योपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौजस्वते जुष्टं गृह्णामीति - बौ.श्रौ.सू.१४.११

*एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजस्वत इत्यथैनं होष्यन्नवेक्षत इन्द्रौजस्विन्नोजस्वी त्वं देवेषु भूया ओजस्वन्तं मामायुष्मन्तं वर्चस्वन्तं मनुष्येषु कुर्विति जुहोति ब्रह्मणश्च त्वा क्षत्रस्य चौजसे जुहोमीति हुत्वा वाचयत्योजोविदस्योजो मा मा हासीन्माहमोजो हासिषं मा मामोजो हासीदिति भक्षयति - बौ.श्रौ.सू.१४.११

*औपानुवाक्यम् :-अथ वै भवति रथमुख ओजस्कामस्य होतव्या इत्योजकामस्य - - - - - - -राष्ट्रभृतो जुहोत्योजो वै राष्ट्रभृत ओजो रथ ओजसैवास्मा ओजो ऽवरुन्द्ध ओजस्व्येव भवति - बौ.श्रौ.सू.१४.१७

*ओदनसवः :- अथैतद्राजतं पात्रं याचति - - - -इन्द्राय त्वौजस्वत ओजस्वन्तं श्रीणामीत्योजो ऽसीति राजन्याय प्रयच्छति - - - -अथ यजमानो मुखं विमृष्ट ओजस्वदस्तु मे मुखमोजस्वच्छिरो अस्तु मे । ओजस्वान्विश्वतः प्रत्यङ्ङोजसा संपिपृग्धि मेति । - बौ.श्रौ.सू.१८.९

*चतुरो ग्रहान्गृह्णाति- - - -अपां य ऊर्मौ रसस्तमहमस्मा आमुष्यायणायौजसे वीर्याय गृह्णामीति नैयग्रोधेन - - - -- - - - -बौ.श्रौ.सू.१८.१०

*इन्द्राग्निभ्यामोजोदाभ्यामुष्टाराविति - बौ.श्रौ.सू.२६.११

*ओदनेनान्नाद्यकामस्य तण्डnलैरोजस्कामस्य । - आपस्तम्ब श्रौत सूत्र ६.१५.१

*माहेन्द्रं शुक्रपात्रेण गृह्णाति । महाँ इन्द्रो य ओजसेति ग्रहणसादनौ । - आप.श्रौ.सू.१३.८.४

*इन्द्रौजस्विन्नित्यैन्द्रं नेष्टा हुत्वौजोविदसीत्यनुमन्त्रयते । - आप.श्रौ.सू.१३.८.९

*यदि कामयेत क्षत्रं विश ओजीयः स्यादित्यग्निष्ठाद्दक्षिणान्वर्षीयसो मिनुयात् - आप.श्रौ.सू.१४.६.८

*अधिपति स्थौजस्वानादित्यानां वो देवानां देवताभिर्गृह्णामि - - - क्षत्रभृत स्थौजस्विनीर्मित्रावरुणयोर्वो ब्रह्मणा देवताभिर्गृह्णामि । - आप.श्रौ.सू.१६.३३.१

*यदि कामयेत क्षत्रं विश ओजीयः स्यादिति ग्रामेऽनुवाक्यस्य त्रीणि चत्वारि वा पदान्यनुद्रुत्या- - - -। यदि कामयेत विट् क्षत्रादोजीयसी स्यादिति यथासमाम्नातमादितस्त्रिभिर्गणैर्हुत्वा - - - आप.श्रौ.सू.१७.१७.१

*त्रयस्त्रिंशतमोजस्कामा वीर्यकामा वा । - आप.श्रौ.सू.२१.१.१४

*मरुतां चतुर्थेनौजो वीर्यमाप्नोति - आप.श्रौ.सू.२२.५.१७

*त्रिणव ओजस्कामः । - आप.श्रौ.सू.२२.६.१९

*ऐन्द्रेणौजस्कामः । - आप.श्रौ.सू.२२.२३.३

*ऐन्द्रं षोडशरात्रमोजस्कामा उपेयुः । - आप.श्रौ.सू.२३.२.११

*सप्तमेनात्यन्याः प्रजा भवन्त्योजिष्ठा भवन्ति । - आप.श्रौ.सू.२३.८.६

*अत्यन्याः प्रजा भवन्त्योजिष्ठा भवन्ति । - आप.श्रौ.सू.२३.१३.८

*ज्योतिष्टोमे सोमभक्ष प्रकरणम् :- ओजसे त्वेन्द्रियाय भक्षयामीति माध्यन्दिने । - शांखायन श्रौत सूत्र ७.५.१३

*दशरात्रे द्वितीयमहः :- इन्द्रौजस्विन्नोजस्वी त्वं देवेष्वस्योजस्व्यहं मनुष्येषु भूयासमित्यतिग्राह्यं भक्षयति - शां.श्रौ.सू.१०.३.१०

*अभिप्लवषडह प्रकरणम् :- अग्न ओजिष्ठमित्याज्यं पञ्चमस्य ( अभिप्लविकस्य )। - शां.श्रौ.सू.११.८.१

*स्वरसामप्रकरणम् :-आ यज्ञैर्बृहद्वयोऽग्न ओजिष्ठमित्याज्यानि । - शां.श्रौ.सू.११.११.७

*होत्रकशस्त्र प्रकरणम् :- य ओजिष्ठ इति तृतीये ( ऽहनि ) - शां.श्रौ.सू.१२.५.७

*वागोजः सह ओजो मयि प्राणापानाविति वषट्कारमुक्त्वोक्त्वानुमन्त्रयते । - आश्वलायन श्रौत सूत्र १.५.१७

*महाँ इन्द्रो यो ओजसा - - - - आश्व.श्रौ.सू.१.६.१

*त्रिवृन्नो विष्टया स्तोमो अह्नां समुद्रो वात इदमोजः पिपर्तु ॥ उग्रा दिशामभिभूतिर्वयोधाः शुचिः शुक्रे अहन्योजसीनाम् - आश्व.श्रौ.सू.४.१२.२

*इन्द्र षोळशिन्नोजस्विंस्त्वं देवेष्वस्योजस्वन्तं मामायुष्मन्तं वर्चस्वन्तं मनुष्येषु कुरु । - आश्व.श्रौ.सू.६.३.२३