पुराण विषय अनुक्रमणिका(ए-अः) Purana Subject Index

Syllable a has also been equated with Rigveda. As has been stated under the comments on Rigveda, the idol of Rigveda has been depicted as holding a rosary of beads in her hand. Every conscious being in this world is a bead, while there is a consciousness which permeates all these beads. If this permeating consciousness is not there, or if one does not feel this permeating consciousnes, the play of the world will be like the play of dice( about which Einstein says that God does not play dice). What can be done so that one may feel it? The first requirement is that one should properly develop the bead or the dice. Though every animate object is a bead, but the orientation of individual molecules inside the bead are randomly scattered. One can learn from metal iron, whose atoms, if properly oriented, can form a strong magnet which attracts magnetic lines of forces from outside. The pious side of nature(Dr. Lakshminarayan Dhoot divides nature into three types - pious, semi- pious and dark) is constantly trying to orient the beads, but if it is loaded with worldly matter, it may not happen so. When beads have been developed properly, then one may feel the pervading consciousness.

  Regarding syllabel u, this has been equated with holding the breath, with Yajurveda, with Dakshinaagni in sacrifice, with womb etc. The nature of this syllable can be guessed on the basis of initial mantra of Yajurveda. This mantra indicates that one has to transform unconsciousness mind into conscious one. Rajneesh in his lecture series has repeatedly pointed out how one has to practice for achieving this goal. One has to do the acts with conscious mind which were earlier being done with unconsciousness mind, say eating, walking etc. If one is able to transform like this, he may succeed in creating a wish fulfilling tree, which seems to be the aim of Yajurveda. The story related with Dakshinaagni is of king Nala and Damayanti. Word Dama itself indicates that one has to get satisfied with the sequence of events in which they are occurring  naturally. One is not supposed to revolt against these. And this can not happen until one has mastered the art of dice and play of dice, just like king Nala who learnt how the leaves of a tree can be enumerated with an arrow.One story indicates the difficulty : the difficulty is that some sins are so heavy that their impressions  can not be erased from the unconsciousness mind. Special efforts have to be made to erase these. Regarding equation of syllable u  with hold of breath, the hold is possible when one destroys the extrovert consciousness, just like Kuber.

  Regarding syllable m, this has been explained with the sequence of letters of Devanaagari. The earlier 24 letters are symbolic of 24 elements of consciousness, while the last one, m, is symbolic of Atma. This syllable has been equated with releasing of breath. In the same way, one has to release grosser elements from pure Atma. There is a story that one king felt hungry even after going to heaven, and in order to satisfy his hunger, he was instructed to eat his sacred body lying on the earth. This story indicates that the higher self is assisted by the lower self. Lower self provides a sort of food for the higher self. If higher self has not ripened, it will need food from the lower self. Once it has ripened, the lower self can be discarded. In Soma yaaga, syllable m is represented by Aahavaneeya fire whose broad form is a place where soma is extracted from soma plant and offered to gods. At Aahavaneeya level, soma plant remains unutilized.

  Regarding half - syllable, this is represented by Uttara vedi in Soma yaaga. All rituals of temples seem to be an explanation/expansion of this half syllable.



टिप्पणी : नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद और नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद आदि में ओंकार के वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि ओंकार में अ, उ तथा म नाम से तीन मात्राएं हैं और इसके अतिरिक्त कोई अर्धमात्रा है । यह अर्धमात्रा नृसिंह है, ईश्वर है । अ, उ, म का तादात्म्य वैदिक याग में गार्हपत्य, अन्वाहार्यपचन और आहवनीय अग्नियों से, अथवा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद से स्थापित किया गया है । लेकिन अर्धमात्रा के संदर्भ में बहुत कम कहा गया है । गोपथ ब्राह्मण में अर्धमात्रा को अथर्ववेद कहा गया है । स्पष्ट है कि यदि अ, उ तथा म क्रमशः गार्हपत्य, अन्वाहार्यपचन और आहवनीय अग्नियां हैं तो सोमयाग में उत्तरवेदी को अर्धमात्रा का रूप समझा जा सकता है । ऐसा अनुमान है कि मन्दिरों में जो ईश्वर आराधना का स्वरूप प्रचलित है, वह सब या तो अर्धमात्रा का रूप है, अथवा इन चारों का एकीकृत रूप है जिसे एकाक्षर ओ कहा जाता है । लेकिन वहां अ, उ, म अनुपस्थित हैं । अतः अ, उ, म को समझना भक्ति की पूर्णता के लिए अनिवार्य है । प्रस्तुत टिप्पणी में विशेष रूप से अ, उ तथा म मात्राओं को समझने का प्रयास किया जाएगा ।


  जाबालदर्शनोपनिषद ६.२ में प्रणव का तादात्म्य प्राणायाम से स्थापित किया गया है । प्राणायाम के पूरक, कुम्भक और रेचक यह तीन चरण होते हैं । इन तीन चरणों का तादात्म्य प्रणव की तीन मात्राओं अ, उ तथा म से किया गया है । अ से वायु का पूरण किया जाता है , उ से धारण या कुम्भक और म से रेचन या विसर्जन । यह कहा जा सकता है कि प्राणायाम के तीन स्तर ओंकार/प्रणव की तीन मात्राओं को समझने का सबसे सरल उपाय है । प्राणायाम में पूरण, धारण और रेचन को उत्तरोत्तर गम्भीर अर्थों में समझने की आवश्यकता है । लिङ्ग पुराण १.१७.५१ में अकार, उकार व मकार को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु व शिव कहा गया है । ब्रह्मा का कार्य सृष्टि करना है । सृष्टि का अर्थ होगा जड पदार्थ में चेतना का समावेश करना । जैसा कि सर्वविदित है, ब्रह्मा की इस सृष्टि में जड पदार्थ में चेतना का प्रवेश अलग - अलग स्तरों पर हुआ है । यही सृष्टि की विविधता है । अतः जब जाबालदर्शनोपनिषद में प्राणायाम के माध्यम से अकार का अर्थ प्राणों का, श्वास का आदान किया जाता है तो उसको पुराणों के माध्यम से जड पदार्थ में चेतना के समावेश के रूप में समझा जा सकता है । लेकिन अकार के सम्बन्ध में इतना कहना पर्याप्त नहीं है । लिङ्ग पुराण १.१७.५१ तथा शिव पुराण ६.३.११ में अकार को बीज, उकार को योनि और मकार को बीजी कहा गया है । बीज में चेतना सुषुप्ति अवस्था में रहती है । जब बीज को अनुकूल परिस्थितियां मिलती हैं, वह चेतना प्रस्फुटित हो जाती है । लेकिन ओंकार के अकार में बीज का प्रस्फुटित हो जाना अपेक्षित नहीं है, अपितु प्रस्फुटित चेतना का बीज बन जाना अपेक्षित है । हमारी जो चेतना बहिर्मुखी हो रही है, उसका अन्तर्मुखी होना आवश्यक है । उसके पश्चात् विशेष प्रयत्नों द्वारा उस चेतना को प्रस्फुटित करना है । यह तथ्य पद्म पुराण २.८५ में ओंकारेश्वर क्षेत्र के माहात्म्य के अन्तर्गत दिव्या देवी के आख्यान की व्याख्या करता है । कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है कि एक राजा की कन्या दिव्या देवी है जिसके पति विवाह होने से पहले ही मर जाते हैं । इस कारण दिव्या देवी रोदन कर रही है । पतियों के मरने का कारण यह है कि पूर्व जन्म में वह एक वेश्या थी जो अन्य स्त्रियों को वेश्यावृत्ति के लिए प्रोत्साहित करती थी । राजा की कन्या के रूप में जन्म लेने का कारण यह है कि उसने ग्रीष्म ऋतु में गर्मी से त्रस्त एक सिद्ध पुरुष की सेवा की थी जिसके कारण वह राजा की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई । दिव्या देवी के दुःख की निवृत्ति का उपाय यह बताया गया कि वह वासुदेव शत नाम का जप करे और अशून्यशयन व्रत करे । वासुदेव का अर्थ यह बताया गया है कि वासुदेव वह है जिसमें सब वासनाएं निहित हो जाती हैं । अशून्यशयन व्रत का रहस्य यह है कि चातुर्मास में विष्णु लक्ष्मी के साथ शयन करते हैं । यहां लक्ष्मी को प्रकृति और विष्णु को पुरुष रूप में समझा जा सकता है । जब प्रकृति पुरुष के साथ जुडी रहती है, तभी सम्यक् रूप से ऊर्ध्वमुखी विकास सम्भव है । और शयन का अर्थ अन्तर्मुखी वृत्ति लिया जा सकता है । दिव्या देवी की कथा में वेश्या का अर्थ बहिर्मुखी वृत्ति लिया जा सकता है जो किसी सिद्ध पुरुष के सम्पर्क में आने पर अन्तर्मुखी हो सकती है । तब वह दिव्या देवी कहलाएगी ।





  यह जानना महत्त्वपूर्ण होगा कि अर्धमात्रा की स्थिति में अकार का बृहत् स्वरूप क्या होगा । इस बृहत् स्वरूप को सोमयाग के माध्यम से समझा जा सकता है । सोमयाग के पहले चरण में गार्हपत्य, अन्वाहार्यपचन और आहवनीय अग्नियों का अस्तित्व होता है जिनका तादात्म्य क्रमशः अ, उ तथा म से किया जाता है । सोमयाग का दूसरा चरण उत्तरवेदी का निर्माण होता है जिसे अर्धमात्रा कहा जा सकता है । उत्तरवेदी में गार्हपत्य अग्नि का बृहत् स्वरूप सदोमण्डप होता है जिसमें वेदपाठी ऋत्विज गण विराजमान होकर मन्त्रों का उच्चारण करते हैं । इस सदोमण्डप के मध्य में औदुम्बरी नामक उदुम्बर काष्ठ का एक स्तम्भ होता है जिसके परितः बैठकर सामवेदी ऋत्विज सामगान करते हैं । पौराणिक साहित्य में कहा गया है कि औदुम्बरी सामवेद गान के समय ऋत्विजों की त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है और इसके पश्चात् वह स्वर्ग को प्रस्थान कर जाती है । ऐसा प्रतीत होता है कि पद्म पुराण की दिव्या देवी इस औदुम्बरी का रूप है ।

  शिव पुराण ७.२.३५ में अकार, उकार और मकार को ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का प्रतीक कहा गया है जबकि अर्धमात्रा अथर्ववेद का प्रतीक है । ऐसा ही उल्लेख गोपथ ब्राह्मण १.१.  में भी आया है । यदि अकार ऋग्वेद का प्रतिनिधित्व करता है तो यह जानना आवश्यक होगा कि ऋग्वेद किस तथ्य का प्रतीक है । जैसा कि ऋग्वेद शब्द की टिप्पणी में कहा गया है, ऋग्वेद की प्रतिमा के हाथ में अक्षमाला दिखाई गई है । इसका अर्थ होगा कि एक तो बाहर से अन्दर ऊर्जा का, चेतना का आकर्षण करने वाले अक्ष होने चाहिएं और दूसरी ओर इन अक्षों को परस्पर सम्बद्ध करने वाला चेतना रूप कोई सूत्र होना चाहिए । यदि केवल अक्ष ही विद्यमान हों तो उनका उपयोग केवल द्यूत के लि, जूए के लिए किया जा सकता है । निम्न स्तर की प्रकृति में घटनाएं द्यूत के द्वारा, संयोग या चांस के द्वारा ही निर्धारित होती हैं । यदि चेतना रूपी कोई सूत्र इन अक्षों को परस्पर जोड दे तो द्यूत से छुटकारा पाया जा सकता है । ऋग्वेद की ऋचाओं के संदर्भ में एक कथन को बार - बार उद्धृत किया जाता है - यत् कर्म क्रियमाणम् ऋक् अभिवदति, अर्थात् ऋचा वह है जो किसी कार्य को किए जाने से पूर्व ही उसके स्वरूप का आख्यान कर दे । तभी यह कहा जा सकता है कि जो घटनाएं घटित हो रही हैं, वह द्यूत नहीं है, अपितु एक व्यवस्था के अन्तर्गत घटित हो रही हैं । इस वर्णन के व्यावहारिक पक्ष को इस प्रकार समझा जा सकता है कि प्रत्येक प्राणी अपने आप में एक अक्ष है । वह अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए बाहर से चेतना को अपने अन्दर ग्रहण कर रहा है - श्वास के माध्यम से भी और भोजन के माध्यम से भी । लेकिन जो चेतना इन अक्षों को परस्पर जोड रही है, उसका एक अक्ष को पता नहीं चलता । उसका उपाय यह हो सकता है कि पहले मनुष्य देह रूपी अक्ष को विकसित किया जाए । देह की प्रत्येक कोशिका स्वयं में एक अक्ष बने और यह अक्ष एक दूसरे से एक विशेष प्रकार से सम्बद्ध हों । सामान्य लौह धातु का प्रत्येक परमाणु एक छोटा चुम्बक होता है, लेकिन यह परमाणु एक दूसरे के सापेक्ष अव्यवस्थित रूप में बिखरे पडे रहते हैं । जब किसी प्रक्रिया विशेष द्वारा इन परमाणुओं को व्यवस्थित कर दिया जाता है तो वह बडा चुम्बक बन जाते हैं और बाहर से चुम्बकीय ऊर्जा को ग्रहण करने लगते हैं । यही स्थिति मनुष्य देह की भी कही जा सकती है । पहले देह की कोशिकाएं एक दूसरे के सापेक्ष एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित हों, तभी वह बाहर की चेतना का अनुभव कर सकती हैं । माता निर्मला देवी का कथन है कि सिद्ध पुरुषों के चरण कोई सिद्ध तीर्थ आने से मीलों पहले ही सूचना दे देते हैं । उनके चरणों में कोई विशेष स्पन्दन आने लगता है । सामान्य रूप से हमारे चरणों में स्पर्श करने पर गुदगुदी का अनुभव होता है । इसका कारण यह है कि इस स्थान पर ऊर्जा रुकी पडी है । विशेष प्रयत्न करने पर जब यह ऊर्जा चलायमान हो जाती है, ऊर्ध्वमुखी हो जाती है, तभी चरण बाहर से स्पन्दन को ग्रहण करने में समर्थ हो सकते हैं । और सात्विक प्रकृति इस बात के लिए सतत् प्रयत्नशील है कि देह की कोशिकाएं व्यवस्था को ग्रहण करे ( डा. लक्ष्मीनारायण धूत के अनुसार प्रकृति तीन प्रकार की है - तामसिक, राजसिक और सात्विक ) । भोजन का रस, शुक्र इन कोशिकाओं को व्यवस्थित करने का प्रयास करता है । लेकिन यदि देह पर जड भोजन का भार अधिक हो जाता है तो यह विकास रुक जाता है ।


पुराणों में उकार को योनि कहा गया है जहां बीज को प्रस्फुटित करना है । जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय में उकार स्वप्न अवस्था का प्रतीक है । उकार यजुर्वेद का रूप है । यजुर्वेद क्या हो सकता है, इसको शुक्ल यजुर्वेद की प्रथम यजु के आधार पर समझ सकते हैं । प्रथम यजु है - इषे त्वा, ऊर्जे त्वा । वायव स्थ । जैसा कि इष शब्द की टिप्पणी में कहा गया है, यह अपेक्षित है कि इडा का रूपान्तरण इष में हो , अर्थात् अचेतन मन का, चित्त का रूपान्तरण चेतन मन के रूप में हो । आधुनिक विचारक रजनीश ने अपने व्याख्यानों में सतत् रूप से यह समझाने का प्रयत्न किया है कि किस प्रकार हम अपनी चेतना पर से अचेतन मन का बोझ कम करे, जो कार्य हम अचेतन मन के द्वारा कर रहे हैं - चलना, भोजन करना इत्यादि, उन सभी कार्यों को चेतन मन से करना सीखें । यही विपश्यना ध्यान है । ऐसा प्रतीत होता है कि यजुर्वेद की चरम स्थिति कल्प वृक्ष बनाना है । कल्प वृक्ष का अर्थ होता है कि जो कुछ हमने सोचा, वह तुरन्त क्रियात्मक रूप में प्रस्तुत हो गया । हमारा सोचा हुआ कल्प वृक्ष इसलिए नहीं बन पाता है कि हमारी सोच चेतन मन के स्तर पर नहीं है, उसकी जडें अचेतन मन में हैं । फिर जब घटनाएं हमारी इच्छाओं के अनुरूप घटित नहीं होती तो हम दोष ईश्वर को देते हैं, जो कुछ घटित हो रहा है, उसे आकस्मिक मानते हैं, चांस मानते हैं, उसे मन से स्वीकार नहीं करते, उसके प्रति विद्रोह करते हैं । इन वास्तविक तथ्यों को उकार के यज्ञ में अन्वाहार्यपचन अग्नि का प्रतीक होने के द्वारा स्पष्ट किया गया है । अन्वाहार्यपचन अग्नि का देवता नल नैषध कहा गया है । पुराणों में इस नल नैषध की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए नल - दमयन्ती आख्यान रचा गया है । दम का अर्थ प्रायः इन्द्रियों का दमन, इन्द्रियों को उनके विषयों से अलग करना लिया गया है । लेकिन दम का एक अर्थ होता है कि प्रकृति में घटनाएं जिस रूप में घटित हो रही हैं, उनके प्रति हमारे अन्दर स्वीकार भाव जाग्रत हो जाए, उन्हें हम आकस्मिक न मानें । यह तो तभी हो सकता है जब हमारे अन्दर से अचेतन मन का क्षेत्र सिमटे । नल - दमयन्ती आख्यान में उल्लेख आता है कि राजा नल अक्ष विद्या नहीं जानता था, अतः वह द्यूत में हार गया । फिर उसने एक राजा से सीखा कि कैसे एक तीर द्वारा एक वृक्ष के सारे पत्तों को बींधा जा सकता है, उनकी गणना की जा सकती है । बस, फिर तो कलि उसके शरीर से निकल कर अलग खडा हो गया । यह कलि द्यूत ही है । और तीर स्वयं वह चेतना है जो अक्षों को परस्पर सम्बद्ध कर सकती है ।

  प्राणायाम के संदर्भ में उकार को कुम्भक से, धारण करने से सम्बद्ध किया गया है । इस तथ्य की व्याख्या पद्म पुराण २.८९ के ओंकारेश्वर आख्यान से हो सकती है । इस आख्यान के दूसरे भाग में विदुर नामक एक व्यक्ति ब्रह्महत्या पाप से ग्रस्त है और तीर्थों में भ्रमण कर रहा है कि किसी प्रकार उसका पाप नष्ट हो जाए । लेकिन पाप है कि नष्ट होने का नाम ही नहीं लेता । फिर चन्द्रशर्मा नामक एक दूसरा व्यक्ति उससे मिलता है जो गुरुहत्या पाप से ग्रस्त है । फिर वेदशर्मा नामक एक तीसरा व्यक्ति मिलता है जो अगम्यागमन पाप से ग्रस्त है । फिर वंजुल वैश्य नामक एक चौथा व्यक्ति मिलता है जो सुरापान पाप से ग्रस्त है । इन चार व्यक्तियों ने  अमा और सोम के मिलन के समय चार विशिष्ट तीर्थों प्रयाग, पुष्कर, अर्घ और वाराणसी में स्नान किया जिससे उन चार व्यक्तियों के पाप तो धुल गए लेकिन उन तीर्थों में कृष्णता आ गई । वाराणसी तीर्थ, अर्घ तीर्थ आदि इन चार तीर्थों ने कृष्ण हंसों का रूप धारण करके बहुत प्रयत्न किया कि किसी प्रकार उनकी कृष्णता दूर हो जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया । फिर रेवा - कुब्जा संगम में स्नान से इन तीर्थों की कृष्णता भी दूर हो गई । इस आख्यान में अमा और सोम के मिलन का महत्त्व दिखाया गया है । इसको भौतिक चन्द्रमा के माध्यम से इस प्रकार समझा जा सकता है कि आकाश में चन्द्रमा का जो भाग दिखाई नहीं देता, उतना भाग पृथिवी पर आकर प्राणियों में अचेतन? मन बन जाता है । अमावास्या के दिन आकाश से चन्द्रमा तिरोहित हो जाता है । इसका अर्थ होगा कि चेतन मन तिरोहित हो गया है और सारा का सारा मन अचेतन मन में रूपान्तरित हो गया है । कहा गया है कि चन्द्रमा की १६वी कला शेष बचती है जो अमृत है । इसके कारण आकाश में चन्द्रमा का पुनः जन्म हो जाता है । यह भी कहा गया है कि चन्द्रमा की यह १६वी कला अमावास्या के दिन पृथिवी के प्राणियों में समायी रहती है, अतः इस दिन फूल - पत्ती भी न तोडे । प्रस्तुत आख्यान में यह बहुत स्पष्ट नहीं है कि आकाश का जो चन्द्रमा पृथिवी पर अवतरित हुआ, वह प्राणियों का चेतन मन बना या अचेतन मन । प्रस्तुत लेख में चार व्यक्तियों के पापमुक्त होने की संभावना तभी बनती है जब उनका अचेतन मन चेतन मन में रूपान्तरित हो । और रेवा संगम में स्नान से तीर्थों के पाप धुलने के संदर्भ में रेवा को रयि - वा के रूप में समझा जा सकता है । उपनिषदों में कहा गया है कि प्राण देवयान मार्ग है, रयि पितृयान मार्ग है । रयि को कुण्डलिनी जागरण का मार्ग समझा जा सकता है । चार पापी व्यक्तियों के इस आख्यान में पापों का धारण अचेतन मन में है । यही उकार का रहस्य प्रतीत होता है ।

  सोमयाग के प्रथम चरण में जो अन्वाहार्यपचन अग्नि होती है, वह सोमयाग के उत्तरवेदी नामक दूसरे चरण में आग्नीध्र नामक ऋत्विज की अग्नि बनती है जो अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी दोनों गुणों से युक्त होती है । पुराणों में लगता है कि इसे धन का स्वामी कुबेर कहा गया है । वह अपनी एक आंख से शिव की पत्नी पार्वती को तिरछी नजर से देखता है कि शिव के पार्श्व में यह सुन्दर स्त्री कौन बैठी हुई है । इस पर शिव उसकी एक आंख फोड देते हैं और तभी वह धन का स्वामी कुबेर बनता है । यहां पार्वती को प्रकृति का रूप कहा जा सकता है । आग्नीध्र ऋत्विज की विशेषता ओंकार का उच्चारण करने में होती है ।


प्राणायाम के संदर्भ में मकार को रेचन अथवा विसर्जन से सम्बद्ध किया गया है । पुराणों में मकार की व्याख्या वर्णमाला के ककारादि २५ व्यञ्जनों के आधार पर की गई है । पहले २४ व्यञ्जन प्रकृति के तथाकथित २४ तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि २५वां व्यञ्जन मकार आत्मा है । २६वां तत्त्व स्वयं परमात्मा कहा जाता है । जब मकार को विसर्जन कहा जाता है तो उससे तात्पर्य यह हो सकता है कि आत्मा को २४ तत्त्वों के अनावश्यक भार से मुक्त करके शुद्ध बनाना है । विसर्जन का एक और अर्थ वर्णमाला में १६वें स्वर अ: के आधार पर किया जा सकता है । कहा गया है कि यह १६वां स्वर चन्द्रमा की १६वी कला है जो अमृत है, नष्ट नहीं होती ।

  मकार की और अधिक स्पष्ट व्याख्या पद्म पुराण २.९३ में ओंकारेश्वर माहात्म्य आख्यान के माध्यम से की जा सकती है । इस आख्यान में सुबाहु नामक राजा तथा उसकी पत्नी तार्क्ष्या मृत्यु पश्चात् स्वर्ग में जाते हैं परन्तु वहां भी वह क्षुधा और तृषा से मुक्त नहीं हो पाते । तब वामदेव ऋषि उन्हें भूतल पर अक्षय रूप में पडी अपनी ही देह के भक्षण का परामर्श देते हैं । सुबाहु राजा ऐसा ही करता है । उसकी मुक्ति तब होती है जब वह वासुदेव स्तोत्र का श्रवण करता है । सुबाहु के स्वर्ग में जाकर भी क्षुधाग्रस्त रहने का कारण यह बताया गया है कि उसने भूतल पर रहते हुए अन्न दान नहीं किया था । यह आख्यान इंगित करता है कि हमारी चेतना का जो सर्वोच्च स्तर है, उसे चेतना के निचले स्तरों के प्रभाव से मुक्त कराने की आवश्यकता है । चेतना के निचले स्तर के कोशों का अपना महत्त्व है । वह ऊपर के कोशों का पोषण करते हैं । रजनीश ने कुण्डलिनी और सात शरीर 'सेवन चक्राज सेवन बांडीज' नामक व्याख्यानमाला में यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य देह आयु के अनुसार पुष्ट होती जाती है । आदर्श रूप में २० वर्ष में चेतना के एक स्तर को पक जाना चाहिए ।

  सोमयाग में आहवनीय अग्नि को मकार का प्रतीक कहा गया है । ऐसा अनुमान है कि सोमयाग के प्रथम चरण की आहवनीय अग्नि उत्तरवेदी नामक द्वितीय चरण में हविर्धान मण्डप नामक स्थान बनता है जहां सोमलता को कूट - छान कर उसे देवों को हवि देने योग्य बनाया जाता है और शोधित सोम का संग्रह  किया जाता है । आहवनीय अग्नि पर रखी सोमलता देवों को हवि प्रदान करने योग्य नहीं होती ।


अर्धमात्रा की व्याख्या में पद्म पुराण ओंकारेश्वर माहात्म्य में पार्वती द्वारा कल्पवृक्ष के नीचे कामना करने से दिव्य स्त्री का जन्म, नहुष का जन्म, वसिष्ठ द्वारा नहुष का पालन, हुण्ड असुर द्वारा उसके वध का प्रयास, नहुष द्वारा हुण्ड का वध, हुण्ड - भ्राता विहुण्ड द्वारा शत्रुओं के वध हेतु कौमोदा स्त्री के विरहाश्रुओं से उत्पन्न रक्त पुष्पों द्वारा शिव की अर्चना और शिव द्वारा उसका वध, कौमोदा स्त्री के तुलसी होने का वर्णन है । इस आख्यान की व्याख्या भविष्य में अपेक्षित है ।

ओंकार  के बहुत से पक्ष हैं जिनकी व्याख्या भविष्य में अपेक्षित है । उदाहरण के लिए, उपनिषदों में जहां प्राणायाम की विधि का उल्लेख आता है, वहां कहा गया है कि इडा द्वारा वायु का आकर्षण करके पिङ्गला द्वारा उसका रेचन करे । फिर पिङ्गला द्वारा आकर्षण करके इडा द्वारा रेचन करे । इसका स्वरूप ओंकार के संदर्भ में क्या होगा, यह अनुत्तरित है । अकार की १६ कलाएं, उकार की ३२ कलाएं और मकार की १६ कलाएं कही गई हैं । इन कलाओं का शास्त्रीय संग्रह डा. शिवशंकर अवस्थी की पुस्तक 'मन्त्र और मातृकाओं का रहस्य' (चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी) में सुचारु रूप से उपलब्ध है । लेकिन व्यावहारिक पक्ष की व्याख्या अपेक्षित है । ध्यानबिन्दु उपनिषद ३० में पूरक द्वारा नाभिस्थान में प्रतिष्ठित चतुर्भुज महाविष्णु का ध्यान करने का निर्देश है जिसका वर्ण अतसीपुष्प समान कहा गया है । कुम्भक द्वारा हृदय स्थान में कमल पर विराजमान, रक्तगौराभ चतुर्वक्त्र पितामह का ध्यान करने का निर्देश है । रेचक द्वारा ललाट स्थान में त्रिलोचन शिव का ध्यान करने का निर्देश है जिसका स्वरूप इस प्रकार है कि पद्मनाल ऊपर है, पुष्प नीचे है । इसी निर्देश में लगता है कि प्रणव का ध्यान द्वादश दल हृदयकमल के अन्दर स्थित अष्टदल कमल में विष्णु रूप में करने का निर्देश है । इस अष्टदल कमल के अन्दर भानु स्थित है, भानु के अन्दर शशि, शशि के अन्दर वह्नि, वह्नि के अन्दर प्रभा, प्रभा के अन्दर पीत, पीत के अन्दर निरञ्जन वासुदेव । गोपथ ब्राह्मण १.१.२२-३० में ओंकार की अ, उ, म मात्राओं को ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत तथा उदात्त और स्वरित के अनुसार वर्गीकृत किया गया है और चार वेदों के अनुसार यह भेद भिन्न होगा । जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद में भी ओंकार की व्याख्या उपलब्ध है ।

  वर्तमान टिप्पणी के लेखन में ऋग्वेद की ऋचाओं में प्रकट ॐ तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में ॐ की व्याख्या का अध्ययन नहीं किया गया है ।

ईसवी सन् १९९८ में प्रकाशित उकार शब्द की टिप्पणी :


टिप्पणी : ऋग्वेद की ऋचाओं में सार्वत्रिक रूप से उकार प्रकट होता है । भाष्यकार सायण के अनुसार किसी ऋचा में प्रकट हुआ उकार ऋचा के छन्द की अक्षरपूर्ति के लिए ( पाद पूरक ) है । लेकिन डा. फतहसिंह का मत है कि ऋग्वेद के पद पाठकार शाकल्य ने , जिसे ऋग्वेद का प्रथम भाष्यकार माना जा सकता है, उकार का पदपाठ ॐ किया है । अतः कुछ लोगों का यह मिथ्या प्रचार कि वेदों में तो ॐ है ही नहीं, भ्रममूलक है ।

  व्यावहारिक रूप में उकार को उपनिषद के इस कथन से समझा जा सकता है कि प्राणायाम में अकार से वायु का पूरण किया जाता है , उकार से वायु को धारण किया जाता है और मकार से उसका रेचन किया जाता है । यह सूत्र उकार के संबंध में पुराणों के कईं कथनों जैसे शिव पुराण आदि में अकार के बीज , उकार योनि , मकार बीजी होने के उल्लेख को समझने में सहायक हो सकता है । प्राणायाम में अकार द्वारा वायु का पूरण करना कोई साधारण क्रिया नहीं है , अपितु योगी को बाह्य संसार से जिस किसी भी सूक्ष्म तत्त्व की आवश्यकता होती है , वह उसकी पूर्ति वायु के पूरण द्वारा ही करता है । अंग्रेजी भाषा में पूरण , धारण और रेचन की प्रक्रिया को अवशोषण (absorption ) , धारण (retention ) और रेचन (desorption) कह सकते हैं । आधुनिक विज्ञान में रेडियो तरंगों को अवशोषित करने के लिए अनुनाद (resonance ) के नियम का उपयोग किया जाता है , अर्थात् रेडियो तरंगों की अपनी एक आवृत्ति , फ्रीक्वेंसी होती है । यदि इन तरंगों को अवशोषित करना हो तो हमारे द्वारा बनाए गए यन्त्र की फ्रीक्वेंसी भी वही होनी चाहिए जो रेडियो तरंग की है । यही स्थिति संसार में अन्य सूक्ष्म तत्त्वों के सम्बन्ध में भी हो सकती है ।

  उकार के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि दिव्य शक्ति को गर्भ रूप में धारण करना , जहां वह पुराणों की उकार रूपी योनि में वर्धन प्राप्त कर सके , उपनिषद में उकार द्वारा धारण की समुचित व्याख्या हो सकता है । सामान्य रूप में , पृथिवी पर जो सूर्य की किरणें पड रही हैं , पृथिवी पर वनस्पतियां उसको गर्भ रूप में धारण कर रही हैं । यही स्थिति श्वास - प्रश्वास द्वारा आक्सीजन को धारण करने के संबंध में भी है । लेकिन पुराणों में उकार को योनि की संज्ञा देना यह संकेत करता है कि इस व्यक्तित्व को एक ऐसी समुचित योनि में रूपांतरित करना है जहां दिव्य शक्तियां वर्धन को भी प्राप्त हो सकें ।

  वैदिक साहित्य के अनुसार ॐकार की जो स्थिति है , वह अक्षर है , अव्यय है - एक बार किसी तत्त्व का अवशोषण हुआ , फिर वह उसी अवस्था में बना रहेगा , उसका क्षय नहीं होगा । धारण व रेचन से संबंधित तथ्यों का आधुनिक विज्ञान में उदाहरण अन्वेषणीय है ।

प्रथम लेखन : ३१-८-२००९ई.


*अथ वा श्रीवृन्दावनमध्ये ऋग्यजुस्सामस्वरूपम्। ऋगात्मको मकारः। यजुरात्मक उकारः। श्रीरामः सामात्मकोऽपि अकारः। श्रीकृष्णः अर्धमात्रात्मकोऽपि। यशोदा इव बिन्दुः। - राधोपनिषद 2

चित्र स्रोतः- विकिपीडिया

ओंकार विषये सार्वत्रिक कथनमस्ति यत् ओंकारस्य चतसृषु मात्रासु मध्ये अकारः ब्रह्मा अस्ति, उकारः विष्णुः, मकारः शिवः एवं अर्धमात्रा प्रकृतिः अस्ति । ब्रह्मणः कार्यं आदानं, सममिति पूरणं इत्यादिरस्ति, विष्णोः कार्यं धारणं, वर्धनं इत्यादिरस्ति, शिवस्य कार्यं संहारमस्ति। अस्याः टिप्पण्याः उद्देश्यं विष्णोः कार्यस्य विवेचनमस्ति। आधुनिक विज्ञाने विद्युत आवेशस्य धारणं संधारित्र अथवा कैपैसिटर द्वारा भवति। यदि संधारित्रस्य सम्बन्धनं विप्रेरित्रेण(इंडक्टर) सह कुर्वन्ति, तदा वैद्युत तरंगानां आविर्भावं भवति। अयं सार्वत्रिक घटना अस्ति।

He was truly a scientific saint. He loved people from the core of his heart. Poor or rich did not matter to him. For him the director or the peon were like human beings. He was not money conscious and was down to earth.


 मम मार्गदर्शकः स्वर्गीय डा. रामप्रसादः(१९१२-१९८९ई.) कथयति स्म यत् प्रकृतिमध्ये वैद्युत कम्पनानां आविर्भावं केन प्रकारेण भवति, अयं रहस्यमेव। मनुष्यस्य कार्यं केवलमयमेव अस्ति यत् ये वैद्युत कम्पनाः प्राकृतरूपेण अतिक्षीणाः विद्यमानाः सन्ति, तेषां आवर्धनकरणम् एवं तेषां यन्त्र द्वारा संसूचनं।


आधुनिक विज्ञाने विद्युत आवेशस्य संधारणं संधारित्रेण कुर्वन्ति। यदि प्राणानां संधारणस्य आवश्यकता भवेत्, तर्हि कः युक्तिः(डिवाईस) भवति। पौराणिक गाथानुसारेण अयं युक्तिः विष्णुरस्ति। विप्रेरित्रस्य(इंडक्टर) स्थाने गरुडः भवति। गरुडस्य कार्यं सर्पाणां भक्षणं अस्ति। यदा संधारित्रं विष्णुरूपेण भवति एवं विप्रेरित्रः गरुडरूपेण भवति, तदा मानसिक तरंगानां प्रेषणं संभवं भवति।

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लेखनम् – फाल्गुन कृष्ण पञ्चमी, विक्रम संवत् २०७३(१६-२-२०१७ई.)