पुराण विषय अनुक्रमणिका(ए-अः) Purana Subject Index

एकानंशा पद्म १.४४.८८ ( पार्वती द्वारा तप के पश्चात् त्यक्त कालिमा से एकानंशा देवी की उत्पत्ति, देवी का विन्ध्याचल पर गमन व पञ्चाल नामक गण की प्राप्ति ), ब्रह्मवैवर्त्त ४.७.१०५ ( वसुदेव द्वारा यशोदा - कन्या को कंस को प्रस्तुत करना, कंस द्वारा कन्या के वध के विचार का त्याग ; पार्वती का अंश, दुर्वासा की पत्नी बनना ), भागवत १०.४( कंस द्वारा यशोदा - कन्या के पोथन का वृत्तान्त ), मत्स्य १५४.७४ ( ब्रह्मा के अनुरोध पर विभावरी देवी द्वारा हिमवान - पत्नी मेना के गर्भ में प्रवेश करके उदर को रञ्जित करना, मेना से काली / पार्वती का जन्म ), १५७.१५ (तप के पश्चात् त्यक्त पार्वती की कृष्ण देह से एकानंशा देवी की उत्पत्ति आदि ), वायु २५.४९ ( मधु - कैटभ प्रसंग में ब्रह्मा के समक्ष एकानंशा से अनेकांशा कन्या के प्राकट्य का उल्लेख ), विष्णुधर्मोत्तर ३.८५.७१ ( एकानंशा की मूर्ति का रूप ), स्कन्द १.२.६२.५६ ( यशोदा - पुत्री, अपराजिता, सौदामिनी आदि अन्य नाम व माहात्म्य ), १.२.६५.१ ( एकानंशा देवी के तिरस्कार पर भीम का अन्धा होना, देवी की स्तुति से चक्षु प्राप्ति, देवी का भीम - भगिनी बनकर भीम की सहायता का वचन, देवी के वत्सेश्वरी, केलीश्वरी आदि अन्य रूपों का कथन ), ५.१.१८ ( तारक असुर से पीडित ब्रह्मा द्वारा निशा देवी से पार्वती के शरीर का रंग काला करने का अनुरोध, पार्वती द्वारा कृष्ण शरीर के त्याग पर एकानंशा देवी का प्रादुर्भाव ), हरिवंश २.२.२६( विष्णु द्वारा निद्रा को षड~गर्भों को देवकी के गर्भ में रखने तथा यशोदा के गर्भ से जन्म लेने का निर्देश, आर्या रूपी एकानंशा देवी की स्तुति ), २.३.९ (एकानंशा/आर्या देवी के कृष्ण पक्ष की नवमी व शुक्ल पक्ष की एकादशी होने का उल्लेख), २.४.४७ ( यशोदा - कन्या, कंस द्वारा वसुदेव - पुत्री समझकर वध का प्रयत्न, कन्या का आकाश में स्थित होकर कंस को सचेत करना ), २.२२.५२ ( यशोदा - कन्या, शुम्भ - निशुम्भ असुरों का वध करके विन्ध्याचल पर स्थित होना ), २.१०१.१२ ( द्वारका में यादव सभा में एकानंशा का कृष्ण व बलराम से मिलन ), लक्ष्मीनारायण १.४७६.१२४ ( दुर्वासा द्वारा स्व - पत्नी कन्दली को भस्म करने के पश्चात् तप करके वसुदेव - पुत्री एकानंशा को पत्नी रूप में प्राप्त करना ) Ekaanamshaa/ ekanansha

एकान्त रामनाथ स्कन्द ३.१.१३ ( शिव के निर्देश पर अगस्त्य - अनुज द्वारा सेतु तीर्थ के समीप एकान्तरामनाथ क्षेत्र में तप व देह त्याग, राम द्वारा समुद्र को एकान्त करने के कारण क्षेत्र की एकान्तरामनाथ नाम से प्रसिद्धि )  Ekaanta

 

एकाम्र देवीभागवत ७.३०.५९ ( विष्णु के अनुरोध पर शिव द्वारा पुरुषोत्तम क्षेत्र में स्थित एकाम्र क्षेत्र में कोटि  लिङ्गेश्वर रूप में वास, राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा शिव की आराधना ), ब्रह्म १.३९ ( एकाम्र क्षेत्र के माहात्म्य का वर्णन ), ब्रह्माण्ड ३.४.५.७ ( अगस्त्य द्वारा काञ्ची में एकाम्रवासी शिव व कामाक्षी देवी की पूजा ), ३.४.४०.३७ ( सती विरह से पीडित शिव द्वारा एकाम्र मूल में स्थित होकर कामाक्षी देवी की आराधना, गौरी को ग्रहण करना ), मत्स्य १३.२९ ( एकाम्रक क्षेत्र में सती की कीर्तिमती देवी के नाम से स्थिति ), स्कन्द २.२.१२.८ ( विष्णु के अनुरोध पर शिव द्वारा पुरुषोत्तम क्षेत्र में स्थित एकाम्र क्षेत्र में कोटि लिङ्गेश्वर रूप में वास, राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा शिव की आराधना ), ५.३.१९८.६७ ( एकाम्र तीर्थ में उमा की कीर्तिमती नाम से स्थिति का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.५८५.११६ ( पुरुषोत्तम क्षेत्र में स्थित एकाम्र क्षेत्र में कोटिलिङ्गेश्वर शिव का स्थित होना )  Ekaamra

 

एकार्णव ब्रह्माण्ड ३.४.१.१७९ ( निरुक्ति ), मत्स्य १६६.१७ ( प्रलयकाल में पृथ्वी का एकार्णव के जल से अभिभूत होना ), १६७.४८ ( मार्कण्डेय द्वारा एकार्णव के जल में शायी बालमुकुन्द के दर्शन ), स्कन्द ५.३.१८.९ ( प्रलयकाल में सूर्य ताप द्वारा जगत के भस्म होने के पश्चात् मेघों के जल से जगत के एकार्णव बनने का वर्णन )  Ekaarnava/ ekarnava

 

एकावली देवीभागवत ६.२१+ ( रैभ्य व रुक्मरेखा - कन्या, कालकेतु द्वरा हरण, हैहय / एकवीर द्वारा रक्षा व पाणिग्रहण )

 

एकाष्टका पद्म १.९.५१ ( आज्यप पितरों की कन्या विरजा का ब्रह्मलोक में जाने पर एकाष्टका नाम होना ), मत्स्य १५.२४ ( वही)  ekaashtakaa/ekashtaka

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एकाह स्कन्द ६.२१६.११०( पितरों द्वारा ब्रह्मा से एकाहिक श्राद्ध द्वारा तृप्ति होने की मांग, ब्रह्मा द्वारा गयाशिर में श्राद्ध से तृप्ति का वरदान )

 

एकोद्दिष्ट स्कन्द ६.२०६.६१( इन्द्र द्वारा चमत्कारपुर में विश्वेदेवों  के बिना ही एकोद्दिष्ट श्राद्ध को सम्पन्न करने का उल्लेख ), द्र. श्राद्ध

 

एक्य वराह ७०.२६ ( त्रिदेवों में एकता का प्रतिपादन ), स्कन्द ६.२४७.१० ( विष्णु से एक्य प्रदर्शित करने के लिए शिव द्वारा हरिहर रूप धारण ), हरिवंश २.१२५.२३ ( शिव व विष्णु की एकता का प्रतिपादन ) 

 

एधिति ब्रह्माण्ड १.२.१२.९ ( अथर्वा द्वारा सम्भृत अग्नि ) 

 

एरका ब्रह्म १.१०१ ( यादवों के परस्पर युद्ध में साम्ब से उत्पन्न मूखल के अंशभूत एरका तृण का मुखल में परिवर्तित होना, एरका द्वारा यादवों का विनाश होना ), भागवत ११.१.२२ ( वही), ११.३०.२० ( वही), स्कन्द ७.१.२३७.८४ ( वही)  Erakaa

 

एरण्डी पद्म ३.१८.४४ ( एरण्डी तीर्थ का माहात्म्य ), ३.२१.३३ (एरण्डी - नर्मदा सङ्गम का संक्षिप्त माहात्म्य ), मत्स्य १९१.४२ ( एरण्डी - नर्मदा सङ्गम के माहात्म्य का वर्णन ), १९३.६५ ( वही), स्कन्द ५.३.१०३ ( एरण्डी सङ्गम का माहात्म्य : अनसूया द्वरा त्रिदेव रूप तीन पुत्रों की प्राप्ति, गोविन्द कृषक की कृमि उपद्रव से मुक्ति ), ५.३.१०३.६८ ( एरण्डी नामक वैष्णवी माया के माहात्म्य का वर्णन ), ५.३.१८५  ( एरण्डी तीर्थ का माहात्म्य ), ५.३.२१७ ( एरण्डी तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य : ब्रह्महत्या पाप से मुक्ति ),  लक्ष्मीनारायण १.५६४.५० ( गया में पितरों का साक्षात्कार न होने पर दुर्वासा द्वारा एरण्ड मुनि के साथ अमरकण्टक तीर्थ में वास, ब्रह्मा का प्रकट होकर पिण्ड स्वीकार करना, ब्रह्मा के कमण्डलु से पतित जल का एरण्ड के मस्तक पर पतन, जल प्रवाह का नर्मदा से सङ्गम )  Erandee

 

एला मत्स्य २२.५० ( एलापुर : श्राद्ध हेतु प्रसिद्ध तीर्थों में से एक ), १६३.५६ ( एलामुख : पाताल निवासी एक सर्प, हिरण्यकशिपु के क्रोध से कांपना ), लक्ष्मीनारायण १.४४१.८७ ( इलायची का वृक्ष : देवों का रूप )  Elaa

 

एलापत्र ब्रह्माण्ड १.२.२३.९ ( नभ / श्रावण मास में सूर्य रथ व्यूह में उपस्थित एक सर्प ), २.३.७.३४ (कद्रू के प्रधान पुत्रों में से एक ), मत्स्य ६.४० ( वही), १२६.१० ( सूर्य रथ व्यूह में स्थिति ), वायु ५२.१० ( एलापर्ण : सर्प, नभ मास में सूर्य रथ व्यूह में स्थिति ), स्कन्द १.२.६३.६० ( एलापत्र नाग द्वारा पाताल में स्थित शिवलिङ्ग के पूर्व में श्रीपर्वत को जाने वाले मार्ग का निर्माण ), ५.२.१०.८ ( माता कद्रू द्वारा नागों को नष्ट होने का शाप देने पर एलापत्र सर्प का ब्रह्मलोक गमन व ब्रह्मा से नागों की रक्षा का उपाय पूछना, कर्कोटक से साम्य )  Elaapatra

 

एषणा लक्ष्मीनारायण २.२२३.४४ ( तृष्णा यक्षिणी, एषणा राक्षसी, चिन्ता पिशाची ) 

 

ऐ अग्नि ३४८.३ ( योगिनी हेतु ऐ का प्रयोग ), देवीभागवत ३.११.२६ ( ऐं : सारस्वत बीज मन्त्र, उतथ्य मुख से दया भाव से प्रस्फुúटन, उतथ्य का विद्वान् बनना ) 

 

ऐक्ष्वाकी मत्स्य ४४.४५ ( जन्तु - भार्या, सात्वत - माता, क्रोष्टु / यदु वंश ), ४६.१ ( शूर / मीढुष - माता ), ४६.२४ ( अनाधृष्टि - भार्या, शत्रुघ्न / निधूतसत्व - माता ), वायु ९५.४७ पुरूद्वह - भार्या, सत्त्व - माता , क्रोष्टा वंश )  Eikshwaakee, Aikshwaakee

 

ऐडूक विष्णुधर्मोत्तर ३.८४ ( ऐडूक की मूर्ति के रूप का कथन )

 

ऐतरेय लिङ्ग २.७.२१ ( द्विज के मूक पुत्र ऐतरेय द्वारा वासुदेव मन्त्र के जप से सरस्वती का साक्षात्कार करना ), स्कन्द १.२.४२.२६ ( माण्डूकि व इतरा - पुत्र, स्व अज्ञान से खिन्न होकर विष्णु की आराधना, विष्णु के निर्देश पर हरिमेधा के यज्ञ में गमन, हरिमेधा - पुत्री से विवाह, पूर्व जन्म का वृत्तान्त )  Aitareya

 

ऐनस लक्ष्मीनारायण २.२१६.९२ ( श्री हरि का गतैनस राष्ट्र की कायनी नगरी में आगमन, राजा द्वारा स्वागत - सत्कार, श्री हरि द्वरा लोभ, मोह आदि पापों से मुक्ति का उपदेश ) द्र. पाप

 

ऐन्द्र शिव ७.२.३८.३२( ऐन्द्र ऐश्वर्य के अन्तर्गत ४० सिद्धियों के नाम )

 

ऐन्द्री अग्नि १४६.१८( ऐन्द्री कुलोत्पन्न देवियों के नाम ), देवीभागवत ५.२८.२३, ५.२८.५३ ( शुम्भ असुर से युद्ध में इन्द्राणी / ऐन्द्री मातृशक्ति का ऐरावत गज पर आरूढ होकर आगमन, असुरों का संहार ), भागवत ९.६.२६ ( युवनाश्व द्वारा पुत्री प्राप्ति हेतु ऐन्द्री इष्टि का आयोजन, अभिमन्त्रित जलपान से मान्धाता के जन्म की कथा ), विष्णुधर्मोत्तर २.१३२.८ ( ऐन्द्री शक्ति के रुक्म वर्ण का उल्लेख ), स्कन्द ४.२.७२.५९ ( ऐन्द्री देवी द्वारा शरीर में कौर्म प्रदेश की रक्षा )  द्र. इन्द्राणी  Eindree/ Aindree

 

ऐरक लक्ष्मीनारायण २.३७.४९ ( वराटक दैत्य का सेनानी, कृष्ण प्राप्ति वर की प्राप्ति )

 

ऐरण्डी द्र. एरण्डी 

 

ऐरावण विष्णुधर्मोत्तर १.२५३.९( नागों/हाथियों का अधिपति )

 

ऐरावत देवीभागवत ८.१५.२ ( ग्रहों के चारण की वीथि का नाम ), ८.१५.४ ( नक्षत्र वीथि का नाम ), पद्म ४.१०.१ ( समुद्र मन्थन से ऐरावत गज का प्राकट्य ), ब्रह्माण्ड १.२.२३.३ ( ऐरावत गज की मधु - माधव मास में सूर्य रथ में स्थिति का उल्लेख ), २.३.७.३२६ ( इरावती से ऐरावत की उत्पत्ति ), भविष्य ३.३.७.२६ ( नकुल - अवतार लक्षण द्वारा शिव से ऐरावती वाहन की प्राप्ति का  कथन), ३.४.१७.५१ ( ध्रुव व पूर्व दिशा - पुत्र ), महाभारत भीष्म ८.१०( ऐरावत खण्ड का वर्णन ), अनुशासन १४.२४०(तपोरत उपमन्यु के समक्ष इन्द्र के ऐरावत का शिव के वृषभ में रूपान्तरित होना ),  विष्णु १.९.७ ( ऐरावत गज द्वारा इन्द्र को दुर्वासा से प्राप्त दिव्य माला का तिरस्कार, दुर्वासा से शाप प्राप्ति ), १.२२.५ ( ऐरावत के गजों का अधिपति बनने का उल्लेख ), विष्णुधर्मोत्तर ३.५०.१२ ( ऐरावण : अर्थ का प्रतीक, ऐरावत के दन्त मन्त्र शक्तियों के प्रतीक ), स्कन्द १.१.१८.७७ ( बलि द्वारा अगस्त्य को ऐरावत का दान करना ), १.२.६३.६२ ( पाताल में स्थित शिवलिङ्ग के पश्चिम से प्रभास में जाने हेतु ऐरावत नाग द्वारा मार्ग का निर्धारण), ४.२.६७.१७९ ( ऐरावतेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.२.९७.१३४ ( वही), ५.१.४४.२५ (नारद द्वारा समुद्र मन्थन से उत्पन्न ऐरावत को वासव / इन्द्र को प्रदान करने का उल्लेख ),हरिवंश १.३१.५० ( चम्प - पुत्र हर्यङ्ग के वाहन के लिए ऋष्यशृङ्ग द्वारा ऐरावत का पृथ्वी पर अवतारण ), ( नाग, पृथ्वी का दोग्धा ), २.७३ ( पारिजात हरण प्रसंग में गरुड से युद्ध ), २.९६.५३ ( वज्रनाभ असुरराज की सेना से युद्ध हेतु इन्द्र द्वारा कृष्ण - पुत्र साम्ब को संचालक प्रवर ब्राह्मण सहित ऐरावत प्रदान करना ), वा.रामायण ३.१४.२४ ( इरावती - पुत्र, गज ), ६.४.१८(हनुमान की ऐरावत से उपमा), लक्ष्मीनारायण १.१०६.४० (इन्द्र व ऐरावत द्वारा दुर्वासा प्रदत्त पारिजात माला का तिरस्कार, विष्णु द्वारा गज के सिर को काटकर गणेश से जोडना ), १.१५३.५०( ऐरावत के कारण ऊर्जयन्त पर्वत से जल स्राव का कथन ), २.१४०.३८ ( ऐरावत प्रासाद के लक्षण ), ३.१६.४९ ( ऐरावत की विष्णु के हस्त तल से उत्पत्ति का उल्लेख ), कथासरित् १.३.५ ( कनखल तीर्थ में ऐरावत द्वारा उशीनर पर्वत का भेदन करके गङ्गा का अवतारण करना ), १७.२.१४८ ( विद्युद्ध्वज दैत्य द्वारा सेना को नन्दी व ऐरावत/ऐरावण के बन्धन का आदेश, वृष व ऐरावण द्वारा सेना को नष्ट करना)  Eiraavata, Airaavata/ airavata

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